Sunday, December 28, 2014


कहानी
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समंदर में ज्वारभाटा.. -
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दुनिया भर में शोध हो चुके थे, अब मशीनें हिनहिना रही थीं। स्याही शब्दों में ढल रही थी। धड़ाधड़ कागज छप रहे थे। खबर जंगल में आग सी उड़ रही थी। भूगोल की किताबें खंगाली गईं, दर्ज पन्ने बदले जाने लगे, विज्ञान और किंवदंतियों में झमाझम बहस चल रही थी.. पर सबसे बेखबर तीसरी कक्षा के बच्चे चुपचाप बैठे थे.. और मास्टरजी सवाल पूछ रहे थे... सवाल... ?

उधर न्याय के कटघरे में खड़ा चांद, गीता पर हाथ रखकर सच कहने की सौगंध ले रहा था। चांद ने सनद दी। गवाहों को ढूंढा, और गीली आंखें धरती की ओर कर झटके से बोला....  ओ खुदा..आसमान से पूछ लो..तारों से लिखित में ले लो..चाहो तो बादलों का बयान दर्ज कर लो...कि मैं दोषी नहीं हूं...मैं दोषी नहीं हूं....
और चांद का मुंह पीले से लाल हो गया... नसों का खून आंखों से बहने लगा.... बहता रहा और बहता रहा...

इधर समंदर की हालत बिगडऩे लगती है. विशालता स्प्रिंग बन सिकुड़ जाती है.. भीतर तैरती मछलियों का दम घुटने लगता है..सांसों की बेचैनियां जीने की जद्दोहजद में बदलती हैं और जीव-जंतु नुकीली कुलबुलाहट में। समंदर के भीतर के प्राणी उसकी खाल को चबा डालते हैं... कि अंतडिय़ों में सूराख होने लगते हैं, सूराख सुरंग में बदलने लगते हैं...समंदर और सिकुड़ जाता है.. भिंचे हुए समंदर के भीतर लाखों मौतें एक साथ होती हैं... जीवों से निकले प्राण गैसों का गोला बन समंदर के माथे में कई दफा फूटते हैं। माथे की नसें फट जाती हैं.. नसों के परखच्चों पर लिपटा बहरापन हर ओर बिछ जाता है और एकाएक बंधी मुठ्ठियां खुल जाती हैं.. पांव टूट जाते हैं... गरदन एक बार फिर आसमान की ओर उठती है और समंदर धम्म से गिर पड़ता है............

कुछ सैकेंड और फिर..समंदर की आंखें अधखुली हो बहने लगती हैं.... कंपकंपाते होठों के पीछे दांत टकराते हैं...जुबां ऊपर उठकर धड़ाम से गिरती है और एक भर्राया सुर गले से निकल गूंजता है...........चांद.............
..

चांद..... ओ चांद......
ओ मेरे चांद......
समंदर की फुंकी हुई नसों में बर्फ दौड़ जाती है.... माथे की लकीरें सपाट हो जाती हैं...होठों पर शहद सा बिखरता है... चांद, मेरा चांद, मेरी जान, मेरा खुदा, मेरा पीर बख्श, मेरा प्राण, मेरी जिंदगी, मेरा परमात्मा, मेरा परवरदिगार, और समंदर एक सांस में चांद को सैकड़ों नामों से पुकारता है.....
और समंदर खुद में डूब जाता है........... कि जैसे ख्वाब में डूब जाता है...
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चांद आसमान में बादलों की चादर से आधा मुंह निकालकर झांकता है..उसके बिखरे हुए बाल, पूरे माथे को ढक लेते हैं...उनींदीं आंखें खुलती हैं फिर बंद हो जाती हैं..उसके होठ मुस्कुराते हैं.. एक दूसरे होठ को छूते हैं और फिर चिपक जाते हैं....
समंदर धीमे से पुकारता है.... ओ गुलाबी होठों वाले.... चांद ओ मेरे चांद....
फिर गुनगुनाता है..चांद को धीरे-धीरे जमीं पर बुलाता है... समंदर का ह्रदय चांद से अटखेलियां करने को मचलता है... उनींदा चांद छोटे बच्चे सा झुंझलाता है..और करवट बदल लेता है...
समंदर प्रेम से भरी मां सा चांद को बहलाता है.. चांद को गोद में उठाना चाहता है.. उसके माथे को सीने से लगाना चाहता है... पर प्रकाश वर्ष की दूरी में समंदर फिर खो जाता है....

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दिन बीतते हैं, धूप खिलती है, समंदर सूरज से दुश्मनी पाल लेता है.. दिन सदियों की तरह काटता है... पहाड़ों पर हवाएं गीत गाती हैं.. मानव ध्वजाएं फहरती हैं.. पहाड़, पेड़-पौधे, नदियां, पशु-पक्षी, सूरज की किरणों के साथ मदमस्त हो दिनभर की यात्रा पर निकल जाते हैं.. रास्ते भर जोशीले कदमों के साथ थिरकते हुए जिंदगी का उत्सव मनाते हैं.. उधर समंदर दिन के उजाले में रात की रानी सा मुरझा जाता है। वो रात का बेपनाह इंतजार करता है। और दिन की उजली धूप में अपनी पलकों से आंखों की पुतलियों को कसकर भींच लेता है। और पुतलियों की सतह पर मढ़े चांद के चेहरे को निहारता है।

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आज पूर्णिमा की रात है...
ओह कि शाम हुई.. समंदर की धड़कनें बढ़ी.. और इस रात बदन पर हल्दी का लेप किए, माथे पर छोटा सा काला टीका लगाए, चांद आसमान पर उतर आता है। उसकी मदभरी आंखें, जुड़ी हुई धनुषाकार भोंहें, नाजुक सुर्ख होंठ, नुकीली उठी हुई नाक, चौड़ा ललाट और उसपर बिखरे काले बालों के गुच्छों पर समंदर की नजर ठहर जाती है.. और अचानक फूटी चांद की खिलखिलाहट, समंदर के कानों में घुलकर ह्रदय में घूमने लगती है। समंदर उस आवाज को पकडऩे की नाकाम कोशिश करता है, कि फिर चांद पर मोहित हो शर्म और प्रेम से भर जाता है।
चांद बेपरवाह हो आसमान में टहलता है.. और समंदर की आंखें लक्ष्यभेदी तीर सी चांद पर टिक जाती हैं..समंदर खामोश हो जाता है.. चांद समंदर की ओर मुड़ता है..
------- और फिर नीला पानी पीला हो जाता है....
चांद समंदर में उतरता है..जल में अपना रूप निहारता है.. अपनी कलाओं पर रीझता है..कि समंदर की गहराई को बांहों में भरने की कोशिश करता है...समंदर पीली रोशनी से भर जाता है ..
और फिर समंदर चांद को अपनी धड़कनें सुनाता है.. चांद समंदर के सीने पर कान रखे सुनता जाता है..
दिन बीतते हैं... रातें अमृत वर्षा करती हैं.. चांद समंदर का प्रेम हर रात बढ़ता है.. कि अंधेरा प्रेम का गवाह बनता है.. रोशनी प्रेम की सनद देती है... चांद हर रात आसमान में टहलता है.. समंदर धरती पर हिलोरें लेता है..
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ओह्ह कि अमावस की रात... और समंदर मर-मर जाता है.. वो आसमान की ओर मुंह करके जोर-जोर से चिल्लाता है .. चांद ओ मेरे चांद....
समंदर बेचैन हो विलाप करने लगता है.. वो चांद को ह्रदय में छुपा लेना चाहता है.. कि अपने होठों की छुअन से चांद के होठों को और सुर्ख कर देना चाहता है... समंदर भटकता है.. कि चांद रात को चुपचाप आने का वादा करता है..
आज पूरी धरती पर अंधेरा है.. नीले ह्रदय को खोले समंदर चांद का बेसब्र इंतजार करता है.. चांद धीमे से जमीन पर उतरता है..और समंदर के किनारे रेत पर बैठ जाता है.. समंदर बांहें फैलाता है.. ह्रदय से लग जाने का इशारा करता है.. समंदर की आंखें झरना हो जाती हैं.. उसकी सांसों में हजारों बेला-चमेली के फूलों की सुगंध भर जाती है.. उसकी प्यासी रूह अमृतकलश का आह्वान करती है.. पर चांद टस से मस नहीं होता..चांद ठूंठ सा बना रेत को कुरेदता है.. चांद के पांव पहाड़ों में जमे देवदार की जड़ों से रेत में जम जाते हैं..
समंदर की बेचैनी बढ़ती जाती है.. उसके भीतर उमड़ता प्रेम रस आंखों से आंसू बन टपकने लगता है। वह सांस रोकता है.. तेज कदमों से चलता है और किनारे आकर चांद के बाई ओर बैठ जाता है.. चांद की नजरें अभी भी जमीन में कुछ तलाशती रहती हैं...
समंदर हाथ का सहारा देकर शरीर को संभालता है.. और पुकारता है.. चांद ...

और एकाएक चांद के शब्द हवा में बहने लगते हैं....
समंदर मैं तुम्हारे ह्रदय में नहीं रह सकता और न ही मैं तुम्हें ह्रदय में छुपाकर आसमान में ले जा सकता हूं.. मैं आसमान में हूं और तुम जमीन पर.
जानते हो समंदर मैं आसमान में अकेला हूं, असंख्य तारों के बीच  नितांत अकेला.. ओ समंदर में पापी हूं.. शापित हूं.. कि मेरे नसीब में प्रेम नहीं है..
वह पुकारता है.. समंदर .... और फिर फफक उठता है...
मेरी २७ रानियां थी। मैं सबसे ज्यादा प्रेम रोहिणी से करता था..  आज भी करता हूं.. आगे भी करता रहूंगा.. जानते हो समंदर हम प्रेमासक्त थे... प्रेम ही दुनिया थी हमारी.. मेरी आत्मा में रोहिणी और रोहिणी की में मैं.. मेरे ह्रदय में रोहिणी के अलावा कोई नहीं आ सकता समंदर.. वो आज भी मेरी धड़कनों में बजती है.. उसकी महक मेरी सांसों में है.. उसका अंग-अंग मेरे शरीर से गुंथा हुआ है... मेरे चेहरे पर जो कांति तुम देखते हो, ये रोहिणी के प्रेम के प्रकाश से उपजी है.. उसके होठों की लाली आज भी मेरे होठों को सुृर्ख किए है... मैं सदैव रोहिणी का हूं... ओह्ह समंदर कि मैं शापित हूं.....
और चांद के गले की ग्रंथियां पीड़ा के द्रव से रूंध जाती हैं.. उसकी आंखों से सोता फूट पड़ता है.. उसके हाथ भिंचने लगते हैं... कि आत्मा इस कांतिमय आवरण को तत्काल छोड़ देने की गरज से पूरे बदन में घूम जाती है.. जीवन से मुक्त हो जाने का रास्ता तलाशती है...
चांद यकायक उठता है.. लडख़ड़ाता है.. मैं शापित हूं,, आसमान में चमकते रहना मेरी मजबूरी है.. तुम प्रेम न करो समंदर..मुझे भूल जाओ समंदर.. कहता हुआ कहीं गुम हो जाता है......
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समंदर मुस्कुराता है... धीमे से बोलता है...
ह्रदय समंदर था... सैलानी मौजी था...
ह्रदय समंदर था... सैलानी मौजी था...
और समंदर का पानी किनारे पर आकर ठहर जाता है...सांसें फैफड़ों में जाने से पहले ही वापस सांसनली में लौट आती हैं..कि गहराई से जीवों के दम घुटने से दबी हुई चीखें गूंजती हैं....
समंदर को दौरे पे दौरे आते हैं.. मौजें धमनियों में जमे लहू सी दर्द ले लेकर आगे बढ़ती कि शिराओं में झटकों के साथ लौटती और आकर ह्रदय को हिला जाती.. सब शारीरिक तंत्र विफल हो गए. नाड़ी मनमानी पर उतर आई.. धड़कनें आवारा हो भटकती हैं.. और करोड़ों चीखें कराहती हैं..

उधर न्याय की अदालत में चांद दलीलें दे रहा है.. अदालत समंदर का इंतजार करती है..समंदर होश को कंधे पे डाल पगडंडियों में भटकता है.. कि अदालत में लकड़ी का हथौड़ा तीन बार टंकारता है.. पूर्णिमा की तारीख तय होती है..

समंदर अपने पैरों के नीचे जमीन खोखली बना देना चाहता है.. सर पर मंडराता आसमान उसका दम घोंटता है.. वो आसमान को फाड़ देना चाहता है.. हाथों से हवाओं को दूर भगाता है..
समंदर अब आत्महत्या करना चाहता है.. वह डूब मरना चाहता है.. पर खुद से गहरा उसे कुछ नज़र ही नहीं आता.. वह आत्मदाह के लिए उठता है.. पर आग उसका पानी देख भाग जाती है.. उसे कूद जाने के लिए कोई छत नहीं मिलती.. वो जहर ढूढ़ता है.. पर वो तो पहले ही मंथन में निकलने के बाद शिव के कंठ में समा गया..
समंदर शंखिया खाए जानवर सा घूमता है..पागल हो किनारों से टकराता है.. भीतर जाता है... फिर वापस आकर किनारों से सर मारता है..
समंदर घुटनों के बल बैठ जाता है.. दोनों हाथ उठाता है.. और खुदा से दुआ में मौत मांगता है.. पर खुदा रो पड़ता है.. लेकिन वो भी उसके खारी जल में कुछ बूंदें आंसुओं की टपकाकर लौट जाता है..
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आज पूर्णिमा की रात है...
चांद आसमान पर है... रात के बारह बजे हैं... आसमान पीला है...
समंदर बेचैनियों के टापू में बदल चुका है. वह जोर-जोर से हंसता है...फिर रोता है...फिर हंसता है और फिर हंसता रहता है.. कि अपने दोनों हाथ समेटता है.. अपनी छाती अपने नाखूनों से फाड़ता है और अपने ह्रदय को निकालकर चांद की ओर उछाल देता है..तब तक उछालता है...जब तक कि पस्त नहीं हो जाता....

सुबह सुबह ... तीसरी कक्षा में आवाज गूंजती है...
मास्टर जी पूछते हैं.. कौन बताएगा कि पूर्णिमा के दिन समंदर में ज्वारभाटा क्यों आता है ?

Friday, October 24, 2014

निर्जीव...
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मन हो रहा है..
निर्जीव हो जाऐं...
सांस खींचने की बेताबी और बाहर फैंकने की अकुलाहट से शून्य,
आंख, कान, नाक जैसी तमाम ज्ञानेंद्रियों से मुक्त,
ओह्ह...
मन कह रहा है कि बन जाएं पंखा..
छत के कुंदे पर टंगा हुआ,
कि किसी हवापसंद की हसरत भरी नजरें
टकरायें बटन से,
फिर रेगुलेटर से और फिर बिजली के मीटर की जलती-बुझती रोशनी से
और पंखा.. वो तो लटका है अछूत सा,
पिछली दिवाली से नहीं झाड़ी गई है जिसकी धूल
लेकिन, खैर...
हम जो कि पंखा हैं..
-- घूमते रहें, घूमते रहें, घूमते रहें और बस घूमते ही रहें...

या बन जाएं,
४५ रुपये वाला दिवाली का बंपर रॉकेट
जिसमें दो मासूम हाथों ने भरी थी बारूद,
जिसे दो सख्त, चमकीले हाथों ने रख दिया हो गली के बीचों-बीच,
इक  ईंट के टुकड़े से सटाकर
फिर डरते-डरते छुवा दी हो आग, आधी जली, आधी बुझी सी..
लेकिन..खैर...
हम चूंकि रॉकेट हैं ना..
सांय से उड़ जाएं भड़कीली सरसराहट लिए,
और बिखर जाएं आसमान में जुगनुओं की तरह...

या बन जाएं
एक तकिया, बिना गिलाफ का,
जिस पर रखता हो सर कोई,
तेल-फुलेलों का शौकीन,
लंबे, कड़े, जटानुमा, जीवोंयुक्त बालों में
लगाता हो दिन में कई दफा बदल-बदल कर
चमेली, आंवला, कियो-कार्पिन, नारियल, पानी घुला सरसों का तेल
या तेल अरंडी या शीशम का भी..
जिस गंध में सजीव लोगों को आती हों उबकाइयां..

लेकिन..खैर...
हम जो कि तकियां हैं, बिना गिलाफ का
एकदम निर्जीव, गंध से शून्य,
तो रात भर रगड़ते रहें, रगड़ते रहें, और बस रगड़ते रहें
अपना वजूद , उसकी जटाओं से ...

अहा... कितना मजेदार है... निर्जीव हो जाना....और सुखदायी भी.. !!!!

( खैर विकल्पों की भरमार हैै
बस निर्जीव होने की दरकार है... )













Saturday, October 11, 2014


तुम एक पोटली हो,
बिना रोशनदान वाले घुप्प तहखाने में रखी हुई,
जिसमें ठूंस-ठूंस कर भरी है सकारात्मक ऊर्जा
और एक टुकड़ा प्रकाश का भी....

पोटली के मुंह पर लगी गांठें,
कस गई हों भीतर के दवाब से,
पोटली बदल गई हो एक गठीले नाजुक बदन में,
और प्रकाश में घुली ऊर्जा भीतर से झांक रही हो ठीक ऐसे जैसे
त्वचा में उगे नर्म, मुलायम रोंये...
वो सकारात्मक ऊर्जा बेंधती है अंधेेरे की परतों को,
जैसे सूरज के तन से फूटी धूप बेंध आती है ओजोन की इक परत,

पर ओ पोटली...तुम क्यों चाहती हो
तहखाने की कैद से फरार होकर सूरज की धूप में मिल जाना..
क्यों हो इतनी बेताब..बेकल, बेचैन ?
ज़रा गौर से सुनो..
तुम अंधेरे में तराशी गई हो,
तहखाने की नमी में ढाला गया है तुम्हारा बदन,
सन्नाटे की गूंज में नाचती रही हो तुम आजतक,
खुद के ही बनाए गीतों पर आंखें मूंदकर..

ज़रा जानो पोटली
तहखाने से मुक्त हो, जब सूरज की धूप में खोली जाएंगी तुम्हारी गांठें, या खुद ही मुलायम झटके से पूरी खुलकर,
तुम फैला दोगी अपने चारों कोने जमीन पर,
तो रंग-बिरंगी तितलियां बन उड़ जाएंगी,
तुममें सदियों से महफूज़ रही रश्मियां,
हवा मुठ्ठियों में दबाकर ले जाएगी तुम्हारी ऊर्जा,
और बिखेर देगी सदियों से खाली आसमान में,,,
तब तुम रह जाओगी रेशम का छोटा सा चौकोर कपड़ा भर,

जाओ , हम तुम्हें मशविरा देते हैं,
बैठी रहो तहखाने में चुपचाप,
कि दरारों से रिसते तेज को देखकर, आएंगे कुछ नकारात्मक जीव,
और उन दरारों पर मुंह सटाकर, अपनी सांसों में भर ले जाएंगे छटांक भर सकारात्मक ऊर्जा


....जीओ..... प्रिये




                                              

Tuesday, July 29, 2014

__ सिर्फ " एकतरफा प्रेमी " कहे गए प्रेमियों को समर्पित.....

तुम्हारा प्रेम,
जिसके लिए नहीं है कोई जगह
न‌ दिल, न दुनिया, न किसी मुहोब्बत के मकबरे में...
जिसकी आहटें खुले में भरती हैं सिसकियां, और
ठंडी बौछारें बनकर उड़ जाती हैं मिलन की महफिलों में..!!

_____ओ ..प्रेम के सरकंडे से व्हेल सी जिंदगी हांकने की जिद करने वालो.....
मत फैलाओ हाथ कि कोई दे तुम्हें प्रेम दया में..
या बस एक बार कोई भर ले तुम्हें अपनी बांहों में,,
और जड़े चुम्बन तुम्हारे होठों पर....... चाहे बस पहली और आखिरी ही बार....
____मत आस करो कि तुम बन जाओ मुहोब्बत के परवाने,
और कोई लौ जलकर तुम्हें खाक करे.
या कोई सजाए तुम्हें अपनी चारदीवारी में गमले का पौधा बनाकर...और निहारे तुम्हें सुबहो-शाम
मत मांगों भीख ,...
तुम्हारे प्रेम को एकतरफा करार देने वाले, मिलन में उलझे, बौने दिल के आदमकदों से,

अपने भीतर उत्पन्न प्रेमरक्त से इस धरा को सींचने वालों,
ओ जंगल के मदमस्त वृक्षों !
तुम्हारी सांस से सांस लेती है ये जमीं..
प्रेम की निश्छल, निस्वार्थ, निष्कपट धरोहरों
तुम ही प्रेम हो, हकीकत हो, तुम अनंत हो...!!!!

_______सुनो.... एकतरफा प्रेमी कहकर उपेक्षित किए गए प्रेमियों...
आज ये लड़की करती है तुम पर अपना सर्वश्व निछावर
ये बोलेगी तुम्हारा मौन...
और इसकी कविताओं में होगा तुम्हारा वास......
सदैव.....
एक राह खुली है अभी-अभी
दूर जंगल की ओर..
और मुझे जाना ही होगा...
पहाड़ से चढ़कर,
बादलों की गरदन से लटककर
हवा का हाथ पकड़कर
कोई बैठा इंतजार कर रहा है ...वहां मेरा,
वही जो संसार में प्रेम ढूंढ़ते-ढूंढ़ते जा पहुंचा था निर्जन द्वीप पर
और खोद-खोद के ढूंढ़ निकाला था उसने एक जंगल.....।।



आज फिर किसी ने मुझे बद्दुआ दी,
आज फिर सुबह किसी ने लंबी उमर की दुअा दी.. ।।
प्रेम संबंध न सही..दर्द संबंध ही सही...।।
तेरी बेरुखी से पनप रहा है एक सन्यास मेरे भीतर..
मेरी मौजे-बेतकल्लुफी पर न खुद को सुलगाइए जनाब..
अपन तो पानी भी जाम के अंदाज में घूंट-घूंट पीते हैं....।।
जब तुम आओगे प्रीतम...
तुम्हारे बदन की गंध को भर लूंगी सांसों में
तुम्हारी छुअन को चिपका लूंगी होठाें पर
और आंखों की पुतलियों पर मढ़कर तुम्हारी तस्वीर
भींच लूंगी जोर से पलकों को...।।
         बस तुम आ जाओ प्रीतम...।।

--------- किसी देवी के अनुरोध पर किसी देवता के लिए लिखी थीं..
गीत
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मैं खुले आसमां का पंछी
मैं नीला मुक्त समंदर हूं
मैं मस्त हवा का झोंका हूं,
ना बाहर हूं ना अंदर हूं...
ना जान सका कोई मुझको
जंतर-मंतर छूमंतर हूं
मौजें ही मेरी मस्ती हैं
मैं पागल मस्त कलंदर हूं...।।

मैं बेफिकरा, मैं बेफिकरा,मैं बेफिकरा हुआ,
मैं मस्त फकीरों का दिकरा, मैं बेफिकरा हुआ...।।

मैं मधुर तान पै बंसी की बस राग मुहोब्बत गाता हूं,
बुझ चुके दिलों में मीठा सा,मैं प्यार का दर्द जगाता हूं..
ले हाथ खिलौना सारंगी, बस प्यार-प्यार चिल्लाता हूं
कोने-कोने भटका फिरता, फिर बात यही दोहराता हूं..
मैं हीर और रांझे का जिकरा ...
मैं बेफिकरा हुआ.....

ना दुनिया की परवाह मुझे, अपनी मस्ती में रहता हूं..
जग अल्लाह-अल्‍लाह कहता है, मैं प्रीतम-प्रीतम जपता हूं..
मैं प्रीत के खेल का बाजीगर, दिल की बस्ती में बसता हूं
मैं आंखों की भाषा कहता, ना बात जुवां से करता हूं..
जग लाख कसे मुझपै फिकरा..
मैं बेफिकरा हुआ....।।
सन्यास, सन्यास, सन्यास, जानती भी है तू...??
क्या होता है सन्यास...???
ओ नादान लड़की..
ये कोई अवस्‍था नहीं है जो बुढ़ापे की तरह एक दिन आएगी ही, या जिसे प्राप्त करने के लिए तप किया जाए...
यह तो बस भाव है, जो बिना गेरुआ वस्‍त्र पहने, बिना घर त्यागे और बिना जंगल की ओर प्रस्‍थान ‌किए...खुद पैदा होगा....
और इसका परिणाम होगा शून्य...हां वही अनंत...अनंत....अनंत.....।।

 गीत
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टूट्टे दिल से फूट्टा सोत्ता
झर-झर बरस रहा है नीर
ओ अलमस्त निगोरे सावन
तू क्या समझे मेरी पीर... ।।

आंख्‍खां बिच्च बैट्ठी इक मूरत,
धुल-धुल के उजली हाेई..
वेख, वेख प्रीतम को बिरहिन
हूक-हूक भर के रोई,
दुनियाभर उपचार किया, पर नहीं भरी इस ‌दिल दी चीर...
ओ अलमस्त.... ।।

घनन-घनन जब बरसे सावन
सीने में बिजली कड़के
जिस्म के भीतर सांस घुटे,
और बाहर अंग-अंग तड़पे
आंसू पीयूं पानी रोऊं, ज़ख्म ज़ख्म हूं मैं दिलगीर.. ।।
ओ अलमस्त...... ।।

Sunday, July 13, 2014

प्रेम-संवाद
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ओय लड़की....!!
तुम्हारा फेवरेट सब्जेक्ट कौन सा है..??
क्यूं..??
ऐसे ही पूछ रहा हूं..।
हम्मम..प्रेम...और तुम्हारा..???
अरे ये भी सब्जेक्ट होता है..आज मालूम हुआ....खैर....मेरा है गणित..
अच्छी बात है...दो मिनट ठहरो..जरा इस बच्ची से बात कर लूं..
तुम रहोगी पागल ही !!
साठ रुपये के भाव एक किलो इतने मीठे आम खरीदे.. आधा किलो रास्ते में ही बांट चली, अरे जब वो पैसे मांग रही थी..तो वही क्यों नहीं दे दिए...?
वो इसलिए कि हम गणित नहीं पढ़े ना....हाहाहा..वैसे एक बात कहूं प्रीतम
इन आमों की मिठास, इनकी दुआओं में घुलकर पहले ही हम तक पहुंच चुकी है...तुम्हारे रूप में...
अब तुम बैठकर गणित लगाओ कि हमने इन्हें क्या दिया...??
और हां उत्तरमाला हमारे हाथ में है....!!!!!!


स्टुपिड सावन
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बद्तमीज ताे तुम हो..निहायत बद्तमीज..!
कई बार पहले भी...
तुम पर अपनी जवानी के दर्जनों बसंत लुटा चुकी, लड़कियों के मुंह से,
तुम्हारे चर्चे सुने..
पर तब हम बच्चे थे..
अपने मादक रूप-रंग और
रैमन मोनेगल, फ्रेडरिक माले या ज्यूनिपर रिज जैसी
तमाम सुगंधियों को भी मात देने वाली जादूगरी महक से,
मासूमों को मोहजाल में फंसाने वाले,
ओ दगाबाज....
तुम कईयों के दिल में उतरे,
किसी को सुलगाया, किसी को धूंआ किया, तो किसी को राख करने के बाद,
अपनी शुतुरमुर्गी गर्दन उठाकर चलते बने...
आज फिर तुमने एक मासूम लड़की पर नजर डाली..!!
और लड़की पर पानी को टुकड़े-टुकड़े कर बनाई गई तेजाबी बूंदों के छींटे मारे...
वो भी तब...
जब वो तुम्हारी बेशर्म छींटाकशीं से बचने की को‌शिश में,
अपने गले से दुपट्टा खींचकर, बदन को लपेटने की जद्दोज़हद कर रही थी...
खैर...
तुम निपट भोगी....
आदतन बरस-बरस कर हमें ‌भिगाते चलो..
हम भीग-भीग के फिर सूखते जाएंगे....---------स्टूपिड " सावन "...

Monday, June 16, 2014

गीत
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मैं तो तेरे नाल जिंदणी बिताबां ढोलड़ा
माहिया हीरिया सोणिया.....
तेरे बिन दुनियान छंड़ जावां ढोलड़ा
माहिया हीरिया सोणिया....
गर तू न मिला मैं तो मर जावा ढोलड़ा
माहिया हीरिया सोणिया......

तेरे लई असी सारी दुनिया भुला बैठे
दिल बिच्चो दीवा तेरे प्रेम दा जला बैठे
बनके पतंगा ओदे दीवा उत्ते जा बैठे
    जल-जल बस यही गनुगुनावा ढोलड़ा..... माहिया हीरिया सोणिया
    तेरे संग जीऊ संग मर जावा ढोलड़ा......माहिया हीरिया सोणिया ।।
तू ही मेरा माही तू ही मेरा दिलदारा वे
जिंदड़ी दी आस तू ही जीने दा सहारा वे
संग तेरे यारा दुख-सुख हैं गंवारा वे..
असि रज्ज रज्ज मन्नता मनावां सोणिया..मोहिया हीरिया रांझड़ाा...

भजन
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राधे जू के नाम की
रटना लई लगाय
श्री चरणों में प्रेम का
दीपक दिया जलाय
तज आई संसार, सिर
दर पै दिया झुकाय
लाज रखौ चाहे छोड़ दो
या दो दीप बुझाय.......।।

मेरी अरज सुनो राधे
मेरी विनती सुनो राधे
मेरी प्राणप्रिये राधे
मेरी कृष्‍णप्रिये राधे

हम द्वार तुम्हारे बैठे हैं
यह सोच हिया मुस्काय रहा..
दृग में छवि स्वामिन की भर के
मन राधे जू राधे जू गाय रहा
मोहे दरस तो दो राधे....मेरी ओर तको राधे.....।।

मैं प्रीत की चाह में भटक रही
मोहे प्रेम का राग सुना दीजै
मैं नीर रहित सूखी बदरी
निज नेह का नीर बहा दीजै
मेेरे हिए बसो राधे......मुझे प्रेम करो राधे.......।।।

हम शरण तुम्हारी आ पहुंचे
अब तन मन की परवाह नहीं
तुम माफ करो या प्राण हरो
मुख से निकलेगी आह नहीं
मुझे यूं न तजो राधे.......मेरी बात सुनो राधे......।।
 
गीत
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बंद आंखों से दिखती है सूरत तेरी
नाम से तेरे चलती हैं सांसें मेरी
तू ही मेरा खुदा बन गया.....माहिया.....।।।

बंदिशें भी खला
पर तू भी नहीं...
प्यार था खो गया..
बाकी कुछ भी नहीं
जिंदगी बिन तेरे क्या कहूं जाने-जां
आंख से नूर सा बह गया......माहिया......।।

कब से प्यासा हूं मैं
बस तेरी जुस्तजू
तेरी बारिश में भीगूं
मिले तब सुकूं
तुझसे ढक लूं मैं खुद को परत-दर-परत
तू मेरा आशियां बन गया.............माहिया......।।
भजन
------------

तुम लाख न दो दर्शन हमको
अपने दर से महरूम रखो
चाहे दुनिया में लाके हमको
इन श्री चरणों से दूर रखो
पर सुन लो मेरे रघुराई
प्रीतम मेेेरे गाेविंद मेरे...

मन में विश्वास घनेरा है
मैं तेरा हूं तू मेरा है....
ये रात भी छंटने वाली है
आएगा जल्द सबेरा है....
तू मेरा मेरा मेरा है....
मैं तेरा हूं तू मेरा है...।।

दुनिया में मझे क्यों जन्म दिया
क्यों नाम दिया क्यों काम दिया
धन माया मोह के आडंबर में
फैंक मुझे गुमनाम किया
मैं पापी बन भटका फिरता
जीवन भी गर्क तमाम किया..
जिस परमपिता का अंश था मैं
उस नाम को भी बदनाम किया..
         छाया घनघोर अंधेरा है...................मैं तेरा हूं तू......।।।

तुमने मुझको छोड़ा क्यों था
मुझसे प्रभु मुंह मोड़ा क्यों था..
इस नश्वर देह को देकर के
मन से रिश्ता तोड़ा क्यों था..
तुमने ही मुझे डुबोया ‌है
अब तुम ही मुझे उबारोगे
जो बिखर चुकी है रूह मेरी
अब तुम ही उसे संवारोगे
           तोडो ये सांस का घेरा है............मैं तेरा हूं तू.............।।

तु हो न हो हासिल मुझे
है हक तेरा मरजी तेरी...
पर मैं हुआ धनवान
तेरा नाम मेरे पास है.....।।

तेरी आस में मेरे गिरधारी
दुनिया को तज आया हूं मैं
छोड़े झूठे सब आभूषण
मस्तक ब्रज रज पाया हूं मैं
मेरे मन के प्रीत समंदर का
नंदलाल किनारा तुम ही हो
मझधार के बीच फंसे तृण का
एकमात्र सहारा तुम ही हो...
             तेरे चरण ही मेरा डेरा है......मैं तेरा हूं तू .........।।


-------------------------------------------
मैं सोच रहा बैठा बैठा
नित स्वप्न मैं यही मनाता हूं
इक बार मिले अवसर मुझको
बस आस मैं यही लगाता हूं
हे मेरे प्रभु मौका दो मुझे
आज मैं तुमको सजाऊंगा
राधा जैसा श्रंगार करूं
तुम्हें मोहिनी रूप बनाऊंगा.......

तम की कारोंच खुरचकर के
तुम्हें काजल आज लगाऊंगा
सूरज से उजाला लेकर के
बिंदिया में उसे सजाऊंगा
पेडों से चुनुंगा हरियाली
चुनरी हरियल पहनाऊंगा
फूलों से लेकर मधुर रंग
तुम्हें लाली लाल लगाऊंगा
              मेरी तो आस लगी तुमसे...यूं ही बीते सांझ सबेरा है....
              मैं तेरा हूं तू मेरा है.....।।



गज़ल.....मां..
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पीछे से किसी ने आवाज लगाई
आज फिर मुझे मां याद आई..।।

मस्त कदमों से बढ़ रहा था ख्वाबों का ‌काफिला
फिर अचानक आंख में नमी सी उतर आई..।।
फिर मुझे मां.....।।


फितरते-रफ्तार थी मैं बोलता चला गया
फिर किसी एक शब्द पर जुबां लड़खड़ाई....।।
फिर मुझे मां..........।।

चौंककर देखा पलटकर मां न मां का नामोनिशां
दिन की पक्की धूप में फिर रात सी घिर आई....।।
फिर मुझे मां....।।

मैं खड़ा करता रहा ईंटों के आशियाने यहां
पर खुदा से जो मिली वो नींव ही गंवाई....।।
फिर मुझे मां......।।

रोता हूं मैं
तू है कहां..
ढूंढू तुझे
यहां से वहां..
अब हो कही तू आ भी जा..
तुझमें बसी है मेरी जां....
ओ मां.....



गीत
-----------------

सावण घिर-घिर बरस दिया
बागां बिच हरियाली छाई
मन दा सहरां प्यासा रह ग्या
जिंदणी बिच्चो रुत्त नहीं आई....।।

हर ओर अब्र बरसा घिर-घिर
दरिया बिच्‍च जवानी सी छाई
हम नील समंदर पी बैठे
ओठां दी प्यास न बुझ पाई...।।

असी प्रेमी ते माशूक भए
ख्वाबां बिच्चो रवानी सी आई
जो था अपना सब बांट दिए
जग के बन बैठे करजाई....।।

साज्जन संग बैठी सजणी की
जब प्रेम चुनर उड़ उड़ जाई
असी वेख वेख आहां भरदे
इक टीस जिगर बिच्चो उठ जाई..।।

तेरे बिन जिंदणी नाकाम रही
बिन तेरे कज़ा भी नहीं आई
गर हो सकियां अहसान करो
मेरा कत्ल करो ए हरजाई...।।


Wednesday, May 21, 2014

प्रेम कविता


ओय ..पागल...
पागल हो तुम निरी पागल....डूबी सी रहने वाली पागल..
देखो हम तुम्हें कहे देते हैं..
अपनी गर्लफ्रेंड वाली गाली हमें न दिया करो..
वरना..
हा हा हा..
वरना क्या ..हम्मम..!!
लो अब बार-बार कहेंगे पागल..पागल..तुम पागल हो..पर बिल्कुल मेरी तरह..
सही है...
कह लो बाबू पागल..
किसी दिन हो जाएंगे..तो मिलेंगे भी नहीं तुमसे,
कहीं किसी अंधेरी-कोठरी के किसी कोने में....
घुटनों में सिर दिए..! रो रहे होंगे....!!
तब हमारी सिसकियों की आवाज भी नहीं पहुंचेगी तुम तक..
पर तुम कराह उठोगे,
...........कहीं दूर देश में बैठे हुए...
हां प्रिय एक दिन ...उस दिन...!!!


Monday, May 5, 2014

बातें जो तुमसे कही गई पर तुमने सुनी नहीं............
_________________________________________


1...ओ प्रिय..
आओ....
मैंने बिछा दी है गोद अपनी..
इसमें रखाे ‌सिर अपना...
ओढ लो मुझको...और सो जाओ...

2....आज मेरा मन है कि बद्तमीज हो जाऊं....
और घायल कर दूं तुम्हारे होठों को अपने होठों से....।।


" काश् ..शराबी होते पीकर चैन से सोते..
आंसुऔं की लत ने बरबाद कर दिया..."
" 'शबभर बरसीं आंखों से जवाब माकूल मिला
लोग हमारी अच्छाइयों का अब देने लगे हैं सिला....."
दिन में रौनक-ए-हयात..
रात में श्मशान होती है...
मुईं... जिंदगी जंतर-मंतर हो गई...!!!!!
"" क्या सूरज क्या चांद से वास्ता अपना....
.....हम तो पतंगे थे दिए पै जल मरे"" ....

Thursday, May 1, 2014

"ऐ खुदा अब डूब जाऊं तेरे दरिया-ए-खुलूस
इस जमीं के नाखुदाओं ने डुबोया है बहुत "....।।
हो समझ तो जान अहमियत अपनी.....
तेरे बिना मुझे न जिंदगी मिली, न मौत ही आई.....।।
बात इतनी सी है सूरज चांद में छुप जाएगा
एक दिन जिस पल मिलेंगे मैं और मेरा खुदा....।।
भजन
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कर ले कर ले परिक्रमा तू गिरिराज प्यारे की
बरसेगी घनघोर कृपा तुझपै गोवरधन न्यारे की..।।

सात कोस की लंबी दूरी
उछल कूद के कर लियो पूरी
लेकर निकलो आस अधूरी
श्री गिरिराज करेंगे पूरी
बस जाएगी नैनन में छवि ब्रज के पालनहारे की...।।
बरसेगी......................।।

मुडिया-पूर्णिमा के मेला पर
छप्पन व्यंजन भोग लगे हैं
सुर ग्रह मुनि उतरे पर्वत पर
करतल जै जै कार करे हैं
तबियत होगी चंगी देख छटा गिरिराज प्यारे की......।।
बरसेगी.........................।।

दंडौती दे पाप भगाओ
मानसी गंगा डुबकी लगाओ
जन्म-मृत्यु से तुम तर जाओ
प्रभु के चरणन में बस जाओ
तुझको मिल जाएगी झांकी बृषभानु दुलारे की.....।।
बरसेगी......................।।

नित उठ परिक्रमा दे आओ
राधेश्याम की टेक लगाओ
खाली हाथ गोवर्धन जाओ
झोली भर भर के ले आओ
देखो लीला अपरंपार मेरे श्री कृष्‍ण के प्यारे की...।।
बरसेेगी.....................।।
कर ले कर ले...................।।

ये है गांव पूंछरी भाई
जाकी सुनी है जगत बड़ाई
राम भक्त हनुमंत कहाई
श्याम भक्त हैं लौठा भाई
कि जाईकै मिलि लेओ, लेयो बलइयां, सखा की कृष्ण मुरारी की
-------
आओ  जतीपुरा पे आओ
देख मुखार-बिंद सुख पाओ
रबड़ी रसगुल्ला मेवन को
छप्पन व्यंजन भोग लगाओ
कि तृप्ति होगी तेरी, होगी कृपा जब जगत दुलारे की
-------
चलो चलें अब कुसुम सरोवर
जाकी झांकी बड़ी मनोहर
देख देख जब मन हरषेगा
बैठ भजेंगे गिरधर गिरधर
कि राधे नाम के संग में जै बोलेंगे बंसी बारे की
------
परिकम्मा में सुनो रे भाई
राधे श्याम कुंड पे जाई
जो जो बहिनें दीप जलाई
सबकी होगी गोद भराई
कि आंगन में गूंजेगी किलकारी नटखट मतवारे की
-------
मन के कष्ट निकल भागेंगे
सोए भाग तेरे जागेंगे
बृज रज उड़ मस्तक बैठेगी
देव भी तेरा यश गावेंगे
कि तुझ को मिल जाएगी चाभी तब फिर प्रभु के द्वारे की
--------
परिकम्मा तुम कर लियो पूरी
कभी न छोड़ो आधी-अधूरी
क्षमा करो पापों को प्रभुवर
फिर तुम लो प्रभु से मंजूरी
कि तेरे फंद कटेंगे मिलेगी ज्योति कांवर कारे की
--------

some shorts......



. राम का नाम भजे हनुमंता
श्याम का नाम भजो भई संता

. राधा कुंड मनोरम धाम
श्याम कुंड पर कर विश्राम

. आओ चलो चलें गोवरधन
 पहुंच करें गिरिराज के दर्शन

. कृष्ण भजो संग राधा नाम
पूरी आस करेंगे श्याम

. बृज रज बृज का है वरदान
मस्तक धर सिंदूरी जान

. गिरि की देख छटा घनघोर
घिरि घिरि रंग बरसे चहुंओर

. परिकम्मा है अति सुखकारी
यहां विराजैं राधे प्यारी

. आओ गांव पूंछरी आओ
श्याम सखा को शीश नवाओ

-------------


 

Wednesday, April 30, 2014

" एक कान से सुन तुरंत दूसरे से विदा कर देते हैं बातें उनकी..
और लोग हमें निहायत भरोसेमंद समझते हैं".....।।।
"आरजू-ए-जिगर पूरी हो जाए...
ऐ खुदा मुझे क़ज़ा आए..क़ज़ा आए."......

Monday, April 28, 2014

कविता
-------------
पिण्डदान

प्रेम के वो सफेद , खुशबूदार चावल
‌सिर्फ तुम्हारे लिए...
खुद ही बोए, सींचे, गुडे, काटे, साफ किए..
और इंतजार की भट्टी पै,
सूखी-सूखी स्मृतियों की मंदी आंच जला खुद ही पकाए थे..

सुगंध में डूबी रही मैं...
कुछ लड़खड़ाते आए तुम...
और फिर..
चावलों को देखकर नाक-मुं‌ह मारने वाले,
गेंहू से पेट भरकर लौटे,
ओ......बौने दिल के आदमकद इंसान,
जानते हो...??
तुमसे उपेक्षित ये चावल पड़े थे दिलनुमा पतीले में पिछले कई दिनों से..,,,,,
देख रहे थे इंतजार पल-पल खुद के उपयोग का....
पर
अब..
देखो और सुनो..
हर क्षण के श्राद्ध से मुक्ति के लिए,,,
यादों के वस्‍त्र त्याग,
उफनती आंखों के किनारे बैठ...
झड़ते खारी जल के छींटे मार,
इन्हीं चावलों के पिण्ड बना,
कर दिया हमने तुम्हारे प्रेम का पिण्डदान आज .....
                     ....ओ...... प्रिय......हम मुक्त हुए.... ।।


Sunday, April 27, 2014

कविता
-------------

"प्रयोग के आदी" हमने शौक-शौक में यूं तो की थीं हत्याएं बहुत...
आज मारने पर उतारू हो गए,
प्रेम नाम के पंछी को....
और इस तरह,
दबाते गए---दबाते गए---दबाते गए गला....
____ आज अंतिम सांसें गिन रहा है
उठा के आईसीयू में डालें ..
या दें एक और झटका,,,,,
और टूट जाए सांसों की लड़ी.......!!!
बहुत से बहुत एक हत्या का इल्जाम और सही........@!!!! ??
" एक कान से सुन तुरंत दूसरे से विदा कर देते हैं बातें उनकी..
और लोग हमें निहायत भरोसेमंद समझते हैं".....।।।

Friday, April 25, 2014

 गीत...
-------------
 
जब जब चले पुरबाइयां
तेरी याद आईयां, 
दिल बिच हूूक उठ आईयां
तेरी याद आईयां.......

बिना तेरे खुशीनू ख्याल नहीं आॅन्दा
जलसे, समारोहान जीऊ नही लागदा
हंसी बिच असी रो जाईयां...।।
तेरी याद........।।

रजि रजि याद आयें तेरी सारी बातानू
दिल ‌बिच्चो जम गई साड्डी मुलाकातानू,
पकड़ी जो तूने थी कलाइयां......।।
तेरी याद......।।

देख तस्वीरां तेरी असी रोज सजदीं,
चूड़ियां कलाइयां तेरे नाम दी पहनदी,
हिना बिच्चो तू ही रच जाइयां.......।।
तेरी याद........।।

रस्ता उड़ीख आंखा दिन भर जलदी,
रात भर तैनूं याद करके बरसदी,
दुःख साड्डा किसनूं सुनाइयां....।।
तेरी याद........।।

Thursday, April 24, 2014

भजन
--------------

राधा और श्याम रटै रसना..
निज दरशन करें दुलारी के..
नित आठ पहर की सेवा में 
हम चाकर राधा प्यारी के..।।

जग के महलों की चाह नहीं,
हम प्रीत की छांह में आय गए।
जनमों-जनमों की प्यास बुझी..,
जल मानसरोवर पाय गए..।
सुख, चैन, परम आनंद मिला जब से हम भए दुलारी के...।।
नित आठ पहर की................।।

हम चाकर बन के मस्त भए
बस राधे राधे गाय रहे,
दिन रैन, सुबह और शाम में प्रेम का
एक ही राग बजाए रहे...।
वो प्राणप्रिए हम सब की हैं हम हैं बरसाने बारी के....।।
नित आठ पहर की................।।

पलकों से साफ करें रस्ता
अंखियन के दीप जलावत हैं...
पुतली में बसाय मनोहर छवि
मृदु कंठ से गीत सुनावत हैं
हम हर पल बैठे मुसकावैं दरशन कर प्राणन प्यारी के...।।
नित आठ पहर की................।।


पलकों से साफ करें 

भजन..
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किन्ना सोणा लगदा है मेरा गिरधारी,
मैं तो हारी हारी हारी साड्डा दिल हारी..।।

सावंरा सलोना मेरा माही बड़ा जंचदा,
आंखा  कजरारी कारी मोर पंख सजदा
घुंघराली लट गल फूल माल रचदां,
ओठां बिच मुरली लागे बड़ी प्यारी......।।
मैं तो हारी......................।।।

रूप तेरा वेख राधे दुनिया भुलाएनी,
तेरे नाल बैठ मंद-मंद मुस्काएनी,
मोहना दी झांकी प्यारी मन में बसाएनी
तुआड्डी तीनां लोकन दे छवि न्यारी..।।
मैं तो हारी.......................।।

तैनूं वेख वेख मेरा मन हरषाइयां,
जित्‍थे जावा उत्‍थे तेरी मूरत ही पाइयां
तेरे बिना चैन एक पल नहीं आईयां
तेरी सूरतानि बारि जावां बनवारी..।।
मैं तो हारी......................।।


Friday, April 18, 2014

तुम खुद को खुदा मानकर बैठे रहो..
लो आज से हम नास्तिक हुए.........!!!!!!!!!!!

Wednesday, April 16, 2014

गीत....
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दिल नूं और न यूं तरसा रे
आके आखां बिच बस जा रे
अज्ज छाने दे इश्क दी बहार
दर्दे जी नूं मिल जाएगा करार
तू आजा इक बार जांणिए..
माहिए..रांझिए....
कि देदे मैंनूं प्यार सोणिए...
बलिए..हीरिए...

जब से ही देख्या तैनू मन में तू बस गई,
मुस्कुरा के सोणी कुड़ी कत्ल मेरा कर गई..
छांड़ के तो मत जा यार,
बातां प्यार भरी कर दो चार..।।
तू आजा.................।।।।।


सांची बोलता हूं, तेरे बिन जी न पाऊंगा,
तू जो मिल गई तैनें पलकां पै सजाऊंगा....
इस पगले दी तू ही सरकार
अब बन भी जा मेरी दिलदार......।।

तू आजा.........................।।।
कविता...
-------------------
आजकल रात में अक्सर..
भड़भडाकर खुल जाती हैं आंखें !!
टूट जाती है सपनों भरी नींद
गला सा रुंधता है, कुछ दम सा घुटता है..
होठ सूखते हैं,
फेंफडे सुबकते हैं,
हवा के एक अदद झोंके ‌की चाह में तड़पते हैं..
........बदन पै आने वाली इस आपदा ‌का ये आलम तब से है..!!!!!
जब से उग आया है...
एक "चार मंजिला मकान"
मेरे दुमंजिले पर बसे कमरे की "खिड़की" के उस ओर..
_________________

Wednesday, April 9, 2014

गज़ल
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मैं वो दरिया हूं जल रहा हूं
तेरे कदमों के निशानों पै चल रहा हूं..।।

खो गई रूह, बदन लाश हुआ,
दौड़ रेतीली हवाओं से कर रहा हूं..।।

इश्क है आग, मेरा दिल पानी,
बुझ गया तू मैं मजारों सा जल रहा हूं..।।

नाखुदा भी तो डुबा देते हैं,
मैं ये तक्रीर खुदाओं से कर रहा हूं..।।

नासमझ तुझसे ‌गिला क्या होगा,
मैं तो आगाह जमाने को कर रहा हूं..।।

        ------------



कविता

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याद है एक बार तुमने कहा था..
तुम प्रेम में हो
गहरे प्रेम में..
सारी बंदिशें तोड़ दी थी मैंने..खोल दिए थे सारे दरवाजे मेरे दिल की सुरंगों में दबी हुई आरजू तक पहुंचने के..
उस वक्त सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए..
तुम आए बढ़े और मुझमें समा गए..
मेरे दिल में उतरते गए तुम और डूबती गई मैं..
तुममय होती गई...
तब बिजली कड़की, वज्रपात हुआ..एक आह निकली..
तुम भी थे गहरे प्रेम में किसी और की मूरत को सीने में छुपाए हुए..


 
गीत
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तू जो मेरा हुुआ तो सबेरा हुुआ
जिंदगी में कहीं
छंट गई रात काली, खिली धूप अब
जिंदगी में कहीं

तू जो मुझको मिला तो खुदा मिल गया
मेरी ख्वाहिश को अब रास्ता मिल गया
छू गई रोशनी, मिल गई हर खुशी जिंदगी में कहीं...।।

तेरी सांसों के साए में जीता रहूं
तेरी चाहत को आंखों से पीता रहूं
मैं रहूं साथ जब भी तू जाए कहीं...।।

तू जो मेरा हुआ...।।


गज़ल
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देखो धुंअा सा उठने लगा है
अरमां सा कोई बुझने लगा है..।।

फूंककर मेरी तमन्नाओं की भस्म
कोई मेेरे दामन पै मलने लगा है..।।

कल की अफवाह हकीकत हो गई
दरिया सा कोई जलने लगा है..।।

जानकर फूल छुपाया था जो सीने में
कांटा सा कोई चुभने लगा है..।।

गैर की आग में जलने वाला वो
चांद कहीं प्रिय छुपने लगा है..।।

देखो धुंआ सा......।।।
गज़ल
--------------

मेरे इश्क की इतनी पैमाइश करता है क्यूं..
यादों में ढूंढता है
धड़कन से पूछता है
फिर भी इन लबों को खामोश रखता है क्यूं..????


मेरे दिल को जलाकर यूं अनजान न बना करो
मेरा प्यार तुम्हें मंजूर है कभी तो कहा करो..।।

तेरे इंतजार में मुरझा रहा है दिल मेरा
अपनी सांसों की महक इसमें कभी तो भरा करो..।।

मेरी खामोशी इजहारे मोहब्बत ही तो है
इसे पढ़ने की आजमाइश कभी तो किया करो..।।

सुना है जामों को भर देते हो आंखों ही से तुम
थोड़ा अहसान ओ प्रिय हम पे भी किया करो..।।

--------

गज़ल
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वक्त बेवक्त मुझे याद आया न करो
इस कदर मेरी जाना सताया न करो..।।

बन के मरहम छू लेते हो मुझे
मेरे जख्मों को यूं और दुखाया न करो..।।

दो घड़ी दिन में हंसा के मुझको
इस कदर रात भर रुलाया न करो...।।

तेज कदमों से चल पडूं जब मैं
यूं धीमे से मुझे बुलाया न करो..।।

है अगर दिल में तो कहते क्यों नहीं
प्यार को इस तरह छुपाया न करो...।।

ये मेरी जिंदगी है कोई गीत नहीं
गाके दुनिया को इसे सुनाया न करो..।।

गज़ल
-------------

जो गुजरा हुआ जमाना है
एक बार वो फिर तो आ जाए.।।

वो प्यार की मीठी सी आहट
वो पहली नजर का पागलपन
वो तुझे देखने की चाहत
वो जुगनू सा दीवानापन..
एक बार...........................।।

वो ख्वाबों में तुझसे मिलकर
मेरी खामोशी का छंट जाना,
जैसे हो रात अमावस पर
छुपके चंदा का दिख जाना..
एक बार..........................।।

वो नजरों के टकराते ही
दिल की धड़कन का बढ़ जाना
वो आंखों ही आंखों में यूं
मुझसे तेरा सब कह जाना
एक बार..........................।।

वो दर्द था जालिम दवा भी था
वो इश्क सुकूं और वफा भी था
वो आशिक बड़ा मिजाजी था
शायद ये इश्क नबाबी था
एक बार.........................।।

गज़ल
-------------

तुम दर्द हो या करार हो,
पर जो भी हो मेरा प्यार हो..।।

निगाहों से दिल में उतर जाते हो
दिल से सांसों में उमड़ आते हो
फिर आंखों से बरस जाते हो,
तुम इश्क हो या गुबार हो.....पर जो भी हो.....

जब भी देखती हूं मैं शीशे में अक्स अपना
एक चेहरा मेरे चेहरे में नजर आता है
जब भी गुजरता है ‌कोई हवा का झौंका
वो चेहरा मुझे छूकर गुजर जाता है...
मैं पलटती हूं..ढूंढती हूं...बार बार पूछ़ती हूं..
तुम जिंदगी या बस एक खुमार हो.......पर जो भी हो मेरा प्यार हो...।।।।
गज़ल..
 ------------------

जब भी उठती है तलब दिल में मेरे
मुस्कुरा के नाम तेरा ले लेती हूं..।।

तुझसे छुपकर अक्सर अकेले में
मैं तुझे जान-ए-जिगर कह देती हूं..।।

जब भी पूछते हैं लोग मेरा हाल-ए-दिल
मैं तेरा नाम होठों में दबा लेती हूं..।।

देखे गर कोई तेरी मकां इन आंखों में
फौरन पलकों को गिरा लेती हूं..।।

यूं तो आदत है..मगर बढती है कभी बेचैनी
बीती यादों की दवा दे देती हूं..।।

एक दिन वो आएगा प्रिय बस जाएगा तुममें
अपनी सांसों को मैं यूं रोज दगा देती हूं..।।

अच्छे से जानती हूं तुझे ओ बेपरवाह, मौजों के सनम
पर मैं तुझे दिल से दुआ देती हूं..।।

----------------
 
दुनिया भर में ..दिलों की चोरी की खबरों से हैरान हो !
हम अपने दिल को छुपा आए तहखाने में...
सबसे दूर,
एकांत के अंधेरे कोने में..
कुछ वक्त बाद, किसी प्रेम के महीने में
दिलों को खुले बाजार में बिकते और उड़ते देखा ..
तो अचानक
दिल की याद आई..
हम सीधे तहखाने पहुंचे..
खोला..
तो पाया
दिल को चूहे कुतर चुके थे..!
अब न दिल था..!!
न दिलबर !
न दिलनशीं !
और न चोरी का डर ..!!
बस थी तो कुछ बिखरी हुई कतरनें और उन कतरनों को घुटनों के बल बैठकर समेट‌ते हम...
ओ ! शमी के वृक्ष...
..आओ..
चलो एक खेल खेलते हैं..
फट पडो तुम..!
और खुद को फाड़ देती हूं मैं....
झौंक देती हूूं मैं खुद को तुम्हारी आग में --
और भस्म हो जाओ मेरी में तुम....!!!!
__
हो सकता है लोगों को किनारे पसंद हों..
मुझे तो नदी को समेटने की साजिश नजर आती है.....!!
सुन रही हो....?
दरिया चाहे प्रेम का ही हो, डूबने का खतरा वहां भी रहता है..
बहुत गहरे उतर रही हो तुम..!!
जी हां...सही पहचाने..
अगर हो कोई काबिल गोताखोर तो कह दो कूद जाए दरिया में..

और ढूंढ़ के निकाल ले मुझे..
पर कान खोलकर सुनो,,,,, 

तुम भी उसकी जान की परवाह करना और एक बात का ख्याल रखना,
उतरते-उतरते डूबने का हुनर हो चला है मुझे,
उसे भी तैराकी में महारथ हासिल हो..।। ।। ।।
आज जब उनसे मिले तो मालूम हुआ...@.
लोग ऐसे भी हैं जमाने में.....!!!...
देखो मेरी आंखों में
खारी लहरें उफन रही हैं..
व्याकुल हूं..
तड़प रही हूं..
बदहवाश हो दौड़ रही हूं...
सुनो मेरा क्रंदन, ये रुदन, ये विलाप..ये चीत्कार....
नहीं-नहीं मैं कोई प्रेमिका नहीं हूं...न ही पति के शव से लिपटी विधवा..
मैं तो बस तुम्हें ढूंढ रही हूं..फूट-फूटकर रो रही हूं.
बिलख रही हूं..
ऐसे...
" बिलखती है जैसे खोऐ हुए बच्चे की मां "......
इतने सालों बाद मिला !!
बताओ न तुम्हें कैसा लगा.???
बिल्कुल ऐसा...
जैसे जलती हुई आग पर किसी ने डाल दिया हो पानी ......
सच !!!!! 
हां.. 
मतलब जानते हो इसका साहिब.???
हां.
यही, कि मैंने बुझा दी वो याद और इंतजार की आग जिसमें जल रही थी तुम मेरे लिए... 
मिलके मुझसे हो गई हो तुम तापमुक्त.. 
हां...।। 
वैसे इसका एक और भी मतलब है महाशय..!
सुनना चाहते हो... 
सुनो.. 
तुमने डाल दिया पानी उस जलती हुई लौ पै !
जिसकी रोशनी में अक्सर तुमसे मिलने के ख्वाब बुना करती थी मैं.. 
तुम आज आए, 
मिले...
और ख्वाब हकीकत हो गया.. 
हां, लेकिन ख्वाब खत्म हो गया.. 
और साथ में मेरी ख्वाब बुनने की कला भी !!!
ओह ..तुमने बदल लिया है शहर ? ,....

उठती है एक हूक सी यूं ही कभी कभी अपने आप .....
मेरी भटकी सी आँखें ढूंढती हैं तुम्हे अपने आस पास 
उतर आता है अचानक ही एक खारा सा समंदर
बरसता है..
भिगाता है..
गलाता है.....और डूबा लेता है मुझे
कोई तो बता दे कहाँ हैं..??
नरम हाथों की वो गर्म हथेलियां..
अपने हाथों में भर लूँ और कसकर पकड़ लूँ उन्हें
एक बार तो आये वो आवाज़ मेरे कानों में ...
बदहवाश हो दौड़ के जाऊं.. और लिपट जाऊं मैं
ओह.. ओह अब नहीं आती तुम्हारी आवाज़ मेरे कानों...
में न देखती हैं वो दो बूढ़ी आँखे मुझे.!
अब नही लेते हो तुम नाम मेरा..!
न पूछते हो किसी से मेरे आने की खबर!
मेरे चुप रहने भर से कराह उठते थे तुम ...आज नही हो रहा मेरी सिसकियों का असर !!
ओह,…!!!!
खुदा ही जानता है 
मैं किसी दश्त में आ गयी या तुमने ही बदल लिया है शहर ......