एक राह खुली है अभी-अभी
दूर जंगल की ओर..
और मुझे जाना ही होगा...
पहाड़ से चढ़कर,
बादलों की गरदन से लटककर
हवा का हाथ पकड़कर
कोई बैठा इंतजार कर रहा है ...वहां मेरा,
वही जो संसार में प्रेम ढूंढ़ते-ढूंढ़ते जा पहुंचा था निर्जन द्वीप पर
और खोद-खोद के ढूंढ़ निकाला था उसने एक जंगल.....।।
दूर जंगल की ओर..
और मुझे जाना ही होगा...
पहाड़ से चढ़कर,
बादलों की गरदन से लटककर
हवा का हाथ पकड़कर
कोई बैठा इंतजार कर रहा है ...वहां मेरा,
वही जो संसार में प्रेम ढूंढ़ते-ढूंढ़ते जा पहुंचा था निर्जन द्वीप पर
और खोद-खोद के ढूंढ़ निकाला था उसने एक जंगल.....।।
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