जलते रहो
गर बुझी यह आग तो मुमकिन नहीं फिर से जलाना, सर्द पड़ जाने से पहले जल उठो,जलते रहो।।
Tuesday, January 1, 2013
इतनी क्यों बेशर्म हुई हैं तारीखें,
हर बार मुंह उठा के चली आती हैं कम्बख्त।।
पत्थरों से रगड़ खा के वो फिर पनप जाएगी,
कि बुझ जाने से चरागों के रोशनी नहीं मरा करती।।
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