तुम एक पोटली हो,
बिना रोशनदान वाले घुप्प तहखाने में रखी हुई,
जिसमें ठूंस-ठूंस कर भरी है सकारात्मक ऊर्जा
और एक टुकड़ा प्रकाश का भी....
पोटली के मुंह पर लगी गांठें,
कस गई हों भीतर के दवाब से,
पोटली बदल गई हो एक गठीले नाजुक बदन में,
और प्रकाश में घुली ऊर्जा भीतर से झांक रही हो ठीक ऐसे जैसे
त्वचा में उगे नर्म, मुलायम रोंये...
वो सकारात्मक ऊर्जा बेंधती है अंधेेरे की परतों को,
जैसे सूरज के तन से फूटी धूप बेंध आती है ओजोन की इक परत,
पर ओ पोटली...तुम क्यों चाहती हो
तहखाने की कैद से फरार होकर सूरज की धूप में मिल जाना..
क्यों हो इतनी बेताब..बेकल, बेचैन ?
ज़रा गौर से सुनो..
तुम अंधेरे में तराशी गई हो,
तहखाने की नमी में ढाला गया है तुम्हारा बदन,
सन्नाटे की गूंज में नाचती रही हो तुम आजतक,
खुद के ही बनाए गीतों पर आंखें मूंदकर..
ज़रा जानो पोटली
तहखाने से मुक्त हो, जब सूरज की धूप में खोली जाएंगी तुम्हारी गांठें, या खुद ही मुलायम झटके से पूरी खुलकर,
तुम फैला दोगी अपने चारों कोने जमीन पर,
तो रंग-बिरंगी तितलियां बन उड़ जाएंगी,
तुममें सदियों से महफूज़ रही रश्मियां,
हवा मुठ्ठियों में दबाकर ले जाएगी तुम्हारी ऊर्जा,
और बिखेर देगी सदियों से खाली आसमान में,,,
तब तुम रह जाओगी रेशम का छोटा सा चौकोर कपड़ा भर,
जाओ , हम तुम्हें मशविरा देते हैं,
बैठी रहो तहखाने में चुपचाप,
कि दरारों से रिसते तेज को देखकर, आएंगे कुछ नकारात्मक जीव,
और उन दरारों पर मुंह सटाकर, अपनी सांसों में भर ले जाएंगे छटांक भर सकारात्मक ऊर्जा
....जीओ..... प्रिये
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