कविता
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याद है एक बार तुमने कहा था..
तुम प्रेम में हो
गहरे प्रेम में..
सारी बंदिशें तोड़ दी थी मैंने..खोल दिए थे सारे दरवाजे मेरे दिल की सुरंगों में दबी हुई आरजू तक पहुंचने के..
उस वक्त सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए..
तुम आए बढ़े और मुझमें समा गए..
मेरे दिल में उतरते गए तुम और डूबती गई मैं..
तुममय होती गई...
तब बिजली कड़की, वज्रपात हुआ..एक आह निकली..
तुम भी थे गहरे प्रेम में किसी और की मूरत को सीने में छुपाए हुए..
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याद है एक बार तुमने कहा था..
तुम प्रेम में हो
गहरे प्रेम में..
सारी बंदिशें तोड़ दी थी मैंने..खोल दिए थे सारे दरवाजे मेरे दिल की सुरंगों में दबी हुई आरजू तक पहुंचने के..
उस वक्त सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए..
तुम आए बढ़े और मुझमें समा गए..
मेरे दिल में उतरते गए तुम और डूबती गई मैं..
तुममय होती गई...
तब बिजली कड़की, वज्रपात हुआ..एक आह निकली..
तुम भी थे गहरे प्रेम में किसी और की मूरत को सीने में छुपाए हुए..
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