Tuesday, July 29, 2014

__ सिर्फ " एकतरफा प्रेमी " कहे गए प्रेमियों को समर्पित.....

तुम्हारा प्रेम,
जिसके लिए नहीं है कोई जगह
न‌ दिल, न दुनिया, न किसी मुहोब्बत के मकबरे में...
जिसकी आहटें खुले में भरती हैं सिसकियां, और
ठंडी बौछारें बनकर उड़ जाती हैं मिलन की महफिलों में..!!

_____ओ ..प्रेम के सरकंडे से व्हेल सी जिंदगी हांकने की जिद करने वालो.....
मत फैलाओ हाथ कि कोई दे तुम्हें प्रेम दया में..
या बस एक बार कोई भर ले तुम्हें अपनी बांहों में,,
और जड़े चुम्बन तुम्हारे होठों पर....... चाहे बस पहली और आखिरी ही बार....
____मत आस करो कि तुम बन जाओ मुहोब्बत के परवाने,
और कोई लौ जलकर तुम्हें खाक करे.
या कोई सजाए तुम्हें अपनी चारदीवारी में गमले का पौधा बनाकर...और निहारे तुम्हें सुबहो-शाम
मत मांगों भीख ,...
तुम्हारे प्रेम को एकतरफा करार देने वाले, मिलन में उलझे, बौने दिल के आदमकदों से,

अपने भीतर उत्पन्न प्रेमरक्त से इस धरा को सींचने वालों,
ओ जंगल के मदमस्त वृक्षों !
तुम्हारी सांस से सांस लेती है ये जमीं..
प्रेम की निश्छल, निस्वार्थ, निष्कपट धरोहरों
तुम ही प्रेम हो, हकीकत हो, तुम अनंत हो...!!!!

_______सुनो.... एकतरफा प्रेमी कहकर उपेक्षित किए गए प्रेमियों...
आज ये लड़की करती है तुम पर अपना सर्वश्व निछावर
ये बोलेगी तुम्हारा मौन...
और इसकी कविताओं में होगा तुम्हारा वास......
सदैव.....
एक राह खुली है अभी-अभी
दूर जंगल की ओर..
और मुझे जाना ही होगा...
पहाड़ से चढ़कर,
बादलों की गरदन से लटककर
हवा का हाथ पकड़कर
कोई बैठा इंतजार कर रहा है ...वहां मेरा,
वही जो संसार में प्रेम ढूंढ़ते-ढूंढ़ते जा पहुंचा था निर्जन द्वीप पर
और खोद-खोद के ढूंढ़ निकाला था उसने एक जंगल.....।।



आज फिर किसी ने मुझे बद्दुआ दी,
आज फिर सुबह किसी ने लंबी उमर की दुअा दी.. ।।
प्रेम संबंध न सही..दर्द संबंध ही सही...।।
तेरी बेरुखी से पनप रहा है एक सन्यास मेरे भीतर..
मेरी मौजे-बेतकल्लुफी पर न खुद को सुलगाइए जनाब..
अपन तो पानी भी जाम के अंदाज में घूंट-घूंट पीते हैं....।।
जब तुम आओगे प्रीतम...
तुम्हारे बदन की गंध को भर लूंगी सांसों में
तुम्हारी छुअन को चिपका लूंगी होठाें पर
और आंखों की पुतलियों पर मढ़कर तुम्हारी तस्वीर
भींच लूंगी जोर से पलकों को...।।
         बस तुम आ जाओ प्रीतम...।।

--------- किसी देवी के अनुरोध पर किसी देवता के लिए लिखी थीं..
गीत
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मैं खुले आसमां का पंछी
मैं नीला मुक्त समंदर हूं
मैं मस्त हवा का झोंका हूं,
ना बाहर हूं ना अंदर हूं...
ना जान सका कोई मुझको
जंतर-मंतर छूमंतर हूं
मौजें ही मेरी मस्ती हैं
मैं पागल मस्त कलंदर हूं...।।

मैं बेफिकरा, मैं बेफिकरा,मैं बेफिकरा हुआ,
मैं मस्त फकीरों का दिकरा, मैं बेफिकरा हुआ...।।

मैं मधुर तान पै बंसी की बस राग मुहोब्बत गाता हूं,
बुझ चुके दिलों में मीठा सा,मैं प्यार का दर्द जगाता हूं..
ले हाथ खिलौना सारंगी, बस प्यार-प्यार चिल्लाता हूं
कोने-कोने भटका फिरता, फिर बात यही दोहराता हूं..
मैं हीर और रांझे का जिकरा ...
मैं बेफिकरा हुआ.....

ना दुनिया की परवाह मुझे, अपनी मस्ती में रहता हूं..
जग अल्लाह-अल्‍लाह कहता है, मैं प्रीतम-प्रीतम जपता हूं..
मैं प्रीत के खेल का बाजीगर, दिल की बस्ती में बसता हूं
मैं आंखों की भाषा कहता, ना बात जुवां से करता हूं..
जग लाख कसे मुझपै फिकरा..
मैं बेफिकरा हुआ....।।
सन्यास, सन्यास, सन्यास, जानती भी है तू...??
क्या होता है सन्यास...???
ओ नादान लड़की..
ये कोई अवस्‍था नहीं है जो बुढ़ापे की तरह एक दिन आएगी ही, या जिसे प्राप्त करने के लिए तप किया जाए...
यह तो बस भाव है, जो बिना गेरुआ वस्‍त्र पहने, बिना घर त्यागे और बिना जंगल की ओर प्रस्‍थान ‌किए...खुद पैदा होगा....
और इसका परिणाम होगा शून्य...हां वही अनंत...अनंत....अनंत.....।।

 गीत
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टूट्टे दिल से फूट्टा सोत्ता
झर-झर बरस रहा है नीर
ओ अलमस्त निगोरे सावन
तू क्या समझे मेरी पीर... ।।

आंख्‍खां बिच्च बैट्ठी इक मूरत,
धुल-धुल के उजली हाेई..
वेख, वेख प्रीतम को बिरहिन
हूक-हूक भर के रोई,
दुनियाभर उपचार किया, पर नहीं भरी इस ‌दिल दी चीर...
ओ अलमस्त.... ।।

घनन-घनन जब बरसे सावन
सीने में बिजली कड़के
जिस्म के भीतर सांस घुटे,
और बाहर अंग-अंग तड़पे
आंसू पीयूं पानी रोऊं, ज़ख्म ज़ख्म हूं मैं दिलगीर.. ।।
ओ अलमस्त...... ।।

Sunday, July 13, 2014

प्रेम-संवाद
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ओय लड़की....!!
तुम्हारा फेवरेट सब्जेक्ट कौन सा है..??
क्यूं..??
ऐसे ही पूछ रहा हूं..।
हम्मम..प्रेम...और तुम्हारा..???
अरे ये भी सब्जेक्ट होता है..आज मालूम हुआ....खैर....मेरा है गणित..
अच्छी बात है...दो मिनट ठहरो..जरा इस बच्ची से बात कर लूं..
तुम रहोगी पागल ही !!
साठ रुपये के भाव एक किलो इतने मीठे आम खरीदे.. आधा किलो रास्ते में ही बांट चली, अरे जब वो पैसे मांग रही थी..तो वही क्यों नहीं दे दिए...?
वो इसलिए कि हम गणित नहीं पढ़े ना....हाहाहा..वैसे एक बात कहूं प्रीतम
इन आमों की मिठास, इनकी दुआओं में घुलकर पहले ही हम तक पहुंच चुकी है...तुम्हारे रूप में...
अब तुम बैठकर गणित लगाओ कि हमने इन्हें क्या दिया...??
और हां उत्तरमाला हमारे हाथ में है....!!!!!!


स्टुपिड सावन
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बद्तमीज ताे तुम हो..निहायत बद्तमीज..!
कई बार पहले भी...
तुम पर अपनी जवानी के दर्जनों बसंत लुटा चुकी, लड़कियों के मुंह से,
तुम्हारे चर्चे सुने..
पर तब हम बच्चे थे..
अपने मादक रूप-रंग और
रैमन मोनेगल, फ्रेडरिक माले या ज्यूनिपर रिज जैसी
तमाम सुगंधियों को भी मात देने वाली जादूगरी महक से,
मासूमों को मोहजाल में फंसाने वाले,
ओ दगाबाज....
तुम कईयों के दिल में उतरे,
किसी को सुलगाया, किसी को धूंआ किया, तो किसी को राख करने के बाद,
अपनी शुतुरमुर्गी गर्दन उठाकर चलते बने...
आज फिर तुमने एक मासूम लड़की पर नजर डाली..!!
और लड़की पर पानी को टुकड़े-टुकड़े कर बनाई गई तेजाबी बूंदों के छींटे मारे...
वो भी तब...
जब वो तुम्हारी बेशर्म छींटाकशीं से बचने की को‌शिश में,
अपने गले से दुपट्टा खींचकर, बदन को लपेटने की जद्दोज़हद कर रही थी...
खैर...
तुम निपट भोगी....
आदतन बरस-बरस कर हमें ‌भिगाते चलो..
हम भीग-भीग के फिर सूखते जाएंगे....---------स्टूपिड " सावन "...