गज़ल.....मां..
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पीछे से किसी ने आवाज लगाई
आज फिर मुझे मां याद आई..।।
मस्त कदमों से बढ़ रहा था ख्वाबों का काफिला
फिर अचानक आंख में नमी सी उतर आई..।।
फिर मुझे मां.....।।
फितरते-रफ्तार थी मैं बोलता चला गया
फिर किसी एक शब्द पर जुबां लड़खड़ाई....।।
फिर मुझे मां..........।।
चौंककर देखा पलटकर मां न मां का नामोनिशां
दिन की पक्की धूप में फिर रात सी घिर आई....।।
फिर मुझे मां....।।
मैं खड़ा करता रहा ईंटों के आशियाने यहां
पर खुदा से जो मिली वो नींव ही गंवाई....।।
फिर मुझे मां......।।
रोता हूं मैं
तू है कहां..
ढूंढू तुझे
यहां से वहां..
अब हो कही तू आ भी जा..
तुझमें बसी है मेरी जां....
ओ मां.....
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पीछे से किसी ने आवाज लगाई
आज फिर मुझे मां याद आई..।।
मस्त कदमों से बढ़ रहा था ख्वाबों का काफिला
फिर अचानक आंख में नमी सी उतर आई..।।
फिर मुझे मां.....।।
फितरते-रफ्तार थी मैं बोलता चला गया
फिर किसी एक शब्द पर जुबां लड़खड़ाई....।।
फिर मुझे मां..........।।
चौंककर देखा पलटकर मां न मां का नामोनिशां
दिन की पक्की धूप में फिर रात सी घिर आई....।।
फिर मुझे मां....।।
मैं खड़ा करता रहा ईंटों के आशियाने यहां
पर खुदा से जो मिली वो नींव ही गंवाई....।।
फिर मुझे मां......।।
रोता हूं मैं
तू है कहां..
ढूंढू तुझे
यहां से वहां..
अब हो कही तू आ भी जा..
तुझमें बसी है मेरी जां....
ओ मां.....
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