गज़ल..
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जब भी उठती है तलब दिल में मेरे
मुस्कुरा के नाम तेरा ले लेती हूं..।।
तुझसे छुपकर अक्सर अकेले में
मैं तुझे जान-ए-जिगर कह देती हूं..।।
जब भी पूछते हैं लोग मेरा हाल-ए-दिल
मैं तेरा नाम होठों में दबा लेती हूं..।।
देखे गर कोई तेरी मकां इन आंखों में
फौरन पलकों को गिरा लेती हूं..।।
यूं तो आदत है..मगर बढती है कभी बेचैनी
बीती यादों की दवा दे देती हूं..।।
एक दिन वो आएगा प्रिय बस जाएगा तुममें
अपनी सांसों को मैं यूं रोज दगा देती हूं..।।
अच्छे से जानती हूं तुझे ओ बेपरवाह, मौजों के सनम
पर मैं तुझे दिल से दुआ देती हूं..।।
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जब भी उठती है तलब दिल में मेरे
मुस्कुरा के नाम तेरा ले लेती हूं..।।
तुझसे छुपकर अक्सर अकेले में
मैं तुझे जान-ए-जिगर कह देती हूं..।।
जब भी पूछते हैं लोग मेरा हाल-ए-दिल
मैं तेरा नाम होठों में दबा लेती हूं..।।
देखे गर कोई तेरी मकां इन आंखों में
फौरन पलकों को गिरा लेती हूं..।।
यूं तो आदत है..मगर बढती है कभी बेचैनी
बीती यादों की दवा दे देती हूं..।।
एक दिन वो आएगा प्रिय बस जाएगा तुममें
अपनी सांसों को मैं यूं रोज दगा देती हूं..।।
अच्छे से जानती हूं तुझे ओ बेपरवाह, मौजों के सनम
पर मैं तुझे दिल से दुआ देती हूं..।।
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