Sunday, November 1, 2015

सुनो, सुनो, इतना कि, दोनों कानों को बना दो शहर के बीचोंबीच रखे कूड़ेदान,
आंखों को बहने दो ऐसे... जैसे बारिश गुजरने के महीनों बाद भी बूंद-बूंद टपकती है किसी जर्जर पुश्तैनी मकान की छत..
जुबां को बंद करो चूहेदानी में... और फेंक आओ घर से मीलों दूर किसी निर्जन स्थान पर...
दोनों हाथों को उठाओ.. और कनपटियों पर रखकर हथेलियां, भींचो इतनी तेज कि चटख जाएं नसें..
ये जो होठ हैं न.. दो दीवारें हैं मेरी जान... जिनमें कैद होनी हैं सीने से उठती अनगिनत हूकें... 
और हां इस माथे का कोई मोल नहीं.... इसे चाहे पैरों पर पटको या चौखट पर.... ///
___________\ ओ प्रिये... करो सब, करती रहो .. जी करे तब तक.. जब.... बेबसी दस्तक दे दे... बेचैनी बदन तोड़कर फूटे, रास्ते पहाड़ हो जाएं, और आसमान पर टंगी हुई आंख.. तुम्हें देखकर आंखें फेर ले.. /////
मुझे फिर-फिर के आना है, खुदाया तेरी चौखट पर,
अदालत जो लगाई है, उसे फिर मुल्तवी कर दो ....
ना याद हमें क्या खोये और क्या पाये हम...
फिर भी जाने क्या ढूंढ़ रहा क्यों पागल मन......
सांसें टूटे, धड़कन टूटे, हाथ की हरी चूड़ियाँ टूटे...
तेरे दिल में मैं हूँ ज़िंदा, बस एक ये ही भरम न टूटे....||||
उस दुकान पर जाने से हरगिज बचना चाहिए, जिस पर चाय की तलब से ज्यादा कोई याद खींच कर ले जाए,
मिटी हुई तलब के बाद चाय घूंटों में नहीं पी जाती, और उग आई यादों के बाद चुस्कियों का हलक में उतरना भी संभव नहीं होता,
हल्के बादामी रंग के बुलबुलों से भरे कप में उबला हुआ यह वही तेजाब होता है.. जो माथे में जमी बेचैन परतों को धूंआ करता हुआ उड़ता जाता है और छोड़ता जाता है पसीने की कुछ बूंदें। उस वक्त सांस फेंफड़ों से होती हुई पीठ पर जाकर थम जाती है.. बादलों से ढ़की शाम भरी दोपहरी हो जाती है...और आंखों के सामने नाचती हैं कुछ धुंधली सी तस्वीरें और दोनों हाथों के चक्रव्यूह में बंधा हुआ कप
________________\ चाय सिर्फ चाय नहीं है
चाय के कप से जब मन ऊब जाये,
तेज प्यास में, पानी का गिलास मुंह से लगाना बोझ लगने लगे...
फोन की मीटिंग प्रोफाइल पे लगी घण्टी, कानों तक पहुंचते पहुंचते 400 डेसिबल पार हो जाये...
बारिश की बूँदें जी जलाने लगें... घड़ी की बढ़ती सुई, धड़कती नब्ज सी लगे... फेंफड़ो में भरी बेचैनी झटके से माथे में जा टकराये...और टकराती रहे
तो उठ जाओ....
और फिर से ढूंढो उस काग़ज के टुकड़े को....
जिसमें तुमने लिखा था कभी ...
' बेचैन हूँ तो है यकीं ज़िंदा हूँ मैं '
न सवाल करिये न ज़वाब की आरज़ू रखिये,
इस दौर की चाहत है प्रिया .. ख़ामोश रहिये.....
जिनके पहलू में सौ परियां, क्यों याद उन्हें हम आएं भला?.....
वो प्यार भला कोई प्यार हुआ?
इक डांट सहन ना कर पाये....????
कितना दिलकश है ..
पेड़ की सबसे ऊंची डाल से फल का टूटना,
कि जैसे 105 डिग्री फारेनहाइट तक पहुंचे बुखार का टूटना,
नाराज होकर खाना छोड़ बैठी, मां की कसम का टूटना
एक ही घर में दो बेटों के बीच खिंची दीवार का टूटना
भूखे, ललचाते बच्चे के हाथ में आई रोटी से पहले कौर का टूटना
नाचने की हद तक नाचती उस पगली के घुंघरुओं का टूटना
कि पति के हाथों पानी पीकर करवाचौथ के व्रत का टूटना
और
बस अच्छा नहीं है तो,
उस दिल का टूटना, दिल में बनी तस्वीर का टूटना,
तस्वीर में बैठे खुदा का टूटना, खुदा के लिए देखे सपने का टूटना,
और सपना देखने की हिम्मत का टूटना....
___________\ जुड़ी कहां हैं चीजें टूटने के बाद, इतना भी दिलकश नहीं.. " टूटना "
टूटती साँसों को भी हों उलझनें हज़ार...
_____ ज़नाब...इसे ही कहते हैं..अत्याचार...अत्याचार....अत्याचार
For Dr. APJ Abdul kalam.........

मैंने शब्दों को ढूँढा,
पर वो जाने कहाँ गायब हैं,
हर तरफ़ नज़र दौड़ा रही हूँ,
तो तुम्हारी ही तस्वीरें लगी हैं..
बीच की मांग निकाले, दो लटों को माथे पे डाले, और मुस्कुराते...
सब तुम्हें याद कर रहे हैं....
पर मुझे तो तुम हमेशा ही याद रहते हो...
मैं तो तुम्हें श्रद्धाजंलि भी नहीं दे पाऊँगी..
क्योंकि वो तो मैं उन लोगों को देती हूँ , जो मेरे जीवन और ज़ेहन में मृत होते हैं...
मेरी आँखों में देखो ...
ओ मेरे सबसे प्रिय वैज्ञानिक...
तुम मेरी अंतिम सांस तक ज़िंदा हो..
ओ दुनिया के सबसे सरल प्राणी...
तुम यहीं हो, मेरे एकदम करीब...
ओ ख़ुशी और प्रेरणा के झरने
ओ मेरे कलाम
मेरी आवाज सुनो...
तुम हो...
सबके सवालों का जवाब देने वाले
बस इतना बताओ..
___ कि आज मेरा गला क्यों रुंध रहा है?...
प्रीतम के पहलू में गिरें जाके ये मन्नत मंग दिए
हम चल दिए, तेरी तरफ़, तेरी सड़क, हम चल दिए......
मन छूटा वृन्दावन में तन लेकर कौन सी राह चलें अब.....?
जब से दिल, जां, दुनिया के सितम
हम सहना सीख गए..
सब हंसी मिटी बातें भी गयीं
चुप रहना सीख गए..
मौजों से कहो उड़ जाएं कि
अब गुम रहना सीख गए..
सावन से कहो आँखों से बरस
हम बहना सीख गए......!!!!!!
शौहर ये ज़माने के या अपने बलम देखें..
हर ओर तमाशा है, देखें तो किधर देखें..???
तुम्हारे मौन को सुनकर ही हम बेहोश हैं ज़ालिम..
कसम से बोलते गर तुम फ़ना नामो-निशां होता....
ओ बीमारी
तू जब भी आना..मेरी माँ को साथ लाना.....
उम्र भर ढूँढा जो वो, इक हर्फ़-ए-वफ़ा न मिला..
मैं ख़ुद से जुदा हो जाऊँ ख़ुदा,
अब यही है मेरी आज़ादी......
अपना है ये ही काम बस, घर से निकल लिए
चौखट जो दीखी यार की, माथे को मल दिए....
ज़मीं में ठोकरें मारो वो फ़िर भी काम आएंगी,
परस्ती से बुतों की कुछ, न हासिल था न हासिल है....
मन फिर आज कह रहा राधे, वृन्दावन बुलवाले...
दुनियादारी बहुत हुई, निज चरणन बीच बिठाले..
किस मुंह से कह दें? 'गो' प्रिया 'गो' इश्क़ फ़रमाओ....
हमको जब राह-ए-इश्क़ में बस सिसकियाँ मिलीं..........
प्रेम-व्रेम के खर्रे लिख-लिख रद्दी खूब बढ़ाई,
पैर खोज रहे क़ब्र कि अब तुझेे याद वतन की आई...?
इतना सुनना था...कि
लब उसके रो बैठे, और वो आँखों से मुस्काई...
हाथ करम पे रखकर वो फ़िर ज़ोरों से चिल्लाई....
मिटी दलीलें, उड़ गए वाद..
__ इंक़लाब ज़िंदाबाद...इंक़लाब ज़िंदाबाद...इंक़लाब ज़िंदाबाद.....
जिस-जिस ने दुखाया दिल अपना, सब शाद रहें आबाद रहें......
जाय बसे वृन्दावन में ख़ुद
और हमें दिल्ली पहुंचाए
मौज करी यमुना तट पे
नित गोपियों के संग रास रचाये
राधा का नाम जपे दुनिया
ख़ुद रुक्मिणी के संग फेरे लगाये
जाओ लला बड़ी भूल भई
हम मूरख तुम्हें पहचान न पाये..
तुम मुझे सुनते रहे, सुनते रहे, और बस सुनते ही रहे...
और मैं कहते रहने की आदी हो गयी..
एक वक्त कोई मेरे कान के पास आकर कह गया...
संसार में स्त्रियों को बोलने नहीं सुनने की अनुमति है..
और इस परिधि को तोड़ने का दंड तुम्हारी ख़ुद चुनी हुई कठोरतम सज़ा होगी
मैं हंसी...कानों को झटका, फुसफुसाई... जब बोलने की अनुमति होगी तो हम सुनेंगे...सज़ा लॉक कर दी जाये..
और अपनी ही आँखों की चमक में डूब गयी..
मैंने स्त्री होने की यह पहली और अंतिम परम्परा तोड़ डाली..
मेरी आवाज़ तुम्हारे कानों तक तो पहुंचती थी..
पर ह्रदय तक?
अक्सर कहती थी...ख़ुदा जाने...
आज भी ख़ुदा ही जानता है....
मेरे कान खुले हुए हैं...
मेरी आवाज़ दफ़्न है..
तुम्हारे कान बेशकीमती आवाजों से भरे हैं...
हां....अब मैं सुन पा रही हूँ !!!!
जितना तू बेरहम है,
मेरे दम से फिर भी कम है....
मित्र !
तुम जो निकले हो सफ़र पे
तोे बिना कुछ बूझे चलो और चलते चलो,
हां,पर 
जहां दौड़ती भीड़ में,
हर चेहरा तुम्हारे जैसा लगे
और हर दिल किसी दूर के ग्रह से आया ठूँठ अजनबी
तो समझ जाना
तुम ' दिल्ली' में हो......
कहें हम क्या कि अब कुछ भी कहा जाता नहीं,
न हों बेचैन जब तक चैन अब आता नहीं....
खड़ी थीं मंजिलें झुककर मिरे इंतज़ार में,
उस वक्त हम मशग़ूल थे दीद-ए-यार में........
मुझे तू याद कर या भूल जा तेरी रज़ा,
कसम मुझको लगे जो मैं तुझे आवाज़ दूं..!
मुझे तू भी ढूंढेगा इस क़दर
कभी ज्यों गाँव को ढूंढेगा शहर....