कविता...
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आजकल रात में अक्सर..
भड़भडाकर खुल जाती हैं आंखें !!
टूट जाती है सपनों भरी नींद
गला सा रुंधता है, कुछ दम सा घुटता है..
होठ सूखते हैं,
फेंफडे सुबकते हैं,
हवा के एक अदद झोंके की चाह में तड़पते हैं..
........बदन पै आने वाली इस आपदा का ये आलम तब से है..!!!!!
जब से उग आया है...
एक "चार मंजिला मकान"
मेरे दुमंजिले पर बसे कमरे की "खिड़की" के उस ओर..
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भड़भडाकर खुल जाती हैं आंखें !!
टूट जाती है सपनों भरी नींद
गला सा रुंधता है, कुछ दम सा घुटता है..
होठ सूखते हैं,
फेंफडे सुबकते हैं,
हवा के एक अदद झोंके की चाह में तड़पते हैं..
........बदन पै आने वाली इस आपदा का ये आलम तब से है..!!!!!
जब से उग आया है...
एक "चार मंजिला मकान"
मेरे दुमंजिले पर बसे कमरे की "खिड़की" के उस ओर..
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