Friday, January 16, 2015
गीत
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खंड-खंड नदियां हैं..
चूर-चूर पहाड़,
हवा के बदन पे ठोक दी गई हैं कीलें हजार..
आसमान गिर रहा है,
सिर पे चटख-चटख कर....
धंस रही है धरती,
पाताल में सिमटकर.....
ओह्ह पेड़ रो रहे हैं
खुद से लिपट-लिपटकर,
उल्का बनी हैं बूंदें,
गिरती पिघल-पिघल कर....
वो आग को तो देखो..
जाने कहां से आई..?
फिर-फिर के उड़ रही है
माथे पे बाज बनकर.....
ये रात है या मजमा,
चीखों का लग रहा है
चिंघाडऩे लगी हैं,
कब्रें उघड़-उघड़ कर.....
रो रहा है सूरज,
क्यों फिर उदय हुआ हूं,
क्यूं भस्म में न होता,
या क्यों न बुझ गया मैं.....
किसने सितम किया है,
किसने इसे है ढोया..
..... ओह्ह फिर कोई फकीरा,
लगता है दिल से रोया..
Friday, January 2, 2015
जब कोई ह्रदय वृंदावन हो जाए...................
फिर आइये, चाहे जाइये
या घर बना बस जाइये....
चाहे ब्रज की ठंडी रेत में
मदमस्त लोट लगाइए,
या ठोकरें देकर जमीं को
धूल-धूल उड़ाइए..
चाहे रख जटा घनघोर
भीषण तप या धूनि रमाइए
चाहे हाथ ले संतूर
दर-दर कृष्ण-राधे गाइए..
चाहे बैठ मीठे कंठ से
फिर प्रेम राग सुनाइए
या लेके तबला द्रुत गति में
तीन ताल बजाइए
चाहे मानकर उपवन मनोरम
फूल-शाक उगाइए
या जानकर शमशान नित
लाशें यहां दफनाइए
चाहे जग भलाई के लिए
कूए-बावड़ी खुदवाइए
चाहे खोद-खोद जमीन, पीपल
नीम, वट लगवाइए
चाहे आए दीवाली तो जगमग
घी के दीप जलाइए
या फाग गा होली पै
भर-भर रंग-गुलाल उड़ाइए......
कि कोई असर नहीं
..............जब कोई ह्रदय वृंदावन हो जाए.......
फिर आइये, चाहे जाइये
या घर बना बस जाइये....
चाहे ब्रज की ठंडी रेत में
मदमस्त लोट लगाइए,
या ठोकरें देकर जमीं को
धूल-धूल उड़ाइए..
चाहे रख जटा घनघोर
भीषण तप या धूनि रमाइए
चाहे हाथ ले संतूर
दर-दर कृष्ण-राधे गाइए..
चाहे बैठ मीठे कंठ से
फिर प्रेम राग सुनाइए
या लेके तबला द्रुत गति में
तीन ताल बजाइए
चाहे मानकर उपवन मनोरम
फूल-शाक उगाइए
या जानकर शमशान नित
लाशें यहां दफनाइए
चाहे जग भलाई के लिए
कूए-बावड़ी खुदवाइए
चाहे खोद-खोद जमीन, पीपल
नीम, वट लगवाइए
चाहे आए दीवाली तो जगमग
घी के दीप जलाइए
या फाग गा होली पै
भर-भर रंग-गुलाल उड़ाइए......
कि कोई असर नहीं
..............जब कोई ह्रदय वृंदावन हो जाए.......
कविता.. ख्वाब
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ओ प्रिय
तुम मुझे जान से ज्यादा प्रिय हो,
फिर भी तुम मेरी जिंदगी तो नहीं हो सकते..
हां तुम मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत ख्वाब हो..
वही ख्वाब जिसमें डूबकर मैं हो जाती हूं
जिंदगी से मुक्त,
वहीं ख्वाब जिससे उबरकर जब जिंदगी में वापस लौटती हूं,
तो भी होश होता है बेखबर और
मेरी आंखों के सामने नाचती रहती है तुम्हारी तस्वीर,
तुम्हारी बातें, तुम्हारी मुस्कुराहट, तुम्हारा गुस्सा और एक बिना गुदा हुआ नाम
जो हवाओं में बहता है और आंखों के आगे फैल जाता है,
जैसे पुतलियों पर मढ़ दी गई हो कोई फिल्म,
ओह्ह कि तुम एक बेशर्म ख्वाब हो
जो बार-बार आता है मुझे
तुम स्वार्थी और दबंग भी हो
जो किसी और ख्वाब को मेरी आंखों में टिकने नहीं देता,
ओ ख्वाब क्या तुम जानते हो?
हम बड़ी अजीब कश्मकश में जी रहे हैं,
हर रात के ढ़लने से पहले सो जाने की कोशिश करते हैं,
ताकि रातभर देखते रहें ये हसीन ख्वाब,
ओह्ह कि हम पलकों के दरवाजों को चौपट खोलकर रखने को भी हैं मजबूर,
क्योंकि डरते हैं,
आज अगर न आया वो ख्वाब तो...??
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प्रिया गौतम
देहदान
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ओ प्रिय
आज आखिरकार कर दिया मैंने अपनी देह का दान,
ले जाओ और ले जाकर रख दो इसे पांच फुट दो इंच लंबे, किसी गहरे ताबूत में,
जहां इसे दोबारा खोल सको..
सुनो...
इस साल जून की किसी दोपहर में,
खींच ले जाना मेरे शरीर से हरी-हरी नसें,
और दो पाटियों पे नसों को लपेटकर, बुनवा लेना अपने लिए एक हरियल पलंग..
जिसकी मुलायम बुनावट पर तुम सो सको, जब दुनिया के कामों से थककर चूर हो सबसे ज्यादा..
ओ प्रिय
आंगन में पड़ी उस बोतल को उठा लाना, और मुंह तक भर ले जाना मेरा लहू..
कि कपड़े का फोहा बोतल के ढक्कन में लगाकर, धीमे से करना प्रज्जवलित..
मेरा लहू तुम्हें देगा रातभर रोशनी..
जानते हो ?
मेरी आंखें बोलती हैं.. ऐसा लोग कहा करते थे..
गौर से सुनो..
ये आंखें निकालना
और तुम दे देना उन मासूम बच्चों को, जो स्कूल की प्रतियोगिता में तस्वीर बनाने के लिए मांगेंगे तुमसे रंग और सामान खरीदने के लिए पैसे..
उनकी बनाई हुई तस्वीर में जब चिपकी होंगी ये दो आँखें, तो जीवंत हो उठेगी मेरे ह्रदय के टुकड़ों की तस्वीर ..
ओ प्रिय
फिर मेरा दिल निकालना..
और बाकी बची मेरी हड्डियों और सूख चुकी खाल को इकठ्ठा कर लगा देना आग..
ये जलती रहेंगी और फिर खुद-ब-खुद बुझकर बन जाएंगी राख..
हां कि मेरा दिल तुम्हारे पास है..
जो किसी मर्ज की दवा नहीं.. इसलिए इसे कांच के मुंहबंद मर्तबान में बंद कर
रख देना अपने ड्राइंगरूम के शो केस में ..
इसकी बेचैनियां इसमें पैदा करती रहेंगी झनझनाहट और ये हिलता-डुलता खिलौना...
........... आजीवन करता रहेगा तुम्हारा मनोरंजन.......
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प्रिया गौतम
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ओ प्रिय
आज आखिरकार कर दिया मैंने अपनी देह का दान,
ले जाओ और ले जाकर रख दो इसे पांच फुट दो इंच लंबे, किसी गहरे ताबूत में,
जहां इसे दोबारा खोल सको..
सुनो...
इस साल जून की किसी दोपहर में,
खींच ले जाना मेरे शरीर से हरी-हरी नसें,
और दो पाटियों पे नसों को लपेटकर, बुनवा लेना अपने लिए एक हरियल पलंग..
जिसकी मुलायम बुनावट पर तुम सो सको, जब दुनिया के कामों से थककर चूर हो सबसे ज्यादा..
ओ प्रिय
आंगन में पड़ी उस बोतल को उठा लाना, और मुंह तक भर ले जाना मेरा लहू..
कि कपड़े का फोहा बोतल के ढक्कन में लगाकर, धीमे से करना प्रज्जवलित..
मेरा लहू तुम्हें देगा रातभर रोशनी..
जानते हो ?
मेरी आंखें बोलती हैं.. ऐसा लोग कहा करते थे..
गौर से सुनो..
ये आंखें निकालना
और तुम दे देना उन मासूम बच्चों को, जो स्कूल की प्रतियोगिता में तस्वीर बनाने के लिए मांगेंगे तुमसे रंग और सामान खरीदने के लिए पैसे..
उनकी बनाई हुई तस्वीर में जब चिपकी होंगी ये दो आँखें, तो जीवंत हो उठेगी मेरे ह्रदय के टुकड़ों की तस्वीर ..
ओ प्रिय
फिर मेरा दिल निकालना..
और बाकी बची मेरी हड्डियों और सूख चुकी खाल को इकठ्ठा कर लगा देना आग..
ये जलती रहेंगी और फिर खुद-ब-खुद बुझकर बन जाएंगी राख..
हां कि मेरा दिल तुम्हारे पास है..
जो किसी मर्ज की दवा नहीं.. इसलिए इसे कांच के मुंहबंद मर्तबान में बंद कर
रख देना अपने ड्राइंगरूम के शो केस में ..
इसकी बेचैनियां इसमें पैदा करती रहेंगी झनझनाहट और ये हिलता-डुलता खिलौना...
........... आजीवन करता रहेगा तुम्हारा मनोरंजन.......
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प्रिया गौतम
तुम इश्क कहोगे, हम राख कहेंगे
तुम हुस्न कहोगे हम खाक कहेंगे।।
तुम राम हो उपवन हो फूलों से सजे झूमो
मैं कृष्ण घना जंगल यही बात कहेंगे ।।
तुम मधुर-मधुर, हम क्षार क्षार
तुम सुर्ख मिलन, हम इंतजार
तुम लौ अखंड, हम अंधकार
तुम आनंदवन, हम उजड़े थार
तुम तीर-ए-नजर, हम आर पार
तुम चैन-ओ-सुकूं, हम बेकरार
तुम अभयदान, हम तड़ीपार ।।
तुम रंग हंसों, फूल खिलो
जींस्त जियो जान-ए-जहां
हम डूब के सहरा में
इंकलाब करेंगे।।
तुम हुस्न कहोगे हम खाक कहेंगे।।
तुम राम हो उपवन हो फूलों से सजे झूमो
मैं कृष्ण घना जंगल यही बात कहेंगे ।।
तुम मधुर-मधुर, हम क्षार क्षार
तुम सुर्ख मिलन, हम इंतजार
तुम लौ अखंड, हम अंधकार
तुम आनंदवन, हम उजड़े थार
तुम तीर-ए-नजर, हम आर पार
तुम चैन-ओ-सुकूं, हम बेकरार
तुम अभयदान, हम तड़ीपार ।।
तुम रंग हंसों, फूल खिलो
जींस्त जियो जान-ए-जहां
हम डूब के सहरा में
इंकलाब करेंगे।।
गीत
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महफिल-ए-मदहोशियों में, रोशनी फिर लुट रही
एक जलती लौ कहीं फिर लडख़ड़ाकर बुझ रही
रो रहा आंगन
दीवारें चीखती हैं रात दिन,
घर का सीना फट रहा, छत बूंद-बूंद रिस रही...
मां के हाथों की बनी
रोटी पड़ी बिखरी कहीं
आग गायब हो गई
चूल्हे में लकड़ी गल रही
खो गए रंगीन सपने
गुम हुई नादानियां
और परियों की कहानी, कील-कील चुभ रही
वो हंसी, वो खिलखिलाहट
हूक-हूक रो रही
और सन्नाटों की आहट जिस्म-ओ जां में बस रही
ये झनकती पायलें
बिंदी, खनकती चूडिय़ां
दूर फैंक भी दो कि ये नाग बनकर डस रही
हूं कहां मैं और
ये दुनिया कहां है ओ खुदा
क्या ये मुझसे हो रहा है, जाने क्या मैं कर रही
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महफिल-ए-मदहोशियों में, रोशनी फिर लुट रही
एक जलती लौ कहीं फिर लडख़ड़ाकर बुझ रही
रो रहा आंगन
दीवारें चीखती हैं रात दिन,
घर का सीना फट रहा, छत बूंद-बूंद रिस रही...
मां के हाथों की बनी
रोटी पड़ी बिखरी कहीं
आग गायब हो गई
चूल्हे में लकड़ी गल रही
खो गए रंगीन सपने
गुम हुई नादानियां
और परियों की कहानी, कील-कील चुभ रही
वो हंसी, वो खिलखिलाहट
हूक-हूक रो रही
और सन्नाटों की आहट जिस्म-ओ जां में बस रही
ये झनकती पायलें
बिंदी, खनकती चूडिय़ां
दूर फैंक भी दो कि ये नाग बनकर डस रही
हूं कहां मैं और
ये दुनिया कहां है ओ खुदा
क्या ये मुझसे हो रहा है, जाने क्या मैं कर रही
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