Monday, July 16, 2012

वो मां है मेरी 


कोई हस्ती नहीं, ना चमत्कार है,
वो तो बस सीधी-साधी सी मां है मेरी।

काम करते हुए, मन में मेरे लिए,
हर बखत बुदबुदाए वो मां है मेरी।


बिछड़कर उससे रोऊं तो डांटे मुझे,
खुद तो दिल में ही रो ले वो मां है मेरी।

अपने सपनों को जी तो रही हूं मैं पर ,
याद रह-रह के आए वो मां है मेरी।

सांस खींचू या छोडूं हो आहट उसे,
मेरे हर दम में बसती वो मां है मेरी।

 भूल के फिक्र बिल की वो घंटो मुझे
फोन पर जीना सिखलाती मां है मेरी।

गर खफा हो भी जाए वो मुझसे कभी
बस लिपटकर मना लूं वो मां है मेरी।

मुझको बनना नहीं कोई व्यक्त‌ि महान,
मैं तो बन जाऊं बस जैसी मां है मेरी।

जन्नतों की जगह हर जनम में खुदा,
हाथ फैला के मांगू वो मां है मेरी।।










 

Friday, July 13, 2012

किसी और की क्या मजाल ,
हर पल हम अपनी ही साजिशों के शिकार हैं।।
यकीं कर के देख.............
 
कारनामों पे अपने यकीं करके देख
खुद की हस्ती बनाने का दौर आया है।

बुझ गईं जो जली थीं मशालें कभी
उनमें लपटें उठाने का दौर आया है।

छोड़ दो दूसरों के बने रास्ते
खुद को अब आजमाने का दौर आया है।

पूछते हो किसे, देखते हो कहां
खुद की दुनिया बसाने का दौर आया है।

अपनी चाहत और हिम्मत को तुम बांध लो
शीघ्र मंजिल पे चलने का दौर आया है।

हो चुकी इंतेहा, यूं न बैठे रहो
दौड़ में अपने छाने का दौर आया है।

भूल जाओ जो मोती न तुमको मिला
छूट में हीरा पाने का दौर आया है।

छोड़ कर आगे बढ़ बीते किस्से प्रिया
अब तो उत्सव मनाने का दौर आया है।।
बहुत सुखद है.............
 
यूं तरसते लोगों की उम्मीदों को धता बताना,
एक झलक दिखलाकर, फिर तुम्हारा कहीं छुप जाना।

हाय,गलत घोषणाऔं पर मौसम विभाग की किरकिरी कराना,
फिर मायूस चैहरों पर तरस खाकर, इसका झमाझम बरस जाना।

रात की इस यकायक में चमचमाती कारों का यूं जाम में फंस जाना,
पैदल शहंशाहों का मुस्कुराकर चिढ़ाते हुए कारों के बीच से निकल जाना।

मेह में लिपटी कीचड़ में यूं अचानक पैर का धंस जाना,
ओह -सिट... कहकर मोहतरमाओं का फिर जोर से चिल्लाना।

कुछ खिदमतगारों का रूमानी फिजा में घर में चाय और पकोड़े उड़ाना,
तो कुछ का उजड़ते घर को समेटने में ही सावन का बीत जाना।

बखूबी जानती हूं मैं कि अलग-अलग होता है सबकी जिंदगी का फसाना,
पर एक बार महसूस तो करो बहुत-बहुत सुखद है हर बार सावन का आना।

Wednesday, July 11, 2012

असंख्य बेटों की बीमार माँ का हाल

जमाने ने करवट ली, नया दौर, नई तारीख, नया दिन,नयी सोच और उसके साथ रिश्तों के नए-नए रूप, लेकिन नहीं बदली तो एक चाह ,एक उम्मीद कि कम से कम एक बेटा तो हो। यहां मेरा आशय बेटे और बेटी के मुद्दे से अलग उस मां को लेकर है जिसके इस दुनिया में असंख्य बेटे हैं। वही बेटे जो बड़े गर्व से इस बात की पुष्टि करने के लिए एक ही पल सैकड़ों सबूत हमारे मुंह पर मार देते हैं। ये सपूत सैकड़ों वर्षों से सिर्फ अपनी मां पर निछावर हैं, उसकी सेवा करते हैं, उसे बचाने के लिए तन-मन और धन से तत्पर रहते हैं। ये अपना मन मां को दे चुके हैं, तन से मेहनत करके उसके लिए सुविधाएं इकट्ठी कर रहे हैं और धन तो मां के चरणों में ही है।  ये जागरुक होने का दावा करते हैं, और अपने प्राणों की आहूति देने के लिए सदैव  खड़े रहते हैं, लेकिन मां की दुर्दशा बुढापे में हुई बीमारी की तरह उसे जकड़ती ही जा रही है। ये बेटे नहीं जानते कि चूक आखिर कहां हुई ? अवस्था आखिर विकृत से विकट विकृत क्यों हुई? ये घोषणा करते हैं कि इन्होंने अपने-अपने स्तर से सारी सेवाएं और इलाज किए। तुलनात्मक रूप से इन्होंने देश के साथ साथ विदेशों से भी सुविधाओं का जुगाड़ किया, यहां तक कि अनशन से लेकर भूख हड़ताल और धरना तक किया। क्या-क्या नहीं किया और आज भी क्या-क्या नहीं कर रहे और स्वस्थ होने की उम्मीद से इतर आगे भी करेंगे।

इन्होंने आपस में ही बांट ली सेवाएं, कभी हाथ के घाव से बहते पस को गौरव सेना साफ कर जाती है तो फूटी आंख से निकलते आंसुओं को यमुना रक्षा समिति, कभी पोपले मुंह में बृज मजदूर कल्याण समिति निवाला डाल जाती है तो यमुना एक्शन प्लान वाले दो बूंद पानी, लेकिन खबरें छपती हैं, सुर्खियां बनती हैं और बेटे अपनी सराहना पर जश्न मनाते हैं, और सेवा भी करते हैं लेकिन इस मानसिकता के साथ कि मां के दूसरे बेटे से ज्यादा सेवा का श्रेय मुझे मिले।

भाइयो ; ये दुर्भाग्यशाली मां यमुना है जिसके बेटे एक छोटा सा सच नहीं जानते कि अगर वे सभी एक साथ मिलकर एक दिन मां के सारे घाव भर दें तो टुकड़ों में बंटी मां अपने स्वरूप को वापस पा लेगी।