Monday, September 28, 2015

जी करता है..
डायनामाइट की छड़ों में,
लपेटकर आरडीएक्स का बुरादा,
सरेआम रख दें,
माथे की उथली नसों पर ..

और फिर बेहद नजदीक से, खड़े होकर देखें,
तमाशा.. दिल की सबसे भीतरी सुरंग को भी,
फ्यूज कर देने वाली धमक में,
एक साथ ..उगते और बुझते सैकड़ों सूरजों का..

आह.. कि अल्लाताला के दिए हुए दोनों हाथों से समेटें,
परखच्चे...
माथे की फट चुकी नसों के,
कानों को एकमुश्त कर सुनें और सुनते रहें,
मौत की आस में विलाप करती चीखें..
फिर गाढ़ लें टिकौरी और देखते ही रहें
मांस के लोथड़ों से रिसता खून,
घंटों...एकटक..

फिर... फच्च की आवाज में फोड़ें फफोले,
चमड़ी पर उगे हुए..
और जोर से खींचे एक कश सुलगते जख्मों से उठती टीसों का..

हां.. कि आजिज आ चुके हैं..
भीतर रोज-रोज फटते ज्वालामुखी से..
बेचैनियों का लावा जमता है, पिघलता है
फटता है, फिर जमता है, और फिर फट पड़ता है..
पर कम्बख्त बाहर निकलता नहीं,
इस देह की तहों से ...

काश्.. कि अब बेचैनियों के ज्वालामुखी के मुहाने पर डाल दी जाए मु_ीभर बारूद..
और हाथ बांधकर देखा जाए नजारा आखिरी विस्फोट का ..

आमीन..आमीन..


(मु_ीभर वीभत्स रस..और सांस भर बेचैनियां... )





अल्लाहताला, मुठ्ठीभर
२०१४
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तुम बिल्कुल भी नहीं जानते,
लेकिन मैं भलीभांति जानती हूं,
तुम इतने ही निष्ठुर हो,
जितने कि मेेरे लाखों आंसुओं को ठोकर मारकर, मुझे छोड़कर कहीं दूर चले गए मेरे बूढ़े दादाजी,
पर तुम इतने प्यारे भी हो,
जितने कि मेरी बहिन के दोनों मासूूम बच्चे, जिन्हें मैं ह्रदय का टुकड़ा कहा करती हूं..
तुम नहीं जानते,
इसलिए सुनो
मुझे तुमसे इतनी ही नफरत है जितनी किसी सह्रदय, पशुप्रेमी शाकाहारी को प्लेट में रखे गोश्त से हो सकती है..
ओह्ह कि मैं तुमसे प्रेम भी कर बैठी, जानना चाहते हो कितना..
बस उतना ही ..जितना कि मादा क्रौंच का पक्षी करता है नर क्रौंच से...
एक बात बताएं..
मेरे हाथों में सिर्फ मेरी लकीरें दर्ज हैं और हवा भरी है..
मैं बहुत सिमटी सी प्राणी हूं,
इसलिए इन्हीं लकीरों को पैमाना बनाकर अपनी भावनाओं को नापती रहती हूं...
और बेवजह हवा से तोलती रहती हूं माथे में वजन पैदा करती स्मृतियों को..
और एक तुम .. जो मदमस्त हाथी की चाल से मेरी जिंदगी के उन सर्द और गर्म दिनों में आकर बैठ गए..
जब कि मैं एकांत ढूंढ़ रही थी.. 
तुमने मेरी रातों को भी नहीं बख्शा,
कि मेरी आंखों में हसरतों के ख्वाब बोए..
अंकुरों को फूटने की आस जगाई..
हां जानती हूं वो तुम ही थे, जिसने जिंदगी की धरती को आकाश से मिलाए रखने के लिए हल चलाने का जज्बा पैदा किया..  
और तभी लहलहाती फसलों को देखकर जब मेरा मन चहक उठा, तो रात पड़ी बर्फ ने









महफिल-ए-मदहोशियों में, रोशनी फिर लुट रही
एक जलती लौ कहीं फिर लडख़ड़ाकर बुझ रही

रो रहा आंगन
दीवारें चीखती हैं रात दिन,
घर का सीना फट रहा, छत बूंद-बूंद रिस रही...

मां के हाथों की बनी
रोटी पड़ी बिखरी कहीं
आग गायब हो गई
चूल्हे में लकड़ी गल रही

खो गए रंगीन सपने
गुम हुई नादानियां
और परियों की कहानी, कील-कील चुभ रही

वो हंसी, वो खिलखिलाहट
हूक-हूक रो रही
और सन्नाटों की आहट जिस्म-ओ जां में बस रही

ये झनकती पायलें
बिंदी, खनकती चूडिय़ां
दूर फैंक भी दो कि ये नाग बनकर डस रही

हूं कहां मैं और 
ये दुनिया कहां है ओ खुदा
क्या ये मुझसे हो रहा है, जाने क्या मैं कर रही


..................


बाबुषा....

दिन आज सुहाना है प्यारे
आओ एक गीत सुनाते हैं, 
जब हम नादान भटकते थे,
कहीं नाम सुन लिया बाबुषा..

वो तस्वीरों में दिखी हमें,
सुलझे बालों में उलझी सी
आंखें टिमटिमटिम चमक रही
बच्चे सी ठुकमती बाबुषा

अब शैतानों की नानी थे
सो हम इक रात जगे जीभर
फिर वॉल पे जाकर ढूंढ लिया
आधी पढ़ डाली बाबुषा

उस रात उछलकर नाच उठे
और गीत गा लिया बाबुषा
जब आंख खुली, सब भूल गए
बस याद रह गया बाबुषा

फिर दीवानों सा हाल हुआ
हर जगह दिखे बस बाबुषा
रच दिया नया एक जीवन तब
और नाम रख दिया बाबुषा

वो नीले अंबर की चिडिय़ा
या थी परियों में सोन परी
वो फसल चुकंदर की थी या
बह रही नर्मदा बाबुषा

हम रोज शरारत करते थे
जीभर के नाच नचाते थे
दुनिया उससे थी सकुचाती
हम खूब छेड़ते बाबुषा

हम उद्दंडी बालक थे अब
ये जान चुकी थी बाबुषा
फिर बाढ़ प्रेम की आई और
इक रोज मिल गई बाबुषा

अब धरती, नभ, सूरज, चंदा
रोटी और साग भी बाबुषा
सांसों में हवा, रोगों की दवा
मम्मू में बदल गई बाबुषा

वो छांव कभी छाता बनती
खुलती ओ सिकुड़ती बाबुषा
दुनिया को सुख भर-भर देती
खुद दूर हो गई बाबुशा

एक दिन ऐसा आया यारो
हमने भी दुखाया दिल उसका
उसे खूब कही खोटी-खोरी
सुनकर के रोई बाबुषा

वो दिन काला, मनहूस भी था
जो रूठ गई थी बाबुषा
पर देख दुखी, ममता उमड़ी
मुझे ह्रदय में ले गई बाबुषा

जब इश्क कभी होगा मुझको
जग प्रेम-पे्रम चिल्लाएगा
मैं दोनों हाथ उठाकर के
बस शब्द कहूंगी बाबुषा

सुन लो ओ मेरे प्रिय-जनों

प्रिया नाराज कभी हो तो
तुम गोद में सर रखकर उसका
बस प्यार से कहना बाबुषा

माथे पर मेरे ज्वार चढ़े
और दुआ-दवा भी चुक जाएं
मेरे कान में आकर कह देना
दो बार बाबुषा, बाबूषा..

जब मृत्यु सिरहाने आकर
मुझे लेकर उडऩे को आए
मेरे मन को धीर बंधाना तब
मुझे राग सुनाना बाबुषा

मृत्यु है ईश्वर की करुणा
जिंदगी है उसका प्रेम प्रिए
ये शब्द भी रस ले ले कर के
दोहराती है अक्सर बाबुषा

तो सुनो कि जब मैं दुनिया से
ईश्वर की करुणा पा जाऊ
तुम राम का नाम नहीं भजना
बस जोर से कहना बाबुषा


बब्बूगोशा......

मुझे पूरा एक चाहिए... मुझे पूरा एक बाबू चाहिए... मां मुझे पूरा दो ना.. अगली बार बाबू आए तो सबको बांट देना.. मुझे बिल्कुल मत देना..
अभी मुझे एक चाहिए..
और यह कहते-कहते वह रोने लगी। उसकी आंखों से आंसू एक के बाद एक उसके गालों पर लुढ़कते रहे.. पर रोने की आवाज गायब थी.. मुंह से बस एक ही बात बार-बार निकल रही थी. मुझे पूरा एक बाबू चाहिए...
.मां जोर से चिल्लाई .... पिंकी... चुप हो वरना एक थप्पड़ मारूंगी...मां जानती थी... वो बाबू किसको बोल रही थी... यह बब्बूगोशा थे.. जो पिताजी आज पहली बार लेकर आए थे.... उससे पहले पिंकी ने बब्बूगोशा नहीं देखे थे..
मां बोलती रही.. नहीं तू अकेली नहीं है.. घर में सब बच्चे हैं.. और मैं सबका हिस्सा तुझे कैसे दे दूं.. जितनी बड़ी हो रही है उतनी ही जिद्दी होती जा रही है.. मां बड़बड़ाती रही.....और सबको आधा-आधा बब्बूगोशा बांटकर, दो बब्बूगोशा उठाकर रसोई की तिखाल में रखकर चुपचाप गायवाले घर में बंधी गाय को खोलने के लिए निकल गई। मां गाय रखती थी.. ताकि बच्चों को दूध मिलता रहे.. इसलिए हर दोपहर गायों को खेल देती थी.. गायें दिनभर घूमती और शाम को फिर लौट आती....
मां उधर को निकली और पिंकी ने कमरे की ओर दौड़ लगा दी। वह बैड पर औंधे मुंह लेट गई। और खूब रोई.. आज उसके भी सिर पर जिद चढ़ चुकी थी। अब तो वह और जिद्दी हो गई.. उसने मन ही मन सोचा.. अब लेगी तो पूरा बब्बूगोशा.. इतनी सी देर में


गुरुमंतर ..

तब गुरुजी ने गुरुमंतर दिया था,
और मैं उम्र की कच्ची पगडंडी पर एक पैर से खड़े हो,
शरीर को साधने की कला जान रही थी
उस वक्त मेरे बाल खुले थे..
मां चिल्लाती,
मुझे जबरन पकड़कर लाती,
और बालों में आधी कटोरी तेल उड़ेलकर
बालों को कसकर बांध देती, फिर धीरे-धीेरे कहती..
गुरुमंत्र ले लिया भजन भी नहीं करती..
तब मैं जोर से हंसा करती...
और कहती, एक दिन बाल खुलेंगे, तो तुम्हारे ईश्वर को लटों से बांध लूंगी,
और फिर देखती रहना, कभी बाल न बांधूंगी..

अब बाल जो खुले रह जाते हैं अक्सर ...



प्रेम
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कुछ लोगों का प्रेम हवा सा होता है
अदृश्य और रंगहीन,
जो सांसों के सहारे, खून में घुलता है,
शरीर में घूमता है, और रोमछिद्रों से होता हुआ बाहर निकलकर फिर हवा में घुल जाता है...
कुछ का निरा पहाड़..
सामने खड़ा हुआ, आसमान की आपदाओं से बचाता, अपनी गोद में पनाह देता..
आंधियों से टकराता,
लेकिन सांस भरने के लिए आती मधुर हवा को रोकता,
अविचल खड़ा हुआ ..
कुछ का प्रेम बहती हुई नदी सा होता है...
आओ किनारे बैठो..प्यास लगे तो अंजुली भरो.. पीओ..और अपनी राह पकड़ो... उतरे तो डूब जाओगे...
एक प्रेम धरती सा भी होता है..
जिसे जीवन भर रोंदते हैं हमारे कदम
जिसमें उगती हैं हमारी उम्मीदें..
और फिर..
इसकी परतों में मिल जाना होता है हमारा शरीर
लेकिन हम जीने से लेकर मरने तक भूलते रहते हैं इसकी उपस्थिति और इसका प्रेम...
आसमान, सूरज चांद, और तारे... भी प्रेम करते हैं..
जिन्हें आता है.. बस फैल जाना, उगना, और प्रेम में चमकना..
इन्हें अक्सर  देवता कह दिया जाता है..
कुछ लोगों का प्रेम बरसात की बूंदें हैं...
इसे मौसमी प्रेम भी कहते हैं..
एक नियत समय .. तब घनघोर बरसेगा.. पर शर्त है फिर साल भर तरसाएगा..
और हां दुनिया की कुदूरतें भी डालती हैं इसपे असर..
और एक आखिरी प्रेम होता है मां-पिता का..
अब बढ़ रही है मेरी बेचैनी..
बस बह रही हैं भावनाएं
क्योंकि..
इसके लिए
आज भी मैं ढूंढ रही हूं कुछ शब्द..


. राम का नाम भजे हनुमंता
श्याम का नाम भजो भई संता

. राधा कुंड मनोरम धाम
श्याम कुंड पर कर विश्राम

. आओ चलो चलें गोवरधन
 पहुंच करें गिरिराज के दर्शन

. कृष्ण भजो संग राधा नाम
पूरी आस करेंगे श्याम

. बृज रज बृज का है वरदान
मस्तक धर सिंदूरी जान

. गिरि की देख छटा घनघोर
घिरि घिरि रंग बरसे चहुंओर

. परिकम्मा है अति सुखकारी
यहां विराजैं राधे प्यारी

. आओ गांव पूंछरी आओ
श्याम सखा को शीश नवाओ

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ये है गांव पूंछरी भाई
जाकी सुनी है जगत बड़ाई
राम भक्त हनुमंत कहाई
श्याम भक्त हैं लौठा भाई
कि जाईकै मिलि लेओ, लेयो बलइयां, सखा की कृष्ण मुरारी की
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आओ  जतीपुरा पे आओ
देख मुखार-बिंद सुख पाओ
रबड़ी रसगुल्ला मेवन को
छप्पन व्यंजन भोग लगाओ
कि तृप्ति होगी तेरी, होगी कृपा जब जगत दुलारे की
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चलो चलें अब कुसुम सरोवर
जाकी झांकी बड़ी मनोहर
देख देख जब मन हरषेगा
बैठ भजेंगे गिरधर गिरधर
कि राधे नाम के संग में जै बोलेंगे बंसी बारे की
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परिकम्मा में सुनो रे भाई
राधे श्याम कुंड पे जाई
जो जो बहिनें दीप जलाई
सबकी होगी गोद भराई
कि आंगन में गूंजेगी किलकारी नटखट मतवारे की
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मन के कष्ट निकल भागेंगे
सोए भाग तेरे जागेंगे
बृज रज उड़ मस्तक बैठेगी
देव भी तेरा यश गावेंगे
कि तुझ को मिल जाएगी चाभी तब फिर प्रभु के द्वारे की
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परिकम्मा तुम कर लियो पूरी
कभी न छोड़ो आधी-अधूरी
क्षमा करो पापों को प्रभुवर
फिर तुम लो प्रभु से मंजूरी
कि तेरे फंद कटेंगे मिलेगी ज्योति कांवर कारे की
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