Thursday, August 23, 2018

अगर वो लौटे तो थाम लेना
सौ में से कोई ही लौटता है
कुछ तो रब्‍त रख इतने भी न दूर हो जाएं
कि जब कभी मिलें तो अजनबी हो जाएं
जो तुमने की वो गल़ती माफ़ है
सुधरकर आओगे तो थाम लेंगे
नहीं ख़बर थी ऐसा लम्‍हा आएगा
एक मुसाफिर दिल लेकर उड़ जाएगा
हर ख़ाब पे क़ीमत चस्‍पा थी
हम जेब छुपाकर गुज़र गए
आम के पेड़ पर आम ढूंढती हो
तुम दुनिया से वाकि़फ़ नहीं हो?
कि अब ऑनलाइन आ जा
हम भी तो तिरे मुंतजि़र हैं
प्‍यार नहीं है क्लियर कह दे प्‍यार नहीं
झूठ मगर कत्‍तई मुझको बर्दाश्‍त नहीं
इश्‍क तो है जनाब खेत की मूली
हुस्‍न का पर कोई मुकाबला नहीं
किताबें चार कम पढ़ लीजिए
बुजुर्गों की सदा सुन लीजिए
एक ये ही काम कबसे कर रहे हैं
गिर रहे हैं उठ रहे हैं गिर रहे हैं
ये किससे घर बनाया था मैंने
कोई बहार फिर से ढहा गई
अगर आंखें हैं तो उनमें डूबता क्‍यूं हूं
जो डूबा ही हूं तो मर क्‍यों नहीं जाता
यूं तो हम मर ही चुके हैं सैकड़ों ही बार 
पर गुमां इस बात का है खुदकुशी न की
हम चले थे जानिबे मंजि़ल प्रिया
तुमने टोका और घर याद आ गया
पत्नियों को भूल जाते हैं पति
साल दो शादी के हो जाने के बाद
आरज़ू थी आरज़ू ही रह गई
पांव छूना चाहते थे आपके
नाम ले दूं ग़र तो मच जाए बवाल
ऐसे-ऐसों की देखी है नंगई हमने
नहीं अब जानना मुझको गुनह मेरा प्रिया
मेरी हसरत है कि मुझको सज़ा दे दीजिए
मोहब्‍बत में अजी कोई रूह भी होती है क्‍या
हमसे तो आजतक मांगा गया है जिस्‍म ही
घर, मकां, ससुराल और क्‍या मायका
सब फ़क़त एक छत के ही हैं आसरे
कहो फ़टाफ़ट तुम्‍हारे दिल में, है जो याद हमारी है.
नहीं तो झोला उठा लिए हम, अब चलने की बारी है.
गोली खाकर यार हंसा जाए कैसे
मुझको उसका प्‍यार समझ आए कैसे
दिल भी लगना था मेरा उससे ही
जिससे सीखी थी बेवफ़ाई मैंने
मिलती है कहीं तो पता दे भाई
मुझे एक पाव वफ़ा लेनी है
करते हैं दुआ, बीमार हों हम,
कुछ ऐसे भी चा रा ग र हैं.


बात राधे से शुरू, राधे पे ख़त्म हो गयी.

23-07-2018
न जाने कैसी नींद थी? रात भर एक ही सपना. उफ़्फ़ ट्रेन छूट गई.मेघ जी डाँट रहे- 'तुम तो ट्रेन में चढ़ गई थीं फिर छूटी कैसे?' अब परीक्षा! उसका क्या?

मैं ट्रेन के गेट पे थी, किसी ने कहा हमें उतरना है, पहले तुम उतरो! और मैं उतर गई! ट्रेन चल पड़ी.

ऐसे कौन करता है इस दुनिया में? तुम एकदम पागल हो प्रिया!

हम्म!

न जाने कौन सी परीक्षा थी? न जाने कौन से शहर जाना था? रात भर स्टेशन पर दौड़ती रही. ट्रेनों का पता और समय पूछती रही. ट्रेन आती-जाती रहीं, कसक स्थिर रही.

और फिर नींद खुल गयी, कुछ भी तो न हुआ ऐसा! सब तो हंस रहे! मेरा सर भारी है.

मेघ जी बताओ न! हक़ीक़त में कितनी तो ट्रेन छोड़ीं, इतना अफ़सोस क्यों न हुआ?

24-07-2018
किसे अब दोष दें? जब
करम अपने बुरे हैं!


26-07-2018
दिल का मे'रे हाल भी दुनिया सा है,
हर जगह लिंचिंग ही लिंचिंग हो रही.

24-07-2018
किसे अब दोष दें? जब
करम अपने बुरे हैं!

26-07-2018
तुमाई गली सों गुजरेंगे नैक दरबज्जे पे आय जइयों..

29-07-208
ज़िन्दगी क्या है जनाब?
घर दवाओं का है जी!

30-07-2018
औ'र था वो दौर दिल जब गां'धी का गाल था,
काँ'पने लगता है अब बीपी के घट जाने से ही.

30-07-2018
कहीं तो व्यस्त हो तुम,
कहीं दिल लग गया है?


31-07-2018
छोड़ गए जमुना तट पे, आ जाऔ श्याम वहीं मिलि लेंगे.
तुमहुँ बतयियों कहा बीती, हम'हूँ अपने मन की कहि लेंगे...

01-08-2018
छोड़ती क्‍यों नहीं राह तकना,
लौट कर कोई आता है क्‍या?

02-08-2018
इश्क़ के रिश्ते में हम दोनों का ये है ओहदा,
तुम जमाई के पिता हो और मैं बेटी की माँ.

02-08-2018
गिड़गिड़ाने से भी कब मिलती है ज़िन्दगी?
सर रख दिया है सा'मने अब काट दीजिए.


03-08-2018
रंजिशे बेजा का हमको तोहफ़ा!
दो'स्तों को हमारा सलाम पहुंचे.

04-08-2018
ख़ुद की नज़रों में थे पाकीज़: 'प्रिया'
औ'र की नज़रों से देखा, गिर गए.


05-08-2018
सभी जगहें हुयीं कोठा,
हवस के दौर में हैं हम!

_\ क्‍या मुज़फ्फ़रपुर क्‍या देवरिया.

06-08-2018
जिस्म तक पहुंचें'गे हा'थ लोगों के!
मोहब्बत हो न हो मसला नहीं अब.


06-08-2018
तू पा'गलों सा घूमे,
तुझको न चैन आये.
मेरी आरज़ू यही है
'मेरी' याद यूँ सताये.

सब पास में हों तेरे
तू सबको भूल जाए.
सब दें तुझे दिलासा
तुझे सब्र ही न आये.

करने को बात मुझसे
तू फोन तो उठाये,
पर जब मुझे मिलाये
नम्बर ही भूल जाए.

तड़पे ओ'मुझसे मिलने
सब छोड़कर तू आये,
चढ़ने को जब तू दौड़े
तेरी ट्रेन छूट जाए!

तब याद मेरी तुझको
कुछ इस तरह रुलाये,
रोती है जैसे विधवा'
कोने में सर टिकाये.

जब चुप कराये कोई
तू और बिलबिलाये,
तुझे याद मेरी आये
और बेहिसाब आये.

ये इल्म भी ज़रूरी
है आना 'प्रिया'आये
कि उम्र भर को कोई
बिछड़ा है तुझसे हाये.

07-08-2018
चुप हो गए हो तुम यूँ
ऐसा भी क्या हुआ है?
मैं माफ़ कर ही दूंगी,
इक फ़ोन यार कर लो.

8-08-2018
बदल दो श्लोक गीता के ओ' माधव,
यहां देखी हैं हमने आत्मा मरती हुई.

11-08-2018
हमें है इल्म ये किरदार ही हिस्से में आ'ना है.
हमारी जा'न जानी है, हमीं को मुस्कुराना है.

नहीं आया जो हमपे आजतक, वो, आजमाना है,
कि किसपे जान देनी है ओ' किससे दिल लगाना है.

वो ही जो प्यार से झां'से में लेकर बेच देता है,
उसी से कह रहे हैं हम कि ते'रा प्यार पाना है!

नहीं है दोष पर, कह दूँ तो दुनिया नोच डालेगी,
कि हमको माहवारी है, ख़ुदा के घर भी जाना है.

यही है गीत 'प्रिया' लिख के जिसको हम बड़ा रोये,
ओ' हँसकर कह रहे हैं सब, यही फिर से सुनाना है.


11-08-2018
खामखाँ है ये बताना भी कि हम हैं 'खामखाँ'

12-08-2018
जितनी मैंने सांस नहीं लीं,
उतने सबक हैं, मेरे पास.

13-08-2018
कि हमने झूठ भी जीए हैं ऐसे,
कि जैसे ज़िन्दगी जीते हैं लोग!

13-08-2018
यही रस्मो-रिवाज़ ए ज़िन्दगी सबको निभाना है,
किसी को छोड़ दे'ना है, किसी से छूट जा'ना है.

14-08-2018
दिल,सर,मन और साँसों से
कोई हमें दिला दो आज़ादी.

15-08-2018
ग़लतियां गिनना तो अपनी है बड़ा मुश्किल प्रिया!
आ ओ चल कर देखते हैं, उंगलियॉं कितनी उठीं?

15-08-2018
रात के पौने 3 बजे ये कैसा अलार्म लगाया नींद ने? दबे पाँव आज फिर निकल गयी. दरवाजों की सांकलें भी न ठिठकी. कोई आहट नहीं.
आज फिर किसी सपने से डरी थी क्या?
हां! सपना आया था.

किसी शहर की यात्रा पर निकली हूँ मैं. इस बार ट्रेन नहीं ली. हर बार ही तो छूट जाने का डर रहता था.

आज बस मैं हूँ. सीट न मिली, नीचे बैठी हूँ धरती पर. फिर भी मन नाच रहा, गीत गा रही. हँस रही.
कुछ हौले-हौले बुदबुदा रही, हलक सूख रहा.

बस रोको रे भैया... मुझे प्यास लगी है!

बस रोकी गयी है!
सभी सवारियां घूम आएं, बस चलने से पहले लौट आएं, ड्राइवर बोल रहा.

कोई बीच राह का शहर है, बड़े-बड़े कुएँ हैं. बड़ी भीड़ है. मेरे पास गिलास है, घर से लेकर चली थी. मुझे पानी चाहिए, गला खिंच रहा अब.

इतने बड़े-बड़े कुएँ? पर इनका पानी हरा क्यों है? मैं सोच रही खड़ी-खड़ी, वक़्त गुज़र गया. सब पानी पीकर लौट आये.
तूने पानी पीया प्रिया? एक बहन पूछ रही.
न , नहीं तो.. कहाँ है पानी?
अरे इस कुए में से जल्दी भर गिलास, और भाग, बस छूट रही.
मैं आधा गिलास भर पाई, एक घूँट मुंह में डाला, ओह! खारा है! नमक है! कैसे पीयूँ?
आँख भर गयी. एक घूँट मीठा पानी न मिला!

लेकिन इस बार बस पकड़नी है, मैं दौड़ रही.....
और ..बस पकड़ ली पर मैं प्यासी हूँ!

16-08-2018
पहले हिज्र बुरा लगता था,
अब लगता है, पीछा छूटा!

17-08-2018
एक लिखावट! कैसी बातें करती हो?
प्रिया लोग तो कई दस्तख़त रखते हैं.

17-08-2018
कब तक गुज़र करेंगे यूं?
दिन आख़िर बहुरेंगे यूँ?

दम घुटने से डर लगता था,
क्या अब यार मरेंगे यूँ?

सब ही तो नापाक हैं सा'ले
कितनों को बख्शेंगे यूँ?

जा'ने वा'लों में जू'ते सौ
कब तक राह तकेंगे यूँ?

पति देवता है 'प्रिया' तो
क्या उसको छल लेंगे यूँ?

अब कुछ ढंग के काम करेंगे,
कब तक इश्क़ करेंगे यू?

आज, अभी से सुधरेगा, जी
दिल के पेंच कसेंगे यूँ!

18-08-2018
एक ही शख़्स हु'आ है रुख़सत
हो गया फिर क्यों ये शहर तन्हा

19-08-2018
लोग लिखते हैं जो अच्छा काफ़ी,
लोग अच्छे हों, ये ज़रूरी तो नहीं.

20-08-2018
आप करते हैं उम्मीद मो'हब्बत निभाने की!
लोगों को तमीज़ नहीं हाथ तक मिलाने की.

20-08-2018
नीच देखे बड़े हमने ज़माने में,
ज़िन्दगी पर तुझसा नहीं देखा.

21-08-2018
ऊधौ कछु बोलो मोरे स्‍याम का करत हैं? Priya Gautam
आठौ याम प्रेम की चिरैय्या कूं तकत हैं।। गोस्वामी पुष्पांग
ज़िन्दगी यूँ तो कई बार मिली
ज़ुर्मे ख़ूं में ही गिरफ़्तार मिली.

ख़ून भी मेरा ओ' मैं ही क़ातिल
उसपे मुझको ही सज़ा यार मिली.

चाह को पी लूँ, तलब थी मेरी,
वो भी मेरी ही तलबगार मिली.

वक़्त पे हमने किये सारे हिसाब
फिर भी हर चीज़ क्यों उधार मिली?

बच भी पाते तो भला कैसे प्रिया?
सबके चाकू में ग़ज़ब धार मिली.

शक्लो-शोहरत पे खरोंचें न मिलीं,
एक बस रूह ज़ार-ज़ार मिली.

22-06-2018
आने-जाने से होती थी तोड़-फोड़ बहुत !
सो हमने दिल में एक दरवाजा बना दिया.

23-08-2018