Sunday, November 1, 2015

सुनो, सुनो, इतना कि, दोनों कानों को बना दो शहर के बीचोंबीच रखे कूड़ेदान,
आंखों को बहने दो ऐसे... जैसे बारिश गुजरने के महीनों बाद भी बूंद-बूंद टपकती है किसी जर्जर पुश्तैनी मकान की छत..
जुबां को बंद करो चूहेदानी में... और फेंक आओ घर से मीलों दूर किसी निर्जन स्थान पर...
दोनों हाथों को उठाओ.. और कनपटियों पर रखकर हथेलियां, भींचो इतनी तेज कि चटख जाएं नसें..
ये जो होठ हैं न.. दो दीवारें हैं मेरी जान... जिनमें कैद होनी हैं सीने से उठती अनगिनत हूकें... 
और हां इस माथे का कोई मोल नहीं.... इसे चाहे पैरों पर पटको या चौखट पर.... ///
___________\ ओ प्रिये... करो सब, करती रहो .. जी करे तब तक.. जब.... बेबसी दस्तक दे दे... बेचैनी बदन तोड़कर फूटे, रास्ते पहाड़ हो जाएं, और आसमान पर टंगी हुई आंख.. तुम्हें देखकर आंखें फेर ले.. /////
मुझे फिर-फिर के आना है, खुदाया तेरी चौखट पर,
अदालत जो लगाई है, उसे फिर मुल्तवी कर दो ....
ना याद हमें क्या खोये और क्या पाये हम...
फिर भी जाने क्या ढूंढ़ रहा क्यों पागल मन......
सांसें टूटे, धड़कन टूटे, हाथ की हरी चूड़ियाँ टूटे...
तेरे दिल में मैं हूँ ज़िंदा, बस एक ये ही भरम न टूटे....||||
उस दुकान पर जाने से हरगिज बचना चाहिए, जिस पर चाय की तलब से ज्यादा कोई याद खींच कर ले जाए,
मिटी हुई तलब के बाद चाय घूंटों में नहीं पी जाती, और उग आई यादों के बाद चुस्कियों का हलक में उतरना भी संभव नहीं होता,
हल्के बादामी रंग के बुलबुलों से भरे कप में उबला हुआ यह वही तेजाब होता है.. जो माथे में जमी बेचैन परतों को धूंआ करता हुआ उड़ता जाता है और छोड़ता जाता है पसीने की कुछ बूंदें। उस वक्त सांस फेंफड़ों से होती हुई पीठ पर जाकर थम जाती है.. बादलों से ढ़की शाम भरी दोपहरी हो जाती है...और आंखों के सामने नाचती हैं कुछ धुंधली सी तस्वीरें और दोनों हाथों के चक्रव्यूह में बंधा हुआ कप
________________\ चाय सिर्फ चाय नहीं है
चाय के कप से जब मन ऊब जाये,
तेज प्यास में, पानी का गिलास मुंह से लगाना बोझ लगने लगे...
फोन की मीटिंग प्रोफाइल पे लगी घण्टी, कानों तक पहुंचते पहुंचते 400 डेसिबल पार हो जाये...
बारिश की बूँदें जी जलाने लगें... घड़ी की बढ़ती सुई, धड़कती नब्ज सी लगे... फेंफड़ो में भरी बेचैनी झटके से माथे में जा टकराये...और टकराती रहे
तो उठ जाओ....
और फिर से ढूंढो उस काग़ज के टुकड़े को....
जिसमें तुमने लिखा था कभी ...
' बेचैन हूँ तो है यकीं ज़िंदा हूँ मैं '
न सवाल करिये न ज़वाब की आरज़ू रखिये,
इस दौर की चाहत है प्रिया .. ख़ामोश रहिये.....
जिनके पहलू में सौ परियां, क्यों याद उन्हें हम आएं भला?.....
वो प्यार भला कोई प्यार हुआ?
इक डांट सहन ना कर पाये....????
कितना दिलकश है ..
पेड़ की सबसे ऊंची डाल से फल का टूटना,
कि जैसे 105 डिग्री फारेनहाइट तक पहुंचे बुखार का टूटना,
नाराज होकर खाना छोड़ बैठी, मां की कसम का टूटना
एक ही घर में दो बेटों के बीच खिंची दीवार का टूटना
भूखे, ललचाते बच्चे के हाथ में आई रोटी से पहले कौर का टूटना
नाचने की हद तक नाचती उस पगली के घुंघरुओं का टूटना
कि पति के हाथों पानी पीकर करवाचौथ के व्रत का टूटना
और
बस अच्छा नहीं है तो,
उस दिल का टूटना, दिल में बनी तस्वीर का टूटना,
तस्वीर में बैठे खुदा का टूटना, खुदा के लिए देखे सपने का टूटना,
और सपना देखने की हिम्मत का टूटना....
___________\ जुड़ी कहां हैं चीजें टूटने के बाद, इतना भी दिलकश नहीं.. " टूटना "
टूटती साँसों को भी हों उलझनें हज़ार...
_____ ज़नाब...इसे ही कहते हैं..अत्याचार...अत्याचार....अत्याचार
For Dr. APJ Abdul kalam.........

मैंने शब्दों को ढूँढा,
पर वो जाने कहाँ गायब हैं,
हर तरफ़ नज़र दौड़ा रही हूँ,
तो तुम्हारी ही तस्वीरें लगी हैं..
बीच की मांग निकाले, दो लटों को माथे पे डाले, और मुस्कुराते...
सब तुम्हें याद कर रहे हैं....
पर मुझे तो तुम हमेशा ही याद रहते हो...
मैं तो तुम्हें श्रद्धाजंलि भी नहीं दे पाऊँगी..
क्योंकि वो तो मैं उन लोगों को देती हूँ , जो मेरे जीवन और ज़ेहन में मृत होते हैं...
मेरी आँखों में देखो ...
ओ मेरे सबसे प्रिय वैज्ञानिक...
तुम मेरी अंतिम सांस तक ज़िंदा हो..
ओ दुनिया के सबसे सरल प्राणी...
तुम यहीं हो, मेरे एकदम करीब...
ओ ख़ुशी और प्रेरणा के झरने
ओ मेरे कलाम
मेरी आवाज सुनो...
तुम हो...
सबके सवालों का जवाब देने वाले
बस इतना बताओ..
___ कि आज मेरा गला क्यों रुंध रहा है?...
प्रीतम के पहलू में गिरें जाके ये मन्नत मंग दिए
हम चल दिए, तेरी तरफ़, तेरी सड़क, हम चल दिए......
मन छूटा वृन्दावन में तन लेकर कौन सी राह चलें अब.....?
जब से दिल, जां, दुनिया के सितम
हम सहना सीख गए..
सब हंसी मिटी बातें भी गयीं
चुप रहना सीख गए..
मौजों से कहो उड़ जाएं कि
अब गुम रहना सीख गए..
सावन से कहो आँखों से बरस
हम बहना सीख गए......!!!!!!
शौहर ये ज़माने के या अपने बलम देखें..
हर ओर तमाशा है, देखें तो किधर देखें..???
तुम्हारे मौन को सुनकर ही हम बेहोश हैं ज़ालिम..
कसम से बोलते गर तुम फ़ना नामो-निशां होता....
ओ बीमारी
तू जब भी आना..मेरी माँ को साथ लाना.....
उम्र भर ढूँढा जो वो, इक हर्फ़-ए-वफ़ा न मिला..
मैं ख़ुद से जुदा हो जाऊँ ख़ुदा,
अब यही है मेरी आज़ादी......
अपना है ये ही काम बस, घर से निकल लिए
चौखट जो दीखी यार की, माथे को मल दिए....
ज़मीं में ठोकरें मारो वो फ़िर भी काम आएंगी,
परस्ती से बुतों की कुछ, न हासिल था न हासिल है....
मन फिर आज कह रहा राधे, वृन्दावन बुलवाले...
दुनियादारी बहुत हुई, निज चरणन बीच बिठाले..
किस मुंह से कह दें? 'गो' प्रिया 'गो' इश्क़ फ़रमाओ....
हमको जब राह-ए-इश्क़ में बस सिसकियाँ मिलीं..........
प्रेम-व्रेम के खर्रे लिख-लिख रद्दी खूब बढ़ाई,
पैर खोज रहे क़ब्र कि अब तुझेे याद वतन की आई...?
इतना सुनना था...कि
लब उसके रो बैठे, और वो आँखों से मुस्काई...
हाथ करम पे रखकर वो फ़िर ज़ोरों से चिल्लाई....
मिटी दलीलें, उड़ गए वाद..
__ इंक़लाब ज़िंदाबाद...इंक़लाब ज़िंदाबाद...इंक़लाब ज़िंदाबाद.....
जिस-जिस ने दुखाया दिल अपना, सब शाद रहें आबाद रहें......
जाय बसे वृन्दावन में ख़ुद
और हमें दिल्ली पहुंचाए
मौज करी यमुना तट पे
नित गोपियों के संग रास रचाये
राधा का नाम जपे दुनिया
ख़ुद रुक्मिणी के संग फेरे लगाये
जाओ लला बड़ी भूल भई
हम मूरख तुम्हें पहचान न पाये..
तुम मुझे सुनते रहे, सुनते रहे, और बस सुनते ही रहे...
और मैं कहते रहने की आदी हो गयी..
एक वक्त कोई मेरे कान के पास आकर कह गया...
संसार में स्त्रियों को बोलने नहीं सुनने की अनुमति है..
और इस परिधि को तोड़ने का दंड तुम्हारी ख़ुद चुनी हुई कठोरतम सज़ा होगी
मैं हंसी...कानों को झटका, फुसफुसाई... जब बोलने की अनुमति होगी तो हम सुनेंगे...सज़ा लॉक कर दी जाये..
और अपनी ही आँखों की चमक में डूब गयी..
मैंने स्त्री होने की यह पहली और अंतिम परम्परा तोड़ डाली..
मेरी आवाज़ तुम्हारे कानों तक तो पहुंचती थी..
पर ह्रदय तक?
अक्सर कहती थी...ख़ुदा जाने...
आज भी ख़ुदा ही जानता है....
मेरे कान खुले हुए हैं...
मेरी आवाज़ दफ़्न है..
तुम्हारे कान बेशकीमती आवाजों से भरे हैं...
हां....अब मैं सुन पा रही हूँ !!!!
जितना तू बेरहम है,
मेरे दम से फिर भी कम है....
मित्र !
तुम जो निकले हो सफ़र पे
तोे बिना कुछ बूझे चलो और चलते चलो,
हां,पर 
जहां दौड़ती भीड़ में,
हर चेहरा तुम्हारे जैसा लगे
और हर दिल किसी दूर के ग्रह से आया ठूँठ अजनबी
तो समझ जाना
तुम ' दिल्ली' में हो......
कहें हम क्या कि अब कुछ भी कहा जाता नहीं,
न हों बेचैन जब तक चैन अब आता नहीं....
खड़ी थीं मंजिलें झुककर मिरे इंतज़ार में,
उस वक्त हम मशग़ूल थे दीद-ए-यार में........
मुझे तू याद कर या भूल जा तेरी रज़ा,
कसम मुझको लगे जो मैं तुझे आवाज़ दूं..!
मुझे तू भी ढूंढेगा इस क़दर
कभी ज्यों गाँव को ढूंढेगा शहर....

Monday, September 28, 2015

जी करता है..
डायनामाइट की छड़ों में,
लपेटकर आरडीएक्स का बुरादा,
सरेआम रख दें,
माथे की उथली नसों पर ..

और फिर बेहद नजदीक से, खड़े होकर देखें,
तमाशा.. दिल की सबसे भीतरी सुरंग को भी,
फ्यूज कर देने वाली धमक में,
एक साथ ..उगते और बुझते सैकड़ों सूरजों का..

आह.. कि अल्लाताला के दिए हुए दोनों हाथों से समेटें,
परखच्चे...
माथे की फट चुकी नसों के,
कानों को एकमुश्त कर सुनें और सुनते रहें,
मौत की आस में विलाप करती चीखें..
फिर गाढ़ लें टिकौरी और देखते ही रहें
मांस के लोथड़ों से रिसता खून,
घंटों...एकटक..

फिर... फच्च की आवाज में फोड़ें फफोले,
चमड़ी पर उगे हुए..
और जोर से खींचे एक कश सुलगते जख्मों से उठती टीसों का..

हां.. कि आजिज आ चुके हैं..
भीतर रोज-रोज फटते ज्वालामुखी से..
बेचैनियों का लावा जमता है, पिघलता है
फटता है, फिर जमता है, और फिर फट पड़ता है..
पर कम्बख्त बाहर निकलता नहीं,
इस देह की तहों से ...

काश्.. कि अब बेचैनियों के ज्वालामुखी के मुहाने पर डाल दी जाए मु_ीभर बारूद..
और हाथ बांधकर देखा जाए नजारा आखिरी विस्फोट का ..

आमीन..आमीन..


(मु_ीभर वीभत्स रस..और सांस भर बेचैनियां... )





अल्लाहताला, मुठ्ठीभर
२०१४
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तुम बिल्कुल भी नहीं जानते,
लेकिन मैं भलीभांति जानती हूं,
तुम इतने ही निष्ठुर हो,
जितने कि मेेरे लाखों आंसुओं को ठोकर मारकर, मुझे छोड़कर कहीं दूर चले गए मेरे बूढ़े दादाजी,
पर तुम इतने प्यारे भी हो,
जितने कि मेरी बहिन के दोनों मासूूम बच्चे, जिन्हें मैं ह्रदय का टुकड़ा कहा करती हूं..
तुम नहीं जानते,
इसलिए सुनो
मुझे तुमसे इतनी ही नफरत है जितनी किसी सह्रदय, पशुप्रेमी शाकाहारी को प्लेट में रखे गोश्त से हो सकती है..
ओह्ह कि मैं तुमसे प्रेम भी कर बैठी, जानना चाहते हो कितना..
बस उतना ही ..जितना कि मादा क्रौंच का पक्षी करता है नर क्रौंच से...
एक बात बताएं..
मेरे हाथों में सिर्फ मेरी लकीरें दर्ज हैं और हवा भरी है..
मैं बहुत सिमटी सी प्राणी हूं,
इसलिए इन्हीं लकीरों को पैमाना बनाकर अपनी भावनाओं को नापती रहती हूं...
और बेवजह हवा से तोलती रहती हूं माथे में वजन पैदा करती स्मृतियों को..
और एक तुम .. जो मदमस्त हाथी की चाल से मेरी जिंदगी के उन सर्द और गर्म दिनों में आकर बैठ गए..
जब कि मैं एकांत ढूंढ़ रही थी.. 
तुमने मेरी रातों को भी नहीं बख्शा,
कि मेरी आंखों में हसरतों के ख्वाब बोए..
अंकुरों को फूटने की आस जगाई..
हां जानती हूं वो तुम ही थे, जिसने जिंदगी की धरती को आकाश से मिलाए रखने के लिए हल चलाने का जज्बा पैदा किया..  
और तभी लहलहाती फसलों को देखकर जब मेरा मन चहक उठा, तो रात पड़ी बर्फ ने









महफिल-ए-मदहोशियों में, रोशनी फिर लुट रही
एक जलती लौ कहीं फिर लडख़ड़ाकर बुझ रही

रो रहा आंगन
दीवारें चीखती हैं रात दिन,
घर का सीना फट रहा, छत बूंद-बूंद रिस रही...

मां के हाथों की बनी
रोटी पड़ी बिखरी कहीं
आग गायब हो गई
चूल्हे में लकड़ी गल रही

खो गए रंगीन सपने
गुम हुई नादानियां
और परियों की कहानी, कील-कील चुभ रही

वो हंसी, वो खिलखिलाहट
हूक-हूक रो रही
और सन्नाटों की आहट जिस्म-ओ जां में बस रही

ये झनकती पायलें
बिंदी, खनकती चूडिय़ां
दूर फैंक भी दो कि ये नाग बनकर डस रही

हूं कहां मैं और 
ये दुनिया कहां है ओ खुदा
क्या ये मुझसे हो रहा है, जाने क्या मैं कर रही


..................


बाबुषा....

दिन आज सुहाना है प्यारे
आओ एक गीत सुनाते हैं, 
जब हम नादान भटकते थे,
कहीं नाम सुन लिया बाबुषा..

वो तस्वीरों में दिखी हमें,
सुलझे बालों में उलझी सी
आंखें टिमटिमटिम चमक रही
बच्चे सी ठुकमती बाबुषा

अब शैतानों की नानी थे
सो हम इक रात जगे जीभर
फिर वॉल पे जाकर ढूंढ लिया
आधी पढ़ डाली बाबुषा

उस रात उछलकर नाच उठे
और गीत गा लिया बाबुषा
जब आंख खुली, सब भूल गए
बस याद रह गया बाबुषा

फिर दीवानों सा हाल हुआ
हर जगह दिखे बस बाबुषा
रच दिया नया एक जीवन तब
और नाम रख दिया बाबुषा

वो नीले अंबर की चिडिय़ा
या थी परियों में सोन परी
वो फसल चुकंदर की थी या
बह रही नर्मदा बाबुषा

हम रोज शरारत करते थे
जीभर के नाच नचाते थे
दुनिया उससे थी सकुचाती
हम खूब छेड़ते बाबुषा

हम उद्दंडी बालक थे अब
ये जान चुकी थी बाबुषा
फिर बाढ़ प्रेम की आई और
इक रोज मिल गई बाबुषा

अब धरती, नभ, सूरज, चंदा
रोटी और साग भी बाबुषा
सांसों में हवा, रोगों की दवा
मम्मू में बदल गई बाबुषा

वो छांव कभी छाता बनती
खुलती ओ सिकुड़ती बाबुषा
दुनिया को सुख भर-भर देती
खुद दूर हो गई बाबुशा

एक दिन ऐसा आया यारो
हमने भी दुखाया दिल उसका
उसे खूब कही खोटी-खोरी
सुनकर के रोई बाबुषा

वो दिन काला, मनहूस भी था
जो रूठ गई थी बाबुषा
पर देख दुखी, ममता उमड़ी
मुझे ह्रदय में ले गई बाबुषा

जब इश्क कभी होगा मुझको
जग प्रेम-पे्रम चिल्लाएगा
मैं दोनों हाथ उठाकर के
बस शब्द कहूंगी बाबुषा

सुन लो ओ मेरे प्रिय-जनों

प्रिया नाराज कभी हो तो
तुम गोद में सर रखकर उसका
बस प्यार से कहना बाबुषा

माथे पर मेरे ज्वार चढ़े
और दुआ-दवा भी चुक जाएं
मेरे कान में आकर कह देना
दो बार बाबुषा, बाबूषा..

जब मृत्यु सिरहाने आकर
मुझे लेकर उडऩे को आए
मेरे मन को धीर बंधाना तब
मुझे राग सुनाना बाबुषा

मृत्यु है ईश्वर की करुणा
जिंदगी है उसका प्रेम प्रिए
ये शब्द भी रस ले ले कर के
दोहराती है अक्सर बाबुषा

तो सुनो कि जब मैं दुनिया से
ईश्वर की करुणा पा जाऊ
तुम राम का नाम नहीं भजना
बस जोर से कहना बाबुषा


बब्बूगोशा......

मुझे पूरा एक चाहिए... मुझे पूरा एक बाबू चाहिए... मां मुझे पूरा दो ना.. अगली बार बाबू आए तो सबको बांट देना.. मुझे बिल्कुल मत देना..
अभी मुझे एक चाहिए..
और यह कहते-कहते वह रोने लगी। उसकी आंखों से आंसू एक के बाद एक उसके गालों पर लुढ़कते रहे.. पर रोने की आवाज गायब थी.. मुंह से बस एक ही बात बार-बार निकल रही थी. मुझे पूरा एक बाबू चाहिए...
.मां जोर से चिल्लाई .... पिंकी... चुप हो वरना एक थप्पड़ मारूंगी...मां जानती थी... वो बाबू किसको बोल रही थी... यह बब्बूगोशा थे.. जो पिताजी आज पहली बार लेकर आए थे.... उससे पहले पिंकी ने बब्बूगोशा नहीं देखे थे..
मां बोलती रही.. नहीं तू अकेली नहीं है.. घर में सब बच्चे हैं.. और मैं सबका हिस्सा तुझे कैसे दे दूं.. जितनी बड़ी हो रही है उतनी ही जिद्दी होती जा रही है.. मां बड़बड़ाती रही.....और सबको आधा-आधा बब्बूगोशा बांटकर, दो बब्बूगोशा उठाकर रसोई की तिखाल में रखकर चुपचाप गायवाले घर में बंधी गाय को खोलने के लिए निकल गई। मां गाय रखती थी.. ताकि बच्चों को दूध मिलता रहे.. इसलिए हर दोपहर गायों को खेल देती थी.. गायें दिनभर घूमती और शाम को फिर लौट आती....
मां उधर को निकली और पिंकी ने कमरे की ओर दौड़ लगा दी। वह बैड पर औंधे मुंह लेट गई। और खूब रोई.. आज उसके भी सिर पर जिद चढ़ चुकी थी। अब तो वह और जिद्दी हो गई.. उसने मन ही मन सोचा.. अब लेगी तो पूरा बब्बूगोशा.. इतनी सी देर में


गुरुमंतर ..

तब गुरुजी ने गुरुमंतर दिया था,
और मैं उम्र की कच्ची पगडंडी पर एक पैर से खड़े हो,
शरीर को साधने की कला जान रही थी
उस वक्त मेरे बाल खुले थे..
मां चिल्लाती,
मुझे जबरन पकड़कर लाती,
और बालों में आधी कटोरी तेल उड़ेलकर
बालों को कसकर बांध देती, फिर धीरे-धीेरे कहती..
गुरुमंत्र ले लिया भजन भी नहीं करती..
तब मैं जोर से हंसा करती...
और कहती, एक दिन बाल खुलेंगे, तो तुम्हारे ईश्वर को लटों से बांध लूंगी,
और फिर देखती रहना, कभी बाल न बांधूंगी..

अब बाल जो खुले रह जाते हैं अक्सर ...



प्रेम
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कुछ लोगों का प्रेम हवा सा होता है
अदृश्य और रंगहीन,
जो सांसों के सहारे, खून में घुलता है,
शरीर में घूमता है, और रोमछिद्रों से होता हुआ बाहर निकलकर फिर हवा में घुल जाता है...
कुछ का निरा पहाड़..
सामने खड़ा हुआ, आसमान की आपदाओं से बचाता, अपनी गोद में पनाह देता..
आंधियों से टकराता,
लेकिन सांस भरने के लिए आती मधुर हवा को रोकता,
अविचल खड़ा हुआ ..
कुछ का प्रेम बहती हुई नदी सा होता है...
आओ किनारे बैठो..प्यास लगे तो अंजुली भरो.. पीओ..और अपनी राह पकड़ो... उतरे तो डूब जाओगे...
एक प्रेम धरती सा भी होता है..
जिसे जीवन भर रोंदते हैं हमारे कदम
जिसमें उगती हैं हमारी उम्मीदें..
और फिर..
इसकी परतों में मिल जाना होता है हमारा शरीर
लेकिन हम जीने से लेकर मरने तक भूलते रहते हैं इसकी उपस्थिति और इसका प्रेम...
आसमान, सूरज चांद, और तारे... भी प्रेम करते हैं..
जिन्हें आता है.. बस फैल जाना, उगना, और प्रेम में चमकना..
इन्हें अक्सर  देवता कह दिया जाता है..
कुछ लोगों का प्रेम बरसात की बूंदें हैं...
इसे मौसमी प्रेम भी कहते हैं..
एक नियत समय .. तब घनघोर बरसेगा.. पर शर्त है फिर साल भर तरसाएगा..
और हां दुनिया की कुदूरतें भी डालती हैं इसपे असर..
और एक आखिरी प्रेम होता है मां-पिता का..
अब बढ़ रही है मेरी बेचैनी..
बस बह रही हैं भावनाएं
क्योंकि..
इसके लिए
आज भी मैं ढूंढ रही हूं कुछ शब्द..


. राम का नाम भजे हनुमंता
श्याम का नाम भजो भई संता

. राधा कुंड मनोरम धाम
श्याम कुंड पर कर विश्राम

. आओ चलो चलें गोवरधन
 पहुंच करें गिरिराज के दर्शन

. कृष्ण भजो संग राधा नाम
पूरी आस करेंगे श्याम

. बृज रज बृज का है वरदान
मस्तक धर सिंदूरी जान

. गिरि की देख छटा घनघोर
घिरि घिरि रंग बरसे चहुंओर

. परिकम्मा है अति सुखकारी
यहां विराजैं राधे प्यारी

. आओ गांव पूंछरी आओ
श्याम सखा को शीश नवाओ

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ये है गांव पूंछरी भाई
जाकी सुनी है जगत बड़ाई
राम भक्त हनुमंत कहाई
श्याम भक्त हैं लौठा भाई
कि जाईकै मिलि लेओ, लेयो बलइयां, सखा की कृष्ण मुरारी की
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आओ  जतीपुरा पे आओ
देख मुखार-बिंद सुख पाओ
रबड़ी रसगुल्ला मेवन को
छप्पन व्यंजन भोग लगाओ
कि तृप्ति होगी तेरी, होगी कृपा जब जगत दुलारे की
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चलो चलें अब कुसुम सरोवर
जाकी झांकी बड़ी मनोहर
देख देख जब मन हरषेगा
बैठ भजेंगे गिरधर गिरधर
कि राधे नाम के संग में जै बोलेंगे बंसी बारे की
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परिकम्मा में सुनो रे भाई
राधे श्याम कुंड पे जाई
जो जो बहिनें दीप जलाई
सबकी होगी गोद भराई
कि आंगन में गूंजेगी किलकारी नटखट मतवारे की
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मन के कष्ट निकल भागेंगे
सोए भाग तेरे जागेंगे
बृज रज उड़ मस्तक बैठेगी
देव भी तेरा यश गावेंगे
कि तुझ को मिल जाएगी चाभी तब फिर प्रभु के द्वारे की
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परिकम्मा तुम कर लियो पूरी
कभी न छोड़ो आधी-अधूरी
क्षमा करो पापों को प्रभुवर
फिर तुम लो प्रभु से मंजूरी
कि तेरे फंद कटेंगे मिलेगी ज्योति कांवर कारे की
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Friday, January 16, 2015






गीत
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खंड-खंड नदियां हैं..
चूर-चूर पहाड़,
हवा के बदन पे ठोक दी गई हैं कीलें हजार..
आसमान गिर रहा है,
सिर पे चटख-चटख कर....
धंस रही है धरती,
पाताल में सिमटकर.....
ओह्ह पेड़ रो रहे हैं
खुद से लिपट-लिपटकर,
उल्का बनी हैं बूंदें,
गिरती पिघल-पिघल कर....
वो आग को तो देखो..
जाने कहां से आई..?
फिर-फिर के उड़ रही है
माथे पे बाज बनकर.....
ये रात है या मजमा,
चीखों का लग रहा है
चिंघाडऩे लगी हैं,
कब्रें उघड़-उघड़ कर.....
रो रहा है सूरज,
क्यों फिर उदय हुआ हूं,
क्यूं भस्म में न होता,
या क्यों न बुझ गया मैं.....

किसने सितम किया है,
किसने इसे है ढोया..
..... ओह्ह फिर कोई फकीरा,
लगता है दिल से रोया..








Friday, January 2, 2015

जब कोई ह्रदय वृंदावन हो जाए...................

फिर आइये, चाहे जाइये
या घर बना बस जाइये....

चाहे ब्रज की ठंडी रेत में
मदमस्त लोट लगाइए,
या ठोकरें देकर जमीं को
धूल-धूल उड़ाइए..

चाहे रख जटा घनघोर
भीषण तप या धूनि रमाइए
चाहे हाथ ले संतूर
दर-दर कृष्ण-राधे गाइए..

चाहे बैठ मीठे कंठ से
फिर प्रेम राग सुनाइए
या लेके तबला द्रुत गति में
तीन ताल बजाइए

चाहे मानकर उपवन मनोरम
फूल-शाक उगाइए
या जानकर शमशान नित
लाशें यहां दफनाइए

चाहे जग भलाई के लिए
कूए-बावड़ी खुदवाइए
चाहे खोद-खोद जमीन, पीपल
नीम, वट लगवाइए

चाहे आए दीवाली तो जगमग
घी के दीप जलाइए
या फाग गा होली पै
भर-भर रंग-गुलाल उड़ाइए......

कि कोई असर नहीं
..............जब कोई ह्रदय वृंदावन हो जाए.......










कविता.. ख्वाब
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ओ प्रिय
तुम मुझे जान से ज्यादा प्रिय हो,
फिर भी तुम मेरी जिंदगी तो नहीं हो सकते..
हां तुम मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत ख्वाब हो..
वही ख्वाब जिसमें डूबकर मैं हो जाती हूं
जिंदगी से मुक्त, 
वहीं ख्वाब जिससे उबरकर जब जिंदगी में वापस लौटती हूं,
तो भी होश होता है बेखबर और
मेरी आंखों के सामने नाचती रहती है तुम्हारी तस्वीर,
तुम्हारी बातें, तुम्हारी मुस्कुराहट, तुम्हारा गुस्सा और एक बिना गुदा हुआ नाम
जो हवाओं में बहता है और आंखों के आगे फैल जाता है,
जैसे पुतलियों पर मढ़ दी गई हो कोई फिल्म,
ओह्ह कि तुम एक बेशर्म ख्वाब हो
जो बार-बार आता है मुझे
तुम स्वार्थी और दबंग भी हो
जो किसी और ख्वाब को मेरी आंखों में टिकने नहीं देता,
ओ ख्वाब क्या तुम जानते हो?
हम बड़ी अजीब कश्मकश में जी रहे हैं,
हर रात के ढ़लने से पहले सो जाने की कोशिश करते हैं,
ताकि रातभर देखते रहें ये हसीन ख्वाब,
ओह्ह कि हम पलकों के दरवाजों को चौपट खोलकर रखने को भी हैं मजबूर,
क्योंकि डरते हैं,
आज अगर न आया वो ख्वाब तो...??


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प्रिया गौतम







देहदान
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ओ प्रिय
आज आखिरकार कर दिया मैंने अपनी देह का दान,
ले जाओ और ले जाकर रख दो इसे पांच फुट दो इंच लंबे, किसी गहरे ताबूत में,
जहां इसे दोबारा खोल सको..
सुनो...
इस साल जून की किसी दोपहर में,
खींच ले जाना मेरे शरीर से हरी-हरी नसें,
और दो पाटियों पे नसों को लपेटकर, बुनवा लेना अपने लिए एक हरियल पलंग..
जिसकी मुलायम बुनावट पर तुम सो सको, जब दुनिया के कामों से थककर चूर हो सबसे ज्यादा..
ओ प्रिय
आंगन में पड़ी उस बोतल को उठा लाना, और मुंह तक भर ले जाना मेरा लहू..
कि कपड़े का फोहा बोतल के ढक्कन में लगाकर, धीमे से करना प्रज्जवलित..
मेरा लहू तुम्हें देगा रातभर रोशनी..
जानते हो ?
मेरी आंखें बोलती हैं.. ऐसा लोग कहा करते थे..
गौर से सुनो..
ये आंखें निकालना
और तुम दे देना उन मासूम बच्चों को, जो स्कूल की प्रतियोगिता में तस्वीर बनाने के लिए मांगेंगे तुमसे रंग और सामान खरीदने के लिए पैसे..
उनकी बनाई हुई तस्वीर में जब चिपकी होंगी ये दो आँखें,  तो जीवंत हो उठेगी मेरे ह्रदय के टुकड़ों की तस्वीर ..
ओ प्रिय
फिर मेरा दिल निकालना..
और बाकी बची मेरी हड्डियों और सूख चुकी खाल को इकठ्ठा कर लगा देना आग..
ये जलती रहेंगी और फिर खुद-ब-खुद बुझकर बन जाएंगी राख..
हां कि मेरा दिल तुम्हारे पास है..
जो किसी मर्ज की दवा नहीं.. इसलिए इसे कांच के मुंहबंद मर्तबान में बंद कर
रख देना अपने ड्राइंगरूम के शो केस में ..
इसकी बेचैनियां इसमें पैदा करती रहेंगी झनझनाहट और ये हिलता-डुलता खिलौना...
........... आजीवन करता रहेगा तुम्हारा मनोरंजन.......
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प्रिया गौतम











तुम इश्क कहोगे, हम राख कहेंगे
तुम हुस्न कहोगे हम खाक कहेंगे।।

तुम राम हो उपवन हो फूलों से सजे झूमो
मैं कृष्ण घना जंगल यही बात कहेंगे ।।

तुम मधुर-मधुर, हम क्षार क्षार
तुम सुर्ख मिलन, हम इंतजार
तुम लौ अखंड, हम अंधकार
तुम आनंदवन, हम उजड़े थार
तुम तीर-ए-नजर, हम आर पार
तुम चैन-ओ-सुकूं, हम बेकरार
तुम अभयदान, हम तड़ीपार ।।

तुम रंग हंसों, फूल खिलो
जींस्त जियो जान-ए-जहां
हम डूब के सहरा में
इंकलाब करेंगे।।

गीत

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महफिल-ए-मदहोशियों में, रोशनी फिर लुट रही
एक जलती लौ कहीं फिर लडख़ड़ाकर बुझ रही

रो रहा आंगन
दीवारें चीखती हैं रात दिन,
घर का सीना फट रहा, छत बूंद-बूंद रिस रही...

मां के हाथों की बनी
रोटी पड़ी बिखरी कहीं
आग गायब हो गई
चूल्हे में लकड़ी गल रही

खो गए रंगीन सपने
गुम हुई नादानियां
और परियों की कहानी, कील-कील चुभ रही

वो हंसी, वो खिलखिलाहट
हूक-हूक रो रही
और सन्नाटों की आहट जिस्म-ओ जां में बस रही

ये झनकती पायलें
बिंदी, खनकती चूडिय़ां
दूर फैंक भी दो कि ये नाग बनकर डस रही

हूं कहां मैं और 
ये दुनिया कहां है ओ खुदा
क्या ये मुझसे हो रहा है, जाने क्या मैं कर रही


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