Wednesday, April 9, 2014

ओह ..तुमने बदल लिया है शहर ? ,....

उठती है एक हूक सी यूं ही कभी कभी अपने आप .....
मेरी भटकी सी आँखें ढूंढती हैं तुम्हे अपने आस पास 
उतर आता है अचानक ही एक खारा सा समंदर
बरसता है..
भिगाता है..
गलाता है.....और डूबा लेता है मुझे
कोई तो बता दे कहाँ हैं..??
नरम हाथों की वो गर्म हथेलियां..
अपने हाथों में भर लूँ और कसकर पकड़ लूँ उन्हें
एक बार तो आये वो आवाज़ मेरे कानों में ...
बदहवाश हो दौड़ के जाऊं.. और लिपट जाऊं मैं
ओह.. ओह अब नहीं आती तुम्हारी आवाज़ मेरे कानों...
में न देखती हैं वो दो बूढ़ी आँखे मुझे.!
अब नही लेते हो तुम नाम मेरा..!
न पूछते हो किसी से मेरे आने की खबर!
मेरे चुप रहने भर से कराह उठते थे तुम ...आज नही हो रहा मेरी सिसकियों का असर !!
ओह,…!!!!
खुदा ही जानता है 
मैं किसी दश्त में आ गयी या तुमने ही बदल लिया है शहर ......

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