Wednesday, July 25, 2018


बेटा अब दिल में लिंचिंग करवाएंगे
देखो तुमको कितना हम कुटवाएंगे;

तुम जो अपने को समझे हो शाहजहाॅं,
नूरजहां कह कर मुजरा करवाएंगे;

और कन्‍हैया कहकर जो इतराते हो
रास तुम्‍हींं से चौड़े में रचवाएंगे.

बहुत मौज में तुम हो कुछ दिन ले लो फिर
तुमको प्‍यारे मौज हमींं दिलवाएंगे.

तुम रो ओगे, तड़पोगे, चिल्‍लाओगे,
हम चौकी पर बैठ मलीदा खाएंगे.

नाम डुबोया है तुमने जो यारी का
बेट्टा तुमको यारी हम सिखलाएंगे.

आज चढ़ा लो मस्‍ती की बोतल, कल को
तुमको बेट्टा याद हमींं-हम आएंगे.

100 गाली तो रोज़ हमींं दे लेते हैं,
और बची जो गूगल से दिलवाएंगे.

चलो दुश्‍मनी तगड़ी कर लेते हैं अब
वरना यारी में तो मारे जाएंगे.









Tuesday, July 24, 2018

उन्‍हें कुछ वक्‍़त देना था किसी को,
हुआ फिर यूं कि हमसे लीव ले ली.

Monday, July 23, 2018

टूट जाना नींद का फिर याद आ जाना किसी का !
अजी!आँखें नहीं उनकी, समन्दर हैं,
हम इक मछली हज़ारों और के जैसे!
याद में लैला की पढ़कर शे'र, फिर
'क़ैस' सा'हिब तान चद्दर सो गए.
आ'धी दुनिया इस डर में ही उलझी है,
उसको-उससे प्यार कहीं हो जाए ना!
जिसे मैं देखती हूं वो किसी को देखता होगा,
जिसे वो देखता होगा वही शायद ख़ुदा होगा!

Thursday, July 19, 2018

उस चारागर को बुला दो जो,
मेरे 'जी' को हल्का कर सके!
ज़िन्दगी लम्बी नहीं है!
लौट के आ जाओ सब.
पीर नई है,
घाव पुराने दूख रहे हैं,
मन पे पड़े थे
वो छाले अब फूट रहे हैं !
ईश्वर को गाली देना सबसे सरल कृत्य है, ये हम तब करते हैं जब हम और कुछ नहीं करते!
मुझे छुट्टी मिले तो वृन्दावन चली जाऊँ मैं.
कहीं यूँ सोचते-सोचते ही न मर जाऊँ मैं.
जिनको न हंसने की हंसाने की समझ,
वो भाड़ में जाएं कसम से भाड़ में जाएं.
जो दिल के, दर्द को रोएँ,
वो सर का, दर्द क्या जानें.
किसी के दिल में होता हो, हमारे सर में उठता है.
वही जिस को ज़माने भर के शायर 'दर्द' कहते हैं.
आँखें तेरी कह रही हैं,
रात गुज़री किस तरह.
ढूंढत-ढूंढत श्याम को मोरे दूखन लागे नैन...
वृन्दावन पहुँचाय दो मोहे तब ही आवे चैन.....
बु'राई में कहाँ था दम हमें बर्बाद करने का,
ज़माना नेकनीयत था हमारे क़त्ल होने तक.
दुनिया के ही तो हो तुम,
तुम सी ही होगी दुनिया.
सबका मन तो लगता है इस दुनिया में!
इक मेरा ही क्यों नहीं लगता?
ग़रीबों को मौत से ज्‍यादा 'अमीरी' ने मारा है.
मिरे मरने पे वो रोये, हंसे या गालियां ही दे,
मैं ये बस चाहता हूँ कोई उसको इत्तला दे दे.
तुम्हें याद आ'ती होगी दोस्तों की,
हमें दुश्मनों की ने बेकल किया है.
मैं ढूंढ रहा हूँ उसको जो बस मिला ही था पर मिला नहीं.
चलो फिर आ गया कर्ज
अरे हां-हां वही सर-दर्द.
चाहने से हम कहां खुश हो सके?
दिल दुखाने की व्‍यवस्‍था कीजिए.

इस जहॉं में आग देनी है हमें,
हुक्‍मरां पेट्राेल सस्‍ता कीजिए.

ज़‍िंदगी बिकती नहीं है आजकल
आइए लाशों पे चर्चा कीजिए.

आदमी में खो गई इंसानियत,
ख़ाक़ इनको तुम फरिश्‍ता कीजिए.

हम तो अपना सब लुटा बैठे 'प्रिया'
तुम भी साहब कुछ तो खर्चा की कीजिए.
इक तुम ही नहीं ग़मदीद 'प्रिया'
बहुतों पे बहुत कुछ बीती है...
शायरों से दोस्‍ती फिर सब्र से,
ज़‍िंदग़ी को झंड होते देखिए.
हम जो ईमानदार हुए,
ज़माना बेईमान हुआ.
मैं प्यास में था और वो देते गए दाना,
हाँ! मर गया अब लाश को ढोया करे कोई.
फिर उसी क़ाफ़‍िर का मुझको इंतिज़ार,
फिर उसी से हिज्र की है आरज़ू...
हमें मौज में कुछ कमी तो नहीं, पर,
जलाने का तुमको अलग ही मज़ा है.
किसलिए करते हो यारों रंज-ओ-ग़म?
ज़िन्दगी कुल चार दिन की ही तो है!
मुझे ये इल्म था तुम भूल जाओगे,
यही अफ़सोस है बस इस तरह भूले!
चलो फिर मर गयी गुफ़्तुगू,
चलो! फिर फातिहा पढ़ें!
हमने कहा-हमें प्रेम है.
उसने कहा-जी शुक्रिया!
भाई-चारा इस तरह पैदा हुआ संसार में,
चार का दिल तोड़ने वालों ने जोड़े चार के!
सब-कुछ चला जाता है!
याद भी चली ही जाएगी.
ज़िन्दगी किसी के नाम कीजिए,
फिर लीजिए मज़ा बे-पनाही का!
सब भूल गए हमें!
अब हम किसे भूलें?
हलक से खींचना इक नाम को,
उसे फिर फेंकने का स्वांग दिनभर!
भला क्‍यों सुने वो तुम्‍हारी चीख?
तुम ही मरी थीं तो मर जाओ न!
हम जो नहीं थे उन जैसों में,
आख़ि‍र उनमें ही शुमार हुए!
कोई रहता था क्‍या मिरे भीतर?
क्‍यों अब खाली सा हो गया हूं?
बुरे लोग शरीर नोचते हैं
और शरीफ़ लोग आत्मा!
इश्क़ क्या है?
शिकस्ते फ़ाश है!
प्‍यार क्‍या है?
दो दिनों की वर्कशॉप!
इक तुमको न आती है न आए,
सैकड़ों हैं हमें याद करने वाले.
रंग खिलते हैं सभी उसपे मगर,
जान लेता है वो पीला कुरता.

आज पहनूँगी मैं पीली साड़ी,
उसने पहना है जो पीला कुरता.

हाये ये क़त्ल समां, कौन सा रंग पहना प्रिया?
उस ने कहा- मैंने हरा, जान ने पीला कुरता!

रंग जहाँ से उड़ गए सारे
बचा रह गया पीला कुरता.

चलो कहानी खत्‍म हुई अब,
खत्‍म हो गया पीला कुरता.

वो भी पागल है लेकिन बस मेरे पागल हो जाने तक.
जन्नत की चाह ले गयी मेरा सुकूँ-ए-दिल,
जां-ओ-जमीन लुट गयी दोज़ख़ में जा गिरे!
घुटा जा रहा हूँ मैं भीतर ही भीतर,
बता चीख लूँ क्या? तिरा नाम लेकर.
हमारा यही आज-कल है तराना,
तुम्हें याद करना तुम्हें भूल जाना.
याद में तेरी पागल हूं, दिल सोच के पर ये ठहरा है
कि पांव में मेरे घुंघरू हैं और हर रस्‍ते पर पहरा है.