किसको कोसूं और किस-किससे कहूं.....
जब रोज फूट जाता है मेरी कल्पनाओं का गुबार।।
Monday, December 31, 2012
Thursday, December 13, 2012
Tuesday, August 28, 2012
क्यों एक शेर हो जाए....
सीधे-सपाट और लोचरहित आंकड़ों और विश्लेषणों में अपनी जिंदगी गुजार देने वाले अपने प्रख्यात अर्थशास्त्री माननीय प्रधानमंत्री जी के मुख से गफलत भरे दौर में अचानक से शेर सुनकर आंखें डबडबा कर स्क्रीन पर गढ़ गईं,मुंह में जीभ अंदर ही अंदर शेर को दोहराने लगी,कान ठहर गए दोबारा सुनने को,और दिल से बार बार
शुक्रिया निकला उन चिरंजीवी लेखक के लिए भी जिनकी कलम से ये दो पंक्तियों का शेर निकला कि. हजारों जवाबों से अच्छी है खामोशी मेरी न जाने कितने सवालों की आबरू रखे
वो पहले शेर थे जो महफिलें बनाते थे, माहौल का मिजाज बदलते थे और गर्मी के मौसम में फुहारों का मजा देते थे। आज शेर संकटमोचन हैं जान बचाते हैँ आबरू बचाते हैँ। शेर शेर होता है इसके असर के आगे सब फीका है। भाईसाहब मैं तो कहती हूं कि शेर का असर लिखने वाले से नहीं बल्कि बोलने वाले से पूछिए।
दिल में थोड़ी सी भी लोच हो तो शेर बोलिए। आप कहीं फंस गए हों तो एक शेर बोलकर निकल सकते हैं। शब्द कम पड़ गए हों, तथ्य गायब हों या आंकडे़ साथ न दे रहे हों तो दिल के जज्बातों को उकेरने का सबसे सशक्त माध्यम शेरो-शायरी है। कम से कम दो बार लगातार इतने बड़े पद पर रहे माननीय मनमोहन जी से इतना तो हम सीख ही सकते हैं।
सीधे-सपाट और लोचरहित आंकड़ों और विश्लेषणों में अपनी जिंदगी गुजार देने वाले अपने प्रख्यात अर्थशास्त्री माननीय प्रधानमंत्री जी के मुख से गफलत भरे दौर में अचानक से शेर सुनकर आंखें डबडबा कर स्क्रीन पर गढ़ गईं,मुंह में जीभ अंदर ही अंदर शेर को दोहराने लगी,कान ठहर गए दोबारा सुनने को,और दिल से बार बार
शुक्रिया निकला उन चिरंजीवी लेखक के लिए भी जिनकी कलम से ये दो पंक्तियों का शेर निकला कि. हजारों जवाबों से अच्छी है खामोशी मेरी न जाने कितने सवालों की आबरू रखे
वो पहले शेर थे जो महफिलें बनाते थे, माहौल का मिजाज बदलते थे और गर्मी के मौसम में फुहारों का मजा देते थे। आज शेर संकटमोचन हैं जान बचाते हैँ आबरू बचाते हैँ। शेर शेर होता है इसके असर के आगे सब फीका है। भाईसाहब मैं तो कहती हूं कि शेर का असर लिखने वाले से नहीं बल्कि बोलने वाले से पूछिए।
दिल में थोड़ी सी भी लोच हो तो शेर बोलिए। आप कहीं फंस गए हों तो एक शेर बोलकर निकल सकते हैं। शब्द कम पड़ गए हों, तथ्य गायब हों या आंकडे़ साथ न दे रहे हों तो दिल के जज्बातों को उकेरने का सबसे सशक्त माध्यम शेरो-शायरी है। कम से कम दो बार लगातार इतने बड़े पद पर रहे माननीय मनमोहन जी से इतना तो हम सीख ही सकते हैं।
Wednesday, August 22, 2012
अब तो बस यही ख्याल आता है........
मरकर स्वर्ग जाने का ख्वाब छोड़ दिया मैंने
जब से देखी हैं वादियां जम्मू की।।
चलिए आज बैक गियर डालते हैं और चलते हैं फ्लैश बैक में ................
कुछ दिन पहले ही मैं आठ दिनों की लम्बी यात्रा से लौटी हूं। इसे अगर मैं असंभावित यात्रा कहूं तो कोई दो राय नहीं है क्योंकि मुझे पता ही नहीं था कि मैं जाउंगी। जाने से आठ दिन पहले कंफर्म हुआ कि मेरी टिकट बन गई है ,और अब सवाल था छुट्टी का ,मिलेगी भी या नहीं खैर सवालों के दरमियां दो दिन पहले बॉस से भी हरी झंडी मिल गई लेकिन यह क्या न कोई खरीददारी और न ही कोई प्लान..बस जाना था।
मन चहक रहा था, ख्वाबों ने अब डेरा डालना शुरू कर दिया था ,और न जाने वैष्णो देवी की कितनी काल्पनिक तश्वीरे मैंने अपनी डैस्क पर बैठकर कीबोर्ड पर उंगलियां चलाते हुए ही खींच डाली। जाने से दो दिन पहले मन ने काम करना बंद कर दिया और बड़ी ही खूबसूरत रंगीन दुनिया की रचना कर डाली। सृजन के मामले में इतनी बड़ी उपलब्धि शायद पहले कभी न पायी थी मैंने..
रात को 9 बजे बस में मैं अकेली लड़की और बाकी मुश्किल से चार-पांच और लोगों के साथ दिल्ली से घर पहुंची लेकिन यह तो वो कातिल समय था जब बस घर पहुचने की खुमारी थी और ऐसे वक्त में उमंगों में डूबा हुआ डर भी मेरे साथ बैठकर आने वाले दिनों के लिए चुनचुनकर हसीन ख्याल बुन रहा था। क्या वक्त था वो........
घर पहुंची तो सब खुश और व्यस्त थे ,ऐसा शोर सुनकर एकबारगी लगा जैसे दिन हो रहा हो, और फिर 20 लोगों को काफिला जो घर से निकला तो घर में सन्नाटा पसर गया पर दिल झूम रहा था ,पूरा परिवार एक साथ और इतने लंबे टूर पर और इतने दिनों के लिए ,...मेरे नोएडा जाने के बाद पहली बार....और इसीलिए मेरे शब्द गायब थे और मैं भौचक्की सी हर पल को कैद करने में लगी थी आगे उन्हें दोबारा देखने के लिए , फिर एकबार पीछे मुड़कर घर की खामोशी को गौर से देखा तो लगा जैसे वह सवाल कर रहा हो कि वापस कब आओगे।
स्टेशन पर पहुंच कर बरबस ही एक पंक्ति याद आ गई जो कुछ दिन पहले ही किसी ने मुझसे कही थीं..जो मजा सफर में है वो मंजिल में कहां .....इसीलिए अब स्टेशन पर इंतजार करना भी खूबसूरत था, और बेहाल करती गर्मी भी ठंड का एहसास करा रही थी। अब सफर था ,मैं थी और मेरा परिवार ...
ट्रेन मथुरा से जम्मू तवी के लिए थी , वाकई ट्रेन का सफर सुहाना होता है, और वहो जाकर एक सच्चाई का और पता चलता है कि लोग परिस्थितियों से कैसे और कितनी जल्दी समझौता कर लेते हैं । 400 मीटर जगह के तिमंजिला मकान को भी छोटा मानने वाले कैसे एक बर्थ पर सिमट जाते हैं । एक कम्पार्टमेंट एक मोहल्ला बन जाता है और मीलों की दूरी पर बसे लोग एक ही झटके में पड़ौसी। चलती हॉर्न बजाती ट्रेन जैसे सचेत करती जाती है और लगता है कि सारा संसार बस यहीं बसता है.....और यही कारण है कि मुझे रेलगाड़ी का सफर हमेशा पसंद आता है।
खैर पंजाब के खेतों में उगते सोने को देखते-देखते हम जम्मू तवी स्टेशन पहुंचे तो लगा कि यह तो बड़ी बेकार जगह है, जल्दी परिणाम पाने की आदी हमारी कल्पनाएं कुसकुसाने लगीं। पर ईश्वर का नजराना तो अब आनेवाला था....जम्मू से कटरा का रास्ता बल्कि कहें कि मनोहर वादियों के मुकुट पर्वतों को काटकर बनाया गया स्वर्ग को जाने वाला प्रवेश द्वार था वह। टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलते हुए आंखें एकटक थी और मुंह से निकलने वाले शब्द थे बस वाह...वाह...वाह....
वास्तव में वहां बस एक ही चीज आपको हर जगह ,हर मोड़ पर मिलेगी और वह है खूबसूरती...
उसके बाद शुरू हुई हमारी वैष्णो देवी की चढ़ाई ...जय माता दी के जयकारों के साथ ,जोश से लबरेज ,बस धुन सवार और एक मिशन जो पॉसिबल होने वाला था। 14 किमी चढ़ना था और बस यहीं जरूरत होती है बहुत सारे अपने लोगों की , और हमारा कुनबा तो बीस लोगों का था, बस बातें, शोर, हंसना,खाना, और चलते जाना ....फुल मस्ती, फुल मनोरंजन ,रूठना-मटकना,मनाना ,किसी का खो जाना ,फिर मिल जाना और तो और रास्ते में भी शैतानियां और ऊधम..अहा..सब स्वतंत्र थे जिसके जो मन में था वो वही कर रहा था।
रास्ते भर जिस एक चीज की मुझे कमी लगी जो वृंदावन में देखने और सुनने की आदी हूं मैं वो यह थी कि हर जगह दुकानें थीं लेकिन मां के भजन या गीत जैसा कुछ भी नहीं चल रहा था जो कि उमंग का स्त्रोत बनकर चढ़ाई में हमारा साथ देता खैर रात थी तो साफ दिखाई नहीं दे रहा था पर आसमान और पहाड़ और घाटियां दिख रहीं थीं। ऊपर पहुंचकर देखा बहुत भींड़ थी और बताया गया कि यह 12 महीने 24 दिन का हाल है और नवरात्रों में तो अति ही हो जाती है लेकिन यहां आ वही पाते हैं जिनपर मां की कृपा हो वरना लोगों की जिंदगी गुजर जाती है।
चाक-चौबंद व्यवस्था के साथ एक छोटी सी गुफा में विराजमान तीन पिंडियों के दर्शन किए, जिनमें महासरस्वती, महाकाली और महालक्ष्मी की पिंडियां हैं। बहुत जल्दबाजी में वहां दर्शन कराए जाते हैं इसलिए ध्यान देना बहुत जरूरी हो जाता है।
ऊपर का मौसम ठंडा ही होता है इसलिए वहां शॉल-स्वैटर की जरूरत महसूस होती है। फिर उससे भी ऊपर भैरव नाथ के दर्शन किए क्योंकि उनके बिना दर्शन अधूरे माने जाते हैं और फिर शुरु हुआ लौटने का सिलसिला।
ऐसा लग रहा था जैसे कितने दिनों की कठिन मेहनत ने चूर कर दिया है पर लौटते वक्त पैर अपने आप ही फिसल रहे थे बिल्कुल ढलान पर बिना ब्रेक की गाड़ी की तरह, अब ना देवी मां याद आ रहीं थीं और ना ही मुह से जय माता दी निकल रहा था ,बस लग रहा था कैसे भी जल्दी से रूम पर पहुंचें और पहुंचने के बाद किसी को होश नहीं आया अगली सुबह तक.....
मरकर स्वर्ग जाने का ख्वाब छोड़ दिया मैंने
जब से देखी हैं वादियां जम्मू की।।
चलिए आज बैक गियर डालते हैं और चलते हैं फ्लैश बैक में ................
कुछ दिन पहले ही मैं आठ दिनों की लम्बी यात्रा से लौटी हूं। इसे अगर मैं असंभावित यात्रा कहूं तो कोई दो राय नहीं है क्योंकि मुझे पता ही नहीं था कि मैं जाउंगी। जाने से आठ दिन पहले कंफर्म हुआ कि मेरी टिकट बन गई है ,और अब सवाल था छुट्टी का ,मिलेगी भी या नहीं खैर सवालों के दरमियां दो दिन पहले बॉस से भी हरी झंडी मिल गई लेकिन यह क्या न कोई खरीददारी और न ही कोई प्लान..बस जाना था।
मन चहक रहा था, ख्वाबों ने अब डेरा डालना शुरू कर दिया था ,और न जाने वैष्णो देवी की कितनी काल्पनिक तश्वीरे मैंने अपनी डैस्क पर बैठकर कीबोर्ड पर उंगलियां चलाते हुए ही खींच डाली। जाने से दो दिन पहले मन ने काम करना बंद कर दिया और बड़ी ही खूबसूरत रंगीन दुनिया की रचना कर डाली। सृजन के मामले में इतनी बड़ी उपलब्धि शायद पहले कभी न पायी थी मैंने..
रात को 9 बजे बस में मैं अकेली लड़की और बाकी मुश्किल से चार-पांच और लोगों के साथ दिल्ली से घर पहुंची लेकिन यह तो वो कातिल समय था जब बस घर पहुचने की खुमारी थी और ऐसे वक्त में उमंगों में डूबा हुआ डर भी मेरे साथ बैठकर आने वाले दिनों के लिए चुनचुनकर हसीन ख्याल बुन रहा था। क्या वक्त था वो........
घर पहुंची तो सब खुश और व्यस्त थे ,ऐसा शोर सुनकर एकबारगी लगा जैसे दिन हो रहा हो, और फिर 20 लोगों को काफिला जो घर से निकला तो घर में सन्नाटा पसर गया पर दिल झूम रहा था ,पूरा परिवार एक साथ और इतने लंबे टूर पर और इतने दिनों के लिए ,...मेरे नोएडा जाने के बाद पहली बार....और इसीलिए मेरे शब्द गायब थे और मैं भौचक्की सी हर पल को कैद करने में लगी थी आगे उन्हें दोबारा देखने के लिए , फिर एकबार पीछे मुड़कर घर की खामोशी को गौर से देखा तो लगा जैसे वह सवाल कर रहा हो कि वापस कब आओगे।
स्टेशन पर पहुंच कर बरबस ही एक पंक्ति याद आ गई जो कुछ दिन पहले ही किसी ने मुझसे कही थीं..जो मजा सफर में है वो मंजिल में कहां .....इसीलिए अब स्टेशन पर इंतजार करना भी खूबसूरत था, और बेहाल करती गर्मी भी ठंड का एहसास करा रही थी। अब सफर था ,मैं थी और मेरा परिवार ...
ट्रेन मथुरा से जम्मू तवी के लिए थी , वाकई ट्रेन का सफर सुहाना होता है, और वहो जाकर एक सच्चाई का और पता चलता है कि लोग परिस्थितियों से कैसे और कितनी जल्दी समझौता कर लेते हैं । 400 मीटर जगह के तिमंजिला मकान को भी छोटा मानने वाले कैसे एक बर्थ पर सिमट जाते हैं । एक कम्पार्टमेंट एक मोहल्ला बन जाता है और मीलों की दूरी पर बसे लोग एक ही झटके में पड़ौसी। चलती हॉर्न बजाती ट्रेन जैसे सचेत करती जाती है और लगता है कि सारा संसार बस यहीं बसता है.....और यही कारण है कि मुझे रेलगाड़ी का सफर हमेशा पसंद आता है।
खैर पंजाब के खेतों में उगते सोने को देखते-देखते हम जम्मू तवी स्टेशन पहुंचे तो लगा कि यह तो बड़ी बेकार जगह है, जल्दी परिणाम पाने की आदी हमारी कल्पनाएं कुसकुसाने लगीं। पर ईश्वर का नजराना तो अब आनेवाला था....जम्मू से कटरा का रास्ता बल्कि कहें कि मनोहर वादियों के मुकुट पर्वतों को काटकर बनाया गया स्वर्ग को जाने वाला प्रवेश द्वार था वह। टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलते हुए आंखें एकटक थी और मुंह से निकलने वाले शब्द थे बस वाह...वाह...वाह....
वास्तव में वहां बस एक ही चीज आपको हर जगह ,हर मोड़ पर मिलेगी और वह है खूबसूरती...
उसके बाद शुरू हुई हमारी वैष्णो देवी की चढ़ाई ...जय माता दी के जयकारों के साथ ,जोश से लबरेज ,बस धुन सवार और एक मिशन जो पॉसिबल होने वाला था। 14 किमी चढ़ना था और बस यहीं जरूरत होती है बहुत सारे अपने लोगों की , और हमारा कुनबा तो बीस लोगों का था, बस बातें, शोर, हंसना,खाना, और चलते जाना ....फुल मस्ती, फुल मनोरंजन ,रूठना-मटकना,मनाना ,किसी का खो जाना ,फिर मिल जाना और तो और रास्ते में भी शैतानियां और ऊधम..अहा..सब स्वतंत्र थे जिसके जो मन में था वो वही कर रहा था।
रास्ते भर जिस एक चीज की मुझे कमी लगी जो वृंदावन में देखने और सुनने की आदी हूं मैं वो यह थी कि हर जगह दुकानें थीं लेकिन मां के भजन या गीत जैसा कुछ भी नहीं चल रहा था जो कि उमंग का स्त्रोत बनकर चढ़ाई में हमारा साथ देता खैर रात थी तो साफ दिखाई नहीं दे रहा था पर आसमान और पहाड़ और घाटियां दिख रहीं थीं। ऊपर पहुंचकर देखा बहुत भींड़ थी और बताया गया कि यह 12 महीने 24 दिन का हाल है और नवरात्रों में तो अति ही हो जाती है लेकिन यहां आ वही पाते हैं जिनपर मां की कृपा हो वरना लोगों की जिंदगी गुजर जाती है।
चाक-चौबंद व्यवस्था के साथ एक छोटी सी गुफा में विराजमान तीन पिंडियों के दर्शन किए, जिनमें महासरस्वती, महाकाली और महालक्ष्मी की पिंडियां हैं। बहुत जल्दबाजी में वहां दर्शन कराए जाते हैं इसलिए ध्यान देना बहुत जरूरी हो जाता है।
ऊपर का मौसम ठंडा ही होता है इसलिए वहां शॉल-स्वैटर की जरूरत महसूस होती है। फिर उससे भी ऊपर भैरव नाथ के दर्शन किए क्योंकि उनके बिना दर्शन अधूरे माने जाते हैं और फिर शुरु हुआ लौटने का सिलसिला।
ऐसा लग रहा था जैसे कितने दिनों की कठिन मेहनत ने चूर कर दिया है पर लौटते वक्त पैर अपने आप ही फिसल रहे थे बिल्कुल ढलान पर बिना ब्रेक की गाड़ी की तरह, अब ना देवी मां याद आ रहीं थीं और ना ही मुह से जय माता दी निकल रहा था ,बस लग रहा था कैसे भी जल्दी से रूम पर पहुंचें और पहुंचने के बाद किसी को होश नहीं आया अगली सुबह तक.....
Thursday, August 16, 2012
उम्र से पहले हुनरमंद होते हाथ या डूबता बचपन.......
चेहरे पे शिकन, सीने में चुभन, आंखों में पीलापन छाया
झर गए लफ्ज होटों से और आंखों से सपनों का साया।
तपती दुपहरी की चमकती धूप में पीठ पर बस्ता लादे, एक हाथ में बोतल लिए वैन से उतरते चहचहाते बच्चों को देखकर ,मन में एक ख्याल उतर आता है, क्या खूब दिन थे वो.....फिर बरबस याद आता है ,ये दौलत भी ले लो ,ये शोहरत भी ले लो ...मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन ....आपने इस गीत के शब्दों पर गौर किया हो तो पाएंगे कि सब कुछ हसीन है समृद्द है, आज बेशुमार दौलत है,पर उससे भी हसीन और खुशनुमा था इनका बचपन जिसको फिर से पाने की तमन्ना है, किसी भी भाव-बोध, टेंशन और जिम्मेदारी से परे, आह..सिर्फ बचपन........
सुखद था और सुखद ही स्मृतियां हैं , विकल्प उपलब्ध थे तो हर बार सुनने को मिलता था कि छूना मत हाथ गंदे हो जाएंगे, हाथों को सहेजकर रखा गया इसलिए आज भी चमक है और नर्म हैं, आज भी डरते हैं चीजों को छूने से ,बोझ क्या उठाएंगे ? लेकिन कहीं- कभी अपने आसपास तो आपने भी देखी होगी कोई मुरझाई सूरत जिसकी पीली आंखों में लाल धारियां और डर के साथ-साथ बढ़ती सांस, पेड़ की छाल सी उखड़ती नसों वाले पत्थर से कड़े हाथ, चिथड़ों सी शर्ट के साथ उधड़ के लटकी हुई जेब वाला पेंट और बेतरतीब अदा में सिमटे हुए बाल और हमारी हर एक छोटी से छोटी कलात्मक चीज को घूरती उसकी नादान आंखें। यही है उसका बचपन जो उसे तरसाता है ,तड़पाता है हर एक उस चीज के लिए जिसपर सिर्फ कुछ नोटवालों का हक है। आंखें खोलते ही जिसे संसार और भूख का गठजोड़ समझा दिया गया और छोड़ दिया गया । इन दबी-कुचली आंखों में उजले सपने कैसे पनप सकते हैं जबकि उसने अपने मां-बाप को भी दिन की तपिश से ठिठुरती रातों तक बस बेहोशों की तरह जी तोड़ते हुए ही पाया है और इसलिए इन आंखों में तो कार में बैठने के बजाय कार के पंचर को ठीक करके मालिक की नजर से बचाकर दो रुपए ज्यादा पाने का ही सपना पल सकता है।
हुनर बढ़ रहा है, अनुभव भी बढ़ रहा है और काम में पैनापन आ रहा है ,कच्ची उम्र में भूख सहने की क्षमता भी बढ़ रही है, और चौथाई जनसंख्या के आराम और विलास की सुविधाएं पैदा की जा रही हैं और इसके बदले में क्या देना पड़ रहा है बस बचपन ही तो है...यह तो पिछले जन्मों का लेखा जोखा है... अक्सर अपने बचपन की स्मृतियों में खोए रहने वाले लोग भी जब यह कह जाते हैं तो विस्मय होता है....
अपने को सजा संवारकर बड़प्पन का लिबास पहने जब मैं या आप निकले हों तो ऐसा बचपन हमने भी देखा होगा और देखकर ,अफसोस जताकर छोड़ दिया होगा, या हो सकता है कि हम भी उसे दो रु. अतिरिक्त देने वालों में हों , और हमें इससे मानसिक शांति का विराट अनुभव भी हुआ हो।
ऐसा दुःखद बचपन जवानी में कौन याद करना चाहेगा....
खैर सवाल यही है कि आप और हम क्या बचाने में अपना योगदान दे सकते हैं..... ;ये हुनर या इन मासूमों का डूबता बचपन .....एक बार सोचिए जरूर.
चेहरे पे शिकन, सीने में चुभन, आंखों में पीलापन छाया
झर गए लफ्ज होटों से और आंखों से सपनों का साया।
तपती दुपहरी की चमकती धूप में पीठ पर बस्ता लादे, एक हाथ में बोतल लिए वैन से उतरते चहचहाते बच्चों को देखकर ,मन में एक ख्याल उतर आता है, क्या खूब दिन थे वो.....फिर बरबस याद आता है ,ये दौलत भी ले लो ,ये शोहरत भी ले लो ...मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन ....आपने इस गीत के शब्दों पर गौर किया हो तो पाएंगे कि सब कुछ हसीन है समृद्द है, आज बेशुमार दौलत है,पर उससे भी हसीन और खुशनुमा था इनका बचपन जिसको फिर से पाने की तमन्ना है, किसी भी भाव-बोध, टेंशन और जिम्मेदारी से परे, आह..सिर्फ बचपन........
सुखद था और सुखद ही स्मृतियां हैं , विकल्प उपलब्ध थे तो हर बार सुनने को मिलता था कि छूना मत हाथ गंदे हो जाएंगे, हाथों को सहेजकर रखा गया इसलिए आज भी चमक है और नर्म हैं, आज भी डरते हैं चीजों को छूने से ,बोझ क्या उठाएंगे ? लेकिन कहीं- कभी अपने आसपास तो आपने भी देखी होगी कोई मुरझाई सूरत जिसकी पीली आंखों में लाल धारियां और डर के साथ-साथ बढ़ती सांस, पेड़ की छाल सी उखड़ती नसों वाले पत्थर से कड़े हाथ, चिथड़ों सी शर्ट के साथ उधड़ के लटकी हुई जेब वाला पेंट और बेतरतीब अदा में सिमटे हुए बाल और हमारी हर एक छोटी से छोटी कलात्मक चीज को घूरती उसकी नादान आंखें। यही है उसका बचपन जो उसे तरसाता है ,तड़पाता है हर एक उस चीज के लिए जिसपर सिर्फ कुछ नोटवालों का हक है। आंखें खोलते ही जिसे संसार और भूख का गठजोड़ समझा दिया गया और छोड़ दिया गया । इन दबी-कुचली आंखों में उजले सपने कैसे पनप सकते हैं जबकि उसने अपने मां-बाप को भी दिन की तपिश से ठिठुरती रातों तक बस बेहोशों की तरह जी तोड़ते हुए ही पाया है और इसलिए इन आंखों में तो कार में बैठने के बजाय कार के पंचर को ठीक करके मालिक की नजर से बचाकर दो रुपए ज्यादा पाने का ही सपना पल सकता है।
हुनर बढ़ रहा है, अनुभव भी बढ़ रहा है और काम में पैनापन आ रहा है ,कच्ची उम्र में भूख सहने की क्षमता भी बढ़ रही है, और चौथाई जनसंख्या के आराम और विलास की सुविधाएं पैदा की जा रही हैं और इसके बदले में क्या देना पड़ रहा है बस बचपन ही तो है...यह तो पिछले जन्मों का लेखा जोखा है... अक्सर अपने बचपन की स्मृतियों में खोए रहने वाले लोग भी जब यह कह जाते हैं तो विस्मय होता है....
अपने को सजा संवारकर बड़प्पन का लिबास पहने जब मैं या आप निकले हों तो ऐसा बचपन हमने भी देखा होगा और देखकर ,अफसोस जताकर छोड़ दिया होगा, या हो सकता है कि हम भी उसे दो रु. अतिरिक्त देने वालों में हों , और हमें इससे मानसिक शांति का विराट अनुभव भी हुआ हो।
ऐसा दुःखद बचपन जवानी में कौन याद करना चाहेगा....
खैर सवाल यही है कि आप और हम क्या बचाने में अपना योगदान दे सकते हैं..... ;ये हुनर या इन मासूमों का डूबता बचपन .....एक बार सोचिए जरूर.
Monday, July 16, 2012
वो मां है मेरी
कोई हस्ती नहीं, ना चमत्कार है,
वो तो बस सीधी-साधी सी मां है मेरी।
काम करते हुए, मन में मेरे लिए,
हर बखत बुदबुदाए वो मां है मेरी।
बिछड़कर उससे रोऊं तो डांटे मुझे,
खुद तो दिल में ही रो ले वो मां है मेरी।
अपने सपनों को जी तो रही हूं मैं पर ,
याद रह-रह के आए वो मां है मेरी।
सांस खींचू या छोडूं हो आहट उसे,
मेरे हर दम में बसती वो मां है मेरी।
भूल के फिक्र बिल की वो घंटो मुझे
फोन पर जीना सिखलाती मां है मेरी।
गर खफा हो भी जाए वो मुझसे कभी
बस लिपटकर मना लूं वो मां है मेरी।
मुझको बनना नहीं कोई व्यक्ति महान,
मैं तो बन जाऊं बस जैसी मां है मेरी।
जन्नतों की जगह हर जनम में खुदा,
हाथ फैला के मांगू वो मां है मेरी।।
कोई हस्ती नहीं, ना चमत्कार है,
वो तो बस सीधी-साधी सी मां है मेरी।
काम करते हुए, मन में मेरे लिए,
हर बखत बुदबुदाए वो मां है मेरी।
बिछड़कर उससे रोऊं तो डांटे मुझे,
खुद तो दिल में ही रो ले वो मां है मेरी।
अपने सपनों को जी तो रही हूं मैं पर ,
याद रह-रह के आए वो मां है मेरी।
सांस खींचू या छोडूं हो आहट उसे,
मेरे हर दम में बसती वो मां है मेरी।
भूल के फिक्र बिल की वो घंटो मुझे
फोन पर जीना सिखलाती मां है मेरी।
गर खफा हो भी जाए वो मुझसे कभी
बस लिपटकर मना लूं वो मां है मेरी।
मुझको बनना नहीं कोई व्यक्ति महान,
मैं तो बन जाऊं बस जैसी मां है मेरी।
जन्नतों की जगह हर जनम में खुदा,
हाथ फैला के मांगू वो मां है मेरी।।
Friday, July 13, 2012
यकीं कर के देख.............
कारनामों पे अपने यकीं करके देख
खुद की हस्ती बनाने का दौर आया है।
बुझ गईं जो जली थीं मशालें कभी
उनमें लपटें उठाने का दौर आया है।
छोड़ दो दूसरों के बने रास्ते
खुद को अब आजमाने का दौर आया है।
पूछते हो किसे, देखते हो कहां
खुद की दुनिया बसाने का दौर आया है।
अपनी चाहत और हिम्मत को तुम बांध लो
शीघ्र मंजिल पे चलने का दौर आया है।
हो चुकी इंतेहा, यूं न बैठे रहो
दौड़ में अपने छाने का दौर आया है।
भूल जाओ जो मोती न तुमको मिला
छूट में हीरा पाने का दौर आया है।
छोड़ कर आगे बढ़ बीते किस्से प्रिया
अब तो उत्सव मनाने का दौर आया है।।
कारनामों पे अपने यकीं करके देख
खुद की हस्ती बनाने का दौर आया है।
बुझ गईं जो जली थीं मशालें कभी
उनमें लपटें उठाने का दौर आया है।
छोड़ दो दूसरों के बने रास्ते
खुद को अब आजमाने का दौर आया है।
पूछते हो किसे, देखते हो कहां
खुद की दुनिया बसाने का दौर आया है।
अपनी चाहत और हिम्मत को तुम बांध लो
शीघ्र मंजिल पे चलने का दौर आया है।
हो चुकी इंतेहा, यूं न बैठे रहो
दौड़ में अपने छाने का दौर आया है।
भूल जाओ जो मोती न तुमको मिला
छूट में हीरा पाने का दौर आया है।
छोड़ कर आगे बढ़ बीते किस्से प्रिया
अब तो उत्सव मनाने का दौर आया है।।
बहुत सुखद है.............
यूं तरसते लोगों की उम्मीदों को धता बताना,
एक झलक दिखलाकर, फिर तुम्हारा कहीं छुप जाना।
हाय,गलत घोषणाऔं पर मौसम विभाग की किरकिरी कराना,
फिर मायूस चैहरों पर तरस खाकर, इसका झमाझम बरस जाना।
रात की इस यकायक में चमचमाती कारों का यूं जाम में फंस जाना,
पैदल शहंशाहों का मुस्कुराकर चिढ़ाते हुए कारों के बीच से निकल जाना।
मेह में लिपटी कीचड़ में यूं अचानक पैर का धंस जाना,
ओह -सिट... कहकर मोहतरमाओं का फिर जोर से चिल्लाना।
कुछ खिदमतगारों का रूमानी फिजा में घर में चाय और पकोड़े उड़ाना,
तो कुछ का उजड़ते घर को समेटने में ही सावन का बीत जाना।
बखूबी जानती हूं मैं कि अलग-अलग होता है सबकी जिंदगी का फसाना,
पर एक बार महसूस तो करो बहुत-बहुत सुखद है हर बार सावन का आना।
यूं तरसते लोगों की उम्मीदों को धता बताना,
एक झलक दिखलाकर, फिर तुम्हारा कहीं छुप जाना।
हाय,गलत घोषणाऔं पर मौसम विभाग की किरकिरी कराना,
फिर मायूस चैहरों पर तरस खाकर, इसका झमाझम बरस जाना।
रात की इस यकायक में चमचमाती कारों का यूं जाम में फंस जाना,
पैदल शहंशाहों का मुस्कुराकर चिढ़ाते हुए कारों के बीच से निकल जाना।
मेह में लिपटी कीचड़ में यूं अचानक पैर का धंस जाना,
ओह -सिट... कहकर मोहतरमाओं का फिर जोर से चिल्लाना।
कुछ खिदमतगारों का रूमानी फिजा में घर में चाय और पकोड़े उड़ाना,
तो कुछ का उजड़ते घर को समेटने में ही सावन का बीत जाना।
बखूबी जानती हूं मैं कि अलग-अलग होता है सबकी जिंदगी का फसाना,
पर एक बार महसूस तो करो बहुत-बहुत सुखद है हर बार सावन का आना।
Wednesday, July 11, 2012
असंख्य बेटों की बीमार माँ का हाल
जमाने ने करवट ली, नया दौर, नई तारीख, नया दिन,नयी सोच और उसके साथ रिश्तों के नए-नए रूप, लेकिन नहीं बदली तो एक चाह ,एक उम्मीद कि कम से कम एक बेटा तो हो। यहां मेरा आशय बेटे और बेटी के मुद्दे से अलग उस मां को लेकर है जिसके इस दुनिया में असंख्य बेटे हैं। वही बेटे जो बड़े गर्व से इस बात की पुष्टि करने के लिए एक ही पल सैकड़ों सबूत हमारे मुंह पर मार देते हैं। ये सपूत सैकड़ों वर्षों से सिर्फ अपनी मां पर निछावर हैं, उसकी सेवा करते हैं, उसे बचाने के लिए तन-मन और धन से तत्पर रहते हैं। ये अपना मन मां को दे चुके हैं, तन से मेहनत करके उसके लिए सुविधाएं इकट्ठी कर रहे हैं और धन तो मां के चरणों में ही है। ये जागरुक होने का दावा करते हैं, और अपने प्राणों की आहूति देने के लिए सदैव खड़े रहते हैं, लेकिन मां की दुर्दशा बुढापे में हुई बीमारी की तरह उसे जकड़ती ही जा रही है। ये बेटे नहीं जानते कि चूक आखिर कहां हुई ? अवस्था आखिर विकृत से विकट विकृत क्यों हुई? ये घोषणा करते हैं कि इन्होंने अपने-अपने स्तर से सारी सेवाएं और इलाज किए। तुलनात्मक रूप से इन्होंने देश के साथ साथ विदेशों से भी सुविधाओं का जुगाड़ किया, यहां तक कि अनशन से लेकर भूख हड़ताल और धरना तक किया। क्या-क्या नहीं किया और आज भी क्या-क्या नहीं कर रहे और स्वस्थ होने की उम्मीद से इतर आगे भी करेंगे।
इन्होंने आपस में ही बांट ली सेवाएं, कभी हाथ के घाव से बहते पस को गौरव सेना साफ कर जाती है तो फूटी आंख से निकलते आंसुओं को यमुना रक्षा समिति, कभी पोपले मुंह में बृज मजदूर कल्याण समिति निवाला डाल जाती है तो यमुना एक्शन प्लान वाले दो बूंद पानी, लेकिन खबरें छपती हैं, सुर्खियां बनती हैं और बेटे अपनी सराहना पर जश्न मनाते हैं, और सेवा भी करते हैं लेकिन इस मानसिकता के साथ कि मां के दूसरे बेटे से ज्यादा सेवा का श्रेय मुझे मिले।
भाइयो ; ये दुर्भाग्यशाली मां यमुना है जिसके बेटे एक छोटा सा सच नहीं जानते कि अगर वे सभी एक साथ मिलकर एक दिन मां के सारे घाव भर दें तो टुकड़ों में बंटी मां अपने स्वरूप को वापस पा लेगी।
जमाने ने करवट ली, नया दौर, नई तारीख, नया दिन,नयी सोच और उसके साथ रिश्तों के नए-नए रूप, लेकिन नहीं बदली तो एक चाह ,एक उम्मीद कि कम से कम एक बेटा तो हो। यहां मेरा आशय बेटे और बेटी के मुद्दे से अलग उस मां को लेकर है जिसके इस दुनिया में असंख्य बेटे हैं। वही बेटे जो बड़े गर्व से इस बात की पुष्टि करने के लिए एक ही पल सैकड़ों सबूत हमारे मुंह पर मार देते हैं। ये सपूत सैकड़ों वर्षों से सिर्फ अपनी मां पर निछावर हैं, उसकी सेवा करते हैं, उसे बचाने के लिए तन-मन और धन से तत्पर रहते हैं। ये अपना मन मां को दे चुके हैं, तन से मेहनत करके उसके लिए सुविधाएं इकट्ठी कर रहे हैं और धन तो मां के चरणों में ही है। ये जागरुक होने का दावा करते हैं, और अपने प्राणों की आहूति देने के लिए सदैव खड़े रहते हैं, लेकिन मां की दुर्दशा बुढापे में हुई बीमारी की तरह उसे जकड़ती ही जा रही है। ये बेटे नहीं जानते कि चूक आखिर कहां हुई ? अवस्था आखिर विकृत से विकट विकृत क्यों हुई? ये घोषणा करते हैं कि इन्होंने अपने-अपने स्तर से सारी सेवाएं और इलाज किए। तुलनात्मक रूप से इन्होंने देश के साथ साथ विदेशों से भी सुविधाओं का जुगाड़ किया, यहां तक कि अनशन से लेकर भूख हड़ताल और धरना तक किया। क्या-क्या नहीं किया और आज भी क्या-क्या नहीं कर रहे और स्वस्थ होने की उम्मीद से इतर आगे भी करेंगे।
इन्होंने आपस में ही बांट ली सेवाएं, कभी हाथ के घाव से बहते पस को गौरव सेना साफ कर जाती है तो फूटी आंख से निकलते आंसुओं को यमुना रक्षा समिति, कभी पोपले मुंह में बृज मजदूर कल्याण समिति निवाला डाल जाती है तो यमुना एक्शन प्लान वाले दो बूंद पानी, लेकिन खबरें छपती हैं, सुर्खियां बनती हैं और बेटे अपनी सराहना पर जश्न मनाते हैं, और सेवा भी करते हैं लेकिन इस मानसिकता के साथ कि मां के दूसरे बेटे से ज्यादा सेवा का श्रेय मुझे मिले।
भाइयो ; ये दुर्भाग्यशाली मां यमुना है जिसके बेटे एक छोटा सा सच नहीं जानते कि अगर वे सभी एक साथ मिलकर एक दिन मां के सारे घाव भर दें तो टुकड़ों में बंटी मां अपने स्वरूप को वापस पा लेगी।
Saturday, February 11, 2012
मैने लोगों को अक्सर कहते सुना है की दुनिया मतलबी हो गई है , लोग सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं, अपने लिए ही जीते हैं और मरते हैं। उन्हें न दूसरों के जीने की फिक्र है न मरने की । परहित की बातें इस दुनिया से गायब हो गई हैं। लोग स्वार्थी हो गए हैं ,देश दुनिया से कट गए हैं ,स्वयमचिन्तक हो गए हैं ।लेकिन यह निहायत ही कोरा आरोप है क्योंकि जब तक मुझ जैसे आपकी बल्कि आप सब की ही दुनिया को टटोलने वाले लोग इस वसुंधरा पर मौजूद हैं ऐसा कदापि नही हो सकता । मेरा मानना है की अपनी जिन्दगी में मत झांको ,सिर्फ दूसरों की पर द्रष्टि जमाओ, और दूसरों को अपनी में कूद- फांद करने दो , फिर देखो पर्यटन के साथ -साथ सोहार्द्र भी बढ़ेगा। मेरा तो एक ही ध्येय वाक्य है , अरे अपने सुना ही होगा ,
वृक्ष कबहू नहीं फल भखे ,नदी न संचे नीर n
परमारथ के करने साधनु धरा शरीर ।।
बस एक कोशिश है रंग तो लाएगी ही क्योंकि आप भी तो मेरी इस बात को सिद्ध करने में मेरे साथ है कि अभी गुंजायश है,हम नालायक हो सकते हैं पर स्वार्थी ,कभी नही । आप भी शुक्र मनाइए -
चाहे गुलाब में कांटे ही सही
गनीमत है साथ तो हैं ।।
शुभ - शुभ सोचिए -मेरे साथ मुस्कुराइए ,हंसिए, खिलखिलाइए,दिमाग लगाइए और
अपनी दुनिया में मुझे सेंधमारी करने से रोक सको तो रोकिए जनाब ।।
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