Wednesday, May 21, 2014

प्रेम कविता


ओय ..पागल...
पागल हो तुम निरी पागल....डूबी सी रहने वाली पागल..
देखो हम तुम्हें कहे देते हैं..
अपनी गर्लफ्रेंड वाली गाली हमें न दिया करो..
वरना..
हा हा हा..
वरना क्या ..हम्मम..!!
लो अब बार-बार कहेंगे पागल..पागल..तुम पागल हो..पर बिल्कुल मेरी तरह..
सही है...
कह लो बाबू पागल..
किसी दिन हो जाएंगे..तो मिलेंगे भी नहीं तुमसे,
कहीं किसी अंधेरी-कोठरी के किसी कोने में....
घुटनों में सिर दिए..! रो रहे होंगे....!!
तब हमारी सिसकियों की आवाज भी नहीं पहुंचेगी तुम तक..
पर तुम कराह उठोगे,
...........कहीं दूर देश में बैठे हुए...
हां प्रिय एक दिन ...उस दिन...!!!


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