Wednesday, April 30, 2014

" एक कान से सुन तुरंत दूसरे से विदा कर देते हैं बातें उनकी..
और लोग हमें निहायत भरोसेमंद समझते हैं".....।।।
"आरजू-ए-जिगर पूरी हो जाए...
ऐ खुदा मुझे क़ज़ा आए..क़ज़ा आए."......

Monday, April 28, 2014

कविता
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पिण्डदान

प्रेम के वो सफेद , खुशबूदार चावल
‌सिर्फ तुम्हारे लिए...
खुद ही बोए, सींचे, गुडे, काटे, साफ किए..
और इंतजार की भट्टी पै,
सूखी-सूखी स्मृतियों की मंदी आंच जला खुद ही पकाए थे..

सुगंध में डूबी रही मैं...
कुछ लड़खड़ाते आए तुम...
और फिर..
चावलों को देखकर नाक-मुं‌ह मारने वाले,
गेंहू से पेट भरकर लौटे,
ओ......बौने दिल के आदमकद इंसान,
जानते हो...??
तुमसे उपेक्षित ये चावल पड़े थे दिलनुमा पतीले में पिछले कई दिनों से..,,,,,
देख रहे थे इंतजार पल-पल खुद के उपयोग का....
पर
अब..
देखो और सुनो..
हर क्षण के श्राद्ध से मुक्ति के लिए,,,
यादों के वस्‍त्र त्याग,
उफनती आंखों के किनारे बैठ...
झड़ते खारी जल के छींटे मार,
इन्हीं चावलों के पिण्ड बना,
कर दिया हमने तुम्हारे प्रेम का पिण्डदान आज .....
                     ....ओ...... प्रिय......हम मुक्त हुए.... ।।


Sunday, April 27, 2014

कविता
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"प्रयोग के आदी" हमने शौक-शौक में यूं तो की थीं हत्याएं बहुत...
आज मारने पर उतारू हो गए,
प्रेम नाम के पंछी को....
और इस तरह,
दबाते गए---दबाते गए---दबाते गए गला....
____ आज अंतिम सांसें गिन रहा है
उठा के आईसीयू में डालें ..
या दें एक और झटका,,,,,
और टूट जाए सांसों की लड़ी.......!!!
बहुत से बहुत एक हत्या का इल्जाम और सही........@!!!! ??
" एक कान से सुन तुरंत दूसरे से विदा कर देते हैं बातें उनकी..
और लोग हमें निहायत भरोसेमंद समझते हैं".....।।।

Friday, April 25, 2014

 गीत...
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जब जब चले पुरबाइयां
तेरी याद आईयां, 
दिल बिच हूूक उठ आईयां
तेरी याद आईयां.......

बिना तेरे खुशीनू ख्याल नहीं आॅन्दा
जलसे, समारोहान जीऊ नही लागदा
हंसी बिच असी रो जाईयां...।।
तेरी याद........।।

रजि रजि याद आयें तेरी सारी बातानू
दिल ‌बिच्चो जम गई साड्डी मुलाकातानू,
पकड़ी जो तूने थी कलाइयां......।।
तेरी याद......।।

देख तस्वीरां तेरी असी रोज सजदीं,
चूड़ियां कलाइयां तेरे नाम दी पहनदी,
हिना बिच्चो तू ही रच जाइयां.......।।
तेरी याद........।।

रस्ता उड़ीख आंखा दिन भर जलदी,
रात भर तैनूं याद करके बरसदी,
दुःख साड्डा किसनूं सुनाइयां....।।
तेरी याद........।।

Thursday, April 24, 2014

भजन
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राधा और श्याम रटै रसना..
निज दरशन करें दुलारी के..
नित आठ पहर की सेवा में 
हम चाकर राधा प्यारी के..।।

जग के महलों की चाह नहीं,
हम प्रीत की छांह में आय गए।
जनमों-जनमों की प्यास बुझी..,
जल मानसरोवर पाय गए..।
सुख, चैन, परम आनंद मिला जब से हम भए दुलारी के...।।
नित आठ पहर की................।।

हम चाकर बन के मस्त भए
बस राधे राधे गाय रहे,
दिन रैन, सुबह और शाम में प्रेम का
एक ही राग बजाए रहे...।
वो प्राणप्रिए हम सब की हैं हम हैं बरसाने बारी के....।।
नित आठ पहर की................।।

पलकों से साफ करें रस्ता
अंखियन के दीप जलावत हैं...
पुतली में बसाय मनोहर छवि
मृदु कंठ से गीत सुनावत हैं
हम हर पल बैठे मुसकावैं दरशन कर प्राणन प्यारी के...।।
नित आठ पहर की................।।


पलकों से साफ करें 

भजन..
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किन्ना सोणा लगदा है मेरा गिरधारी,
मैं तो हारी हारी हारी साड्डा दिल हारी..।।

सावंरा सलोना मेरा माही बड़ा जंचदा,
आंखा  कजरारी कारी मोर पंख सजदा
घुंघराली लट गल फूल माल रचदां,
ओठां बिच मुरली लागे बड़ी प्यारी......।।
मैं तो हारी......................।।।

रूप तेरा वेख राधे दुनिया भुलाएनी,
तेरे नाल बैठ मंद-मंद मुस्काएनी,
मोहना दी झांकी प्यारी मन में बसाएनी
तुआड्डी तीनां लोकन दे छवि न्यारी..।।
मैं तो हारी.......................।।

तैनूं वेख वेख मेरा मन हरषाइयां,
जित्‍थे जावा उत्‍थे तेरी मूरत ही पाइयां
तेरे बिना चैन एक पल नहीं आईयां
तेरी सूरतानि बारि जावां बनवारी..।।
मैं तो हारी......................।।


Friday, April 18, 2014

तुम खुद को खुदा मानकर बैठे रहो..
लो आज से हम नास्तिक हुए.........!!!!!!!!!!!

Wednesday, April 16, 2014

गीत....
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दिल नूं और न यूं तरसा रे
आके आखां बिच बस जा रे
अज्ज छाने दे इश्क दी बहार
दर्दे जी नूं मिल जाएगा करार
तू आजा इक बार जांणिए..
माहिए..रांझिए....
कि देदे मैंनूं प्यार सोणिए...
बलिए..हीरिए...

जब से ही देख्या तैनू मन में तू बस गई,
मुस्कुरा के सोणी कुड़ी कत्ल मेरा कर गई..
छांड़ के तो मत जा यार,
बातां प्यार भरी कर दो चार..।।
तू आजा.................।।।।।


सांची बोलता हूं, तेरे बिन जी न पाऊंगा,
तू जो मिल गई तैनें पलकां पै सजाऊंगा....
इस पगले दी तू ही सरकार
अब बन भी जा मेरी दिलदार......।।

तू आजा.........................।।।
कविता...
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आजकल रात में अक्सर..
भड़भडाकर खुल जाती हैं आंखें !!
टूट जाती है सपनों भरी नींद
गला सा रुंधता है, कुछ दम सा घुटता है..
होठ सूखते हैं,
फेंफडे सुबकते हैं,
हवा के एक अदद झोंके ‌की चाह में तड़पते हैं..
........बदन पै आने वाली इस आपदा ‌का ये आलम तब से है..!!!!!
जब से उग आया है...
एक "चार मंजिला मकान"
मेरे दुमंजिले पर बसे कमरे की "खिड़की" के उस ओर..
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Wednesday, April 9, 2014

गज़ल
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मैं वो दरिया हूं जल रहा हूं
तेरे कदमों के निशानों पै चल रहा हूं..।।

खो गई रूह, बदन लाश हुआ,
दौड़ रेतीली हवाओं से कर रहा हूं..।।

इश्क है आग, मेरा दिल पानी,
बुझ गया तू मैं मजारों सा जल रहा हूं..।।

नाखुदा भी तो डुबा देते हैं,
मैं ये तक्रीर खुदाओं से कर रहा हूं..।।

नासमझ तुझसे ‌गिला क्या होगा,
मैं तो आगाह जमाने को कर रहा हूं..।।

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कविता

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याद है एक बार तुमने कहा था..
तुम प्रेम में हो
गहरे प्रेम में..
सारी बंदिशें तोड़ दी थी मैंने..खोल दिए थे सारे दरवाजे मेरे दिल की सुरंगों में दबी हुई आरजू तक पहुंचने के..
उस वक्त सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए..
तुम आए बढ़े और मुझमें समा गए..
मेरे दिल में उतरते गए तुम और डूबती गई मैं..
तुममय होती गई...
तब बिजली कड़की, वज्रपात हुआ..एक आह निकली..
तुम भी थे गहरे प्रेम में किसी और की मूरत को सीने में छुपाए हुए..


 
गीत
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तू जो मेरा हुुआ तो सबेरा हुुआ
जिंदगी में कहीं
छंट गई रात काली, खिली धूप अब
जिंदगी में कहीं

तू जो मुझको मिला तो खुदा मिल गया
मेरी ख्वाहिश को अब रास्ता मिल गया
छू गई रोशनी, मिल गई हर खुशी जिंदगी में कहीं...।।

तेरी सांसों के साए में जीता रहूं
तेरी चाहत को आंखों से पीता रहूं
मैं रहूं साथ जब भी तू जाए कहीं...।।

तू जो मेरा हुआ...।।


गज़ल
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देखो धुंअा सा उठने लगा है
अरमां सा कोई बुझने लगा है..।।

फूंककर मेरी तमन्नाओं की भस्म
कोई मेेरे दामन पै मलने लगा है..।।

कल की अफवाह हकीकत हो गई
दरिया सा कोई जलने लगा है..।।

जानकर फूल छुपाया था जो सीने में
कांटा सा कोई चुभने लगा है..।।

गैर की आग में जलने वाला वो
चांद कहीं प्रिय छुपने लगा है..।।

देखो धुंआ सा......।।।
गज़ल
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मेरे इश्क की इतनी पैमाइश करता है क्यूं..
यादों में ढूंढता है
धड़कन से पूछता है
फिर भी इन लबों को खामोश रखता है क्यूं..????


मेरे दिल को जलाकर यूं अनजान न बना करो
मेरा प्यार तुम्हें मंजूर है कभी तो कहा करो..।।

तेरे इंतजार में मुरझा रहा है दिल मेरा
अपनी सांसों की महक इसमें कभी तो भरा करो..।।

मेरी खामोशी इजहारे मोहब्बत ही तो है
इसे पढ़ने की आजमाइश कभी तो किया करो..।।

सुना है जामों को भर देते हो आंखों ही से तुम
थोड़ा अहसान ओ प्रिय हम पे भी किया करो..।।

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गज़ल
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वक्त बेवक्त मुझे याद आया न करो
इस कदर मेरी जाना सताया न करो..।।

बन के मरहम छू लेते हो मुझे
मेरे जख्मों को यूं और दुखाया न करो..।।

दो घड़ी दिन में हंसा के मुझको
इस कदर रात भर रुलाया न करो...।।

तेज कदमों से चल पडूं जब मैं
यूं धीमे से मुझे बुलाया न करो..।।

है अगर दिल में तो कहते क्यों नहीं
प्यार को इस तरह छुपाया न करो...।।

ये मेरी जिंदगी है कोई गीत नहीं
गाके दुनिया को इसे सुनाया न करो..।।

गज़ल
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जो गुजरा हुआ जमाना है
एक बार वो फिर तो आ जाए.।।

वो प्यार की मीठी सी आहट
वो पहली नजर का पागलपन
वो तुझे देखने की चाहत
वो जुगनू सा दीवानापन..
एक बार...........................।।

वो ख्वाबों में तुझसे मिलकर
मेरी खामोशी का छंट जाना,
जैसे हो रात अमावस पर
छुपके चंदा का दिख जाना..
एक बार..........................।।

वो नजरों के टकराते ही
दिल की धड़कन का बढ़ जाना
वो आंखों ही आंखों में यूं
मुझसे तेरा सब कह जाना
एक बार..........................।।

वो दर्द था जालिम दवा भी था
वो इश्क सुकूं और वफा भी था
वो आशिक बड़ा मिजाजी था
शायद ये इश्क नबाबी था
एक बार.........................।।

गज़ल
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तुम दर्द हो या करार हो,
पर जो भी हो मेरा प्यार हो..।।

निगाहों से दिल में उतर जाते हो
दिल से सांसों में उमड़ आते हो
फिर आंखों से बरस जाते हो,
तुम इश्क हो या गुबार हो.....पर जो भी हो.....

जब भी देखती हूं मैं शीशे में अक्स अपना
एक चेहरा मेरे चेहरे में नजर आता है
जब भी गुजरता है ‌कोई हवा का झौंका
वो चेहरा मुझे छूकर गुजर जाता है...
मैं पलटती हूं..ढूंढती हूं...बार बार पूछ़ती हूं..
तुम जिंदगी या बस एक खुमार हो.......पर जो भी हो मेरा प्यार हो...।।।।
गज़ल..
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जब भी उठती है तलब दिल में मेरे
मुस्कुरा के नाम तेरा ले लेती हूं..।।

तुझसे छुपकर अक्सर अकेले में
मैं तुझे जान-ए-जिगर कह देती हूं..।।

जब भी पूछते हैं लोग मेरा हाल-ए-दिल
मैं तेरा नाम होठों में दबा लेती हूं..।।

देखे गर कोई तेरी मकां इन आंखों में
फौरन पलकों को गिरा लेती हूं..।।

यूं तो आदत है..मगर बढती है कभी बेचैनी
बीती यादों की दवा दे देती हूं..।।

एक दिन वो आएगा प्रिय बस जाएगा तुममें
अपनी सांसों को मैं यूं रोज दगा देती हूं..।।

अच्छे से जानती हूं तुझे ओ बेपरवाह, मौजों के सनम
पर मैं तुझे दिल से दुआ देती हूं..।।

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दुनिया भर में ..दिलों की चोरी की खबरों से हैरान हो !
हम अपने दिल को छुपा आए तहखाने में...
सबसे दूर,
एकांत के अंधेरे कोने में..
कुछ वक्त बाद, किसी प्रेम के महीने में
दिलों को खुले बाजार में बिकते और उड़ते देखा ..
तो अचानक
दिल की याद आई..
हम सीधे तहखाने पहुंचे..
खोला..
तो पाया
दिल को चूहे कुतर चुके थे..!
अब न दिल था..!!
न दिलबर !
न दिलनशीं !
और न चोरी का डर ..!!
बस थी तो कुछ बिखरी हुई कतरनें और उन कतरनों को घुटनों के बल बैठकर समेट‌ते हम...
ओ ! शमी के वृक्ष...
..आओ..
चलो एक खेल खेलते हैं..
फट पडो तुम..!
और खुद को फाड़ देती हूं मैं....
झौंक देती हूूं मैं खुद को तुम्हारी आग में --
और भस्म हो जाओ मेरी में तुम....!!!!
__
हो सकता है लोगों को किनारे पसंद हों..
मुझे तो नदी को समेटने की साजिश नजर आती है.....!!
सुन रही हो....?
दरिया चाहे प्रेम का ही हो, डूबने का खतरा वहां भी रहता है..
बहुत गहरे उतर रही हो तुम..!!
जी हां...सही पहचाने..
अगर हो कोई काबिल गोताखोर तो कह दो कूद जाए दरिया में..

और ढूंढ़ के निकाल ले मुझे..
पर कान खोलकर सुनो,,,,, 

तुम भी उसकी जान की परवाह करना और एक बात का ख्याल रखना,
उतरते-उतरते डूबने का हुनर हो चला है मुझे,
उसे भी तैराकी में महारथ हासिल हो..।। ।। ।।
आज जब उनसे मिले तो मालूम हुआ...@.
लोग ऐसे भी हैं जमाने में.....!!!...
देखो मेरी आंखों में
खारी लहरें उफन रही हैं..
व्याकुल हूं..
तड़प रही हूं..
बदहवाश हो दौड़ रही हूं...
सुनो मेरा क्रंदन, ये रुदन, ये विलाप..ये चीत्कार....
नहीं-नहीं मैं कोई प्रेमिका नहीं हूं...न ही पति के शव से लिपटी विधवा..
मैं तो बस तुम्हें ढूंढ रही हूं..फूट-फूटकर रो रही हूं.
बिलख रही हूं..
ऐसे...
" बिलखती है जैसे खोऐ हुए बच्चे की मां "......
इतने सालों बाद मिला !!
बताओ न तुम्हें कैसा लगा.???
बिल्कुल ऐसा...
जैसे जलती हुई आग पर किसी ने डाल दिया हो पानी ......
सच !!!!! 
हां.. 
मतलब जानते हो इसका साहिब.???
हां.
यही, कि मैंने बुझा दी वो याद और इंतजार की आग जिसमें जल रही थी तुम मेरे लिए... 
मिलके मुझसे हो गई हो तुम तापमुक्त.. 
हां...।। 
वैसे इसका एक और भी मतलब है महाशय..!
सुनना चाहते हो... 
सुनो.. 
तुमने डाल दिया पानी उस जलती हुई लौ पै !
जिसकी रोशनी में अक्सर तुमसे मिलने के ख्वाब बुना करती थी मैं.. 
तुम आज आए, 
मिले...
और ख्वाब हकीकत हो गया.. 
हां, लेकिन ख्वाब खत्म हो गया.. 
और साथ में मेरी ख्वाब बुनने की कला भी !!!
ओह ..तुमने बदल लिया है शहर ? ,....

उठती है एक हूक सी यूं ही कभी कभी अपने आप .....
मेरी भटकी सी आँखें ढूंढती हैं तुम्हे अपने आस पास 
उतर आता है अचानक ही एक खारा सा समंदर
बरसता है..
भिगाता है..
गलाता है.....और डूबा लेता है मुझे
कोई तो बता दे कहाँ हैं..??
नरम हाथों की वो गर्म हथेलियां..
अपने हाथों में भर लूँ और कसकर पकड़ लूँ उन्हें
एक बार तो आये वो आवाज़ मेरे कानों में ...
बदहवाश हो दौड़ के जाऊं.. और लिपट जाऊं मैं
ओह.. ओह अब नहीं आती तुम्हारी आवाज़ मेरे कानों...
में न देखती हैं वो दो बूढ़ी आँखे मुझे.!
अब नही लेते हो तुम नाम मेरा..!
न पूछते हो किसी से मेरे आने की खबर!
मेरे चुप रहने भर से कराह उठते थे तुम ...आज नही हो रहा मेरी सिसकियों का असर !!
ओह,…!!!!
खुदा ही जानता है 
मैं किसी दश्त में आ गयी या तुमने ही बदल लिया है शहर ......