कविता
-------------
पिण्डदान
प्रेम के वो सफेद , खुशबूदार चावल
सिर्फ तुम्हारे लिए...
खुद ही बोए, सींचे, गुडे, काटे, साफ किए..
और इंतजार की भट्टी पै,
सूखी-सूखी स्मृतियों की मंदी आंच जला खुद ही पकाए थे..
सुगंध में डूबी रही मैं...
कुछ लड़खड़ाते आए तुम...
और फिर..
चावलों को देखकर नाक-मुंह मारने वाले,
गेंहू से पेट भरकर लौटे,
ओ......बौने दिल के आदमकद इंसान,
जानते हो...??
तुमसे उपेक्षित ये चावल पड़े थे दिलनुमा पतीले में पिछले कई दिनों से..,,,,,
देख रहे थे इंतजार पल-पल खुद के उपयोग का....
पर
अब..
देखो और सुनो..
हर क्षण के श्राद्ध से मुक्ति के लिए,,,
यादों के वस्त्र त्याग,
उफनती आंखों के किनारे बैठ...
झड़ते खारी जल के छींटे मार,
इन्हीं चावलों के पिण्ड बना,
कर दिया हमने तुम्हारे प्रेम का पिण्डदान आज .....
....ओ...... प्रिय......हम मुक्त हुए.... ।।