Monday, June 16, 2014

गीत
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सावण घिर-घिर बरस दिया
बागां बिच हरियाली छाई
मन दा सहरां प्यासा रह ग्या
जिंदणी बिच्चो रुत्त नहीं आई....।।

हर ओर अब्र बरसा घिर-घिर
दरिया बिच्‍च जवानी सी छाई
हम नील समंदर पी बैठे
ओठां दी प्यास न बुझ पाई...।।

असी प्रेमी ते माशूक भए
ख्वाबां बिच्चो रवानी सी आई
जो था अपना सब बांट दिए
जग के बन बैठे करजाई....।।

साज्जन संग बैठी सजणी की
जब प्रेम चुनर उड़ उड़ जाई
असी वेख वेख आहां भरदे
इक टीस जिगर बिच्चो उठ जाई..।।

तेरे बिन जिंदणी नाकाम रही
बिन तेरे कज़ा भी नहीं आई
गर हो सकियां अहसान करो
मेरा कत्ल करो ए हरजाई...।।


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