पैग़ाम-ए-दिल तुझे अब किसके सहारे भेजूं,
मेरी ही दुश्मन हो गई, मेरे शहर की हवा.
Monday, June 25, 2018
चाहने से हम कहां खुश हो सके?
दिल दुखाने की व्यवस्था कीजिए.
इस जहॉं में आग देनी है हमें,
हुक्मरां पेट्राेल सस्ता कीजिए.
जि़न्दगी बिकती नहीं है आजकल
आइए लाशों पे चर्चा कीजिए.
आदमी में खो गई इंसानियत,
खा़क इनको तुम फरिश्ता कीजिए.
हम तो अपना सब लुटा बैठे 'प्रिया'
तुम भी साहब कुछ तो खर्चा की कीजिए.
दिल दुखाने की व्यवस्था कीजिए.
इस जहॉं में आग देनी है हमें,
हुक्मरां पेट्राेल सस्ता कीजिए.
जि़न्दगी बिकती नहीं है आजकल
आइए लाशों पे चर्चा कीजिए.
आदमी में खो गई इंसानियत,
खा़क इनको तुम फरिश्ता कीजिए.
हम तो अपना सब लुटा बैठे 'प्रिया'
तुम भी साहब कुछ तो खर्चा की कीजिए.
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