Monday, June 25, 2018

पैग़ाम-ए-दिल तुझे अब किसके सहारे भेजूं,
मेरी ही दुश्मन हो गई, मेरे शहर की हवा.
गिरते ज्यादा हैं, कम चलते हैं,
वो लोग बड़ी जल्दी सम्भलते हैं.
मेरे माथे में जो ठहरा है,
ये दर्द-दवा से गहरा है!
जिसको मिलूं वो मेरे घर कर देना इत्‍तला,
अब मैं कहां हूं, कौन हूं? मुझको नहीं खबर !
यूँ तो अब अक्सर ही बहुत हंसता हूँ मैं,
कुछ बात हैं पर जिनपे दिल टूटा करता है!
कैसे मैं चुन लूँ राह तेरी, कैसे मैं तेरे साथ चलूँ?
तेरी आरज़ू में ही पागल हुई हूँ,
जो मिल जाए तू तो ख़ुदा जाने क्या हो?
ये कैसा दौर ज़ालिम है?
सज़ा मिलती है पहले
और ख़ताऐं बाद में होती हैं तय!
मर रहा है हर वो आदमी जो जीना चाहता है!
पीरों की चौखट पर अब मैं खाली-खाली फिरती हूं,
सब धागे मन्‍नत के मैंने एक ही दर पर बांध दिए.
कोई सांवरे से कह दो, मुझे याद आ रही है.
ग़ैर-ज़रूरी चीजें याद रहती हैं,
हर ज़रूरी बात भूल जाता हूँ.

सुब्‍ह से रोज निकल जाता हूं,
हो गई रात भूल जाता हूं.


उस चारागर को बुला दो जो,
मेरे 'जी' को हल्का कर सके!
ज़िन्दगी लम्बी नहीं है!
लौट के आ जाओ सब.
पीर नई है,
घाव पुराने दूख रहे हैं,
मन पे पड़े थे
वो छाले अब फूट रहे हैं !
ईश्वर को गाली देना सबसे सरल कृत्य है, ये हम तब करते हैं जब हम और कुछ नहीं करते!
मुझे छुट्टी मिले तो वृन्दावन चली जाऊँ मैं.
कहीं यूँ सोचते-सोचते ही न मर जाऊँ मैं.
जिनको न हंसने की हंसाने की समझ,
वो भाड़ में जाएं कसम से भाड़ में जाएं.
जो दिल के, दर्द को रोएँ,
वो सर का, दर्द क्या जानें.
किसी के दिल में होता हो, हमारे सर में उठता है.
वही जिस को ज़माने भर के शायर 'दर्द' कहते हैं.
आँखें तेरी कह रही हैं,
रात गुज़री किस तरह.
ढूंढत-ढूंढत श्याम को मोरे दूखन लागे नैन...
वृन्दावन पहुँचाय दो मोहे तब ही आवे चैन.....
बु'राई में कहाँ था दम हमें बर्बाद करने का,
ज़माना नेकनीयत था हमारे क़त्ल होने तक.
दुनिया के ही तो हो तुम,
तुम सी ही होगी दुनिया.
सबका मन तो लगता है इस दुनिया में!
इक मेरा ही क्यों नहीं लगता?
मिरे मरने पे वो रोये, हंसे या गालियां ही दे,
मैं ये बस चाहता हूँ कोई उसको इत्तला दे दे.
तुम्हें याद आ'ती होगी दोस्तों की,
हमें दुश्मनों की ने बेकल किया है.
चलो फिर आ गया कर्ज
अरे हां-हां वही सर-दर्द.
मैं ढूंढ रहा हूँ उसको जो बस मिला ही था पर मिला नहीं.
चाहने से हम कहां खुश हो सके?
दिल दुखाने की व्‍यवस्‍था कीजिए.

इस जहॉं में आग देनी है हमें,
हुक्‍मरां पेट्राेल सस्‍ता कीजिए.

जि़न्‍दगी बिकती नहीं है आजकल
आइए लाशों पे चर्चा कीजिए.

आदमी में खो गई इंसानियत,
खा़क इनको तुम फरिश्‍ता कीजिए.

हम तो अपना सब लुटा बैठे 'प्रिया'
तुम भी साहब कुछ तो खर्चा की कीजिए.