कहानी
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समंदर में ज्वारभाटा.. -
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दुनिया भर में शोध हो चुके थे, अब मशीनें हिनहिना रही थीं। स्याही शब्दों में ढल रही थी। धड़ाधड़ कागज छप रहे थे। खबर जंगल में आग सी उड़ रही थी। भूगोल की किताबें खंगाली गईं, दर्ज पन्ने बदले जाने लगे, विज्ञान और किंवदंतियों में झमाझम बहस चल रही थी.. पर सबसे बेखबर तीसरी कक्षा के बच्चे चुपचाप बैठे थे.. और मास्टरजी सवाल पूछ रहे थे... सवाल... ?
उधर न्याय के कटघरे में खड़ा चांद, गीता पर हाथ रखकर सच कहने की सौगंध ले रहा था। चांद ने सनद दी। गवाहों को ढूंढा, और गीली आंखें धरती की ओर कर झटके से बोला.... ओ खुदा..आसमान से पूछ लो..तारों से लिखित में ले लो..चाहो तो बादलों का बयान दर्ज कर लो...कि मैं दोषी नहीं हूं...मैं दोषी नहीं हूं....
और चांद का मुंह पीले से लाल हो गया... नसों का खून आंखों से बहने लगा.... बहता रहा और बहता रहा...
इधर समंदर की हालत बिगडऩे लगती है. विशालता स्प्रिंग बन सिकुड़ जाती है.. भीतर तैरती मछलियों का दम घुटने लगता है..सांसों की बेचैनियां जीने की जद्दोहजद में बदलती हैं और जीव-जंतु नुकीली कुलबुलाहट में। समंदर के भीतर के प्राणी उसकी खाल को चबा डालते हैं... कि अंतडिय़ों में सूराख होने लगते हैं, सूराख सुरंग में बदलने लगते हैं...समंदर और सिकुड़ जाता है.. भिंचे हुए समंदर के भीतर लाखों मौतें एक साथ होती हैं... जीवों से निकले प्राण गैसों का गोला बन समंदर के माथे में कई दफा फूटते हैं। माथे की नसें फट जाती हैं.. नसों के परखच्चों पर लिपटा बहरापन हर ओर बिछ जाता है और एकाएक बंधी मुठ्ठियां खुल जाती हैं.. पांव टूट जाते हैं... गरदन एक बार फिर आसमान की ओर उठती है और समंदर धम्म से गिर पड़ता है............
कुछ सैकेंड और फिर..समंदर की आंखें अधखुली हो बहने लगती हैं.... कंपकंपाते होठों के पीछे दांत टकराते हैं...जुबां ऊपर उठकर धड़ाम से गिरती है और एक भर्राया सुर गले से निकल गूंजता है...........चांद.............
चांद..... ओ चांद......
ओ मेरे चांद......
समंदर की फुंकी हुई नसों में बर्फ दौड़ जाती है.... माथे की लकीरें सपाट हो जाती हैं...होठों पर शहद सा बिखरता है... चांद, मेरा चांद, मेरी जान, मेरा खुदा, मेरा पीर बख्श, मेरा प्राण, मेरी जिंदगी, मेरा परमात्मा, मेरा परवरदिगार, और समंदर एक सांस में चांद को सैकड़ों नामों से पुकारता है.....
और समंदर खुद में डूब जाता है........... कि जैसे ख्वाब में डूब जाता है...
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चांद आसमान में बादलों की चादर से आधा मुंह निकालकर झांकता है..उसके बिखरे हुए बाल, पूरे माथे को ढक लेते हैं...उनींदीं आंखें खुलती हैं फिर बंद हो जाती हैं..उसके होठ मुस्कुराते हैं.. एक दूसरे होठ को छूते हैं और फिर चिपक जाते हैं....
समंदर धीमे से पुकारता है.... ओ गुलाबी होठों वाले.... चांद ओ मेरे चांद....
फिर गुनगुनाता है..चांद को धीरे-धीरे जमीं पर बुलाता है... समंदर का ह्रदय चांद से अटखेलियां करने को मचलता है... उनींदा चांद छोटे बच्चे सा झुंझलाता है..और करवट बदल लेता है...
समंदर प्रेम से भरी मां सा चांद को बहलाता है.. चांद को गोद में उठाना चाहता है.. उसके माथे को सीने से लगाना चाहता है... पर प्रकाश वर्ष की दूरी में समंदर फिर खो जाता है....
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दिन बीतते हैं, धूप खिलती है, समंदर सूरज से दुश्मनी पाल लेता है.. दिन सदियों की तरह काटता है... पहाड़ों पर हवाएं गीत गाती हैं.. मानव ध्वजाएं फहरती हैं.. पहाड़, पेड़-पौधे, नदियां, पशु-पक्षी, सूरज की किरणों के साथ मदमस्त हो दिनभर की यात्रा पर निकल जाते हैं.. रास्ते भर जोशीले कदमों के साथ थिरकते हुए जिंदगी का उत्सव मनाते हैं.. उधर समंदर दिन के उजाले में रात की रानी सा मुरझा जाता है। वो रात का बेपनाह इंतजार करता है। और दिन की उजली धूप में अपनी पलकों से आंखों की पुतलियों को कसकर भींच लेता है। और पुतलियों की सतह पर मढ़े चांद के चेहरे को निहारता है।
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आज पूर्णिमा की रात है...
ओह कि शाम हुई.. समंदर की धड़कनें बढ़ी.. और इस रात बदन पर हल्दी का लेप किए, माथे पर छोटा सा काला टीका लगाए, चांद आसमान पर उतर आता है। उसकी मदभरी आंखें, जुड़ी हुई धनुषाकार भोंहें, नाजुक सुर्ख होंठ, नुकीली उठी हुई नाक, चौड़ा ललाट और उसपर बिखरे काले बालों के गुच्छों पर समंदर की नजर ठहर जाती है.. और अचानक फूटी चांद की खिलखिलाहट, समंदर के कानों में घुलकर ह्रदय में घूमने लगती है। समंदर उस आवाज को पकडऩे की नाकाम कोशिश करता है, कि फिर चांद पर मोहित हो शर्म और प्रेम से भर जाता है।
चांद बेपरवाह हो आसमान में टहलता है.. और समंदर की आंखें लक्ष्यभेदी तीर सी चांद पर टिक जाती हैं..समंदर खामोश हो जाता है.. चांद समंदर की ओर मुड़ता है..
------- और फिर नीला पानी पीला हो जाता है....
चांद समंदर में उतरता है..जल में अपना रूप निहारता है.. अपनी कलाओं पर रीझता है..कि समंदर की गहराई को बांहों में भरने की कोशिश करता है...समंदर पीली रोशनी से भर जाता है ..
और फिर समंदर चांद को अपनी धड़कनें सुनाता है.. चांद समंदर के सीने पर कान रखे सुनता जाता है..
दिन बीतते हैं... रातें अमृत वर्षा करती हैं.. चांद समंदर का प्रेम हर रात बढ़ता है.. कि अंधेरा प्रेम का गवाह बनता है.. रोशनी प्रेम की सनद देती है... चांद हर रात आसमान में टहलता है.. समंदर धरती पर हिलोरें लेता है..
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ओह्ह कि अमावस की रात... और समंदर मर-मर जाता है.. वो आसमान की ओर मुंह करके जोर-जोर से चिल्लाता है .. चांद ओ मेरे चांद....
समंदर बेचैन हो विलाप करने लगता है.. वो चांद को ह्रदय में छुपा लेना चाहता है.. कि अपने होठों की छुअन से चांद के होठों को और सुर्ख कर देना चाहता है... समंदर भटकता है.. कि चांद रात को चुपचाप आने का वादा करता है..
आज पूरी धरती पर अंधेरा है.. नीले ह्रदय को खोले समंदर चांद का बेसब्र इंतजार करता है.. चांद धीमे से जमीन पर उतरता है..और समंदर के किनारे रेत पर बैठ जाता है.. समंदर बांहें फैलाता है.. ह्रदय से लग जाने का इशारा करता है.. समंदर की आंखें झरना हो जाती हैं.. उसकी सांसों में हजारों बेला-चमेली के फूलों की सुगंध भर जाती है.. उसकी प्यासी रूह अमृतकलश का आह्वान करती है.. पर चांद टस से मस नहीं होता..चांद ठूंठ सा बना रेत को कुरेदता है.. चांद के पांव पहाड़ों में जमे देवदार की जड़ों से रेत में जम जाते हैं..
समंदर की बेचैनी बढ़ती जाती है.. उसके भीतर उमड़ता प्रेम रस आंखों से आंसू बन टपकने लगता है। वह सांस रोकता है.. तेज कदमों से चलता है और किनारे आकर चांद के बाई ओर बैठ जाता है.. चांद की नजरें अभी भी जमीन में कुछ तलाशती रहती हैं...
समंदर हाथ का सहारा देकर शरीर को संभालता है.. और पुकारता है.. चांद ...
और एकाएक चांद के शब्द हवा में बहने लगते हैं....
समंदर मैं तुम्हारे ह्रदय में नहीं रह सकता और न ही मैं तुम्हें ह्रदय में छुपाकर आसमान में ले जा सकता हूं.. मैं आसमान में हूं और तुम जमीन पर.
जानते हो समंदर मैं आसमान में अकेला हूं, असंख्य तारों के बीच नितांत अकेला.. ओ समंदर में पापी हूं.. शापित हूं.. कि मेरे नसीब में प्रेम नहीं है..
वह पुकारता है.. समंदर .... और फिर फफक उठता है...
मेरी २७ रानियां थी। मैं सबसे ज्यादा प्रेम रोहिणी से करता था.. आज भी करता हूं.. आगे भी करता रहूंगा.. जानते हो समंदर हम प्रेमासक्त थे... प्रेम ही दुनिया थी हमारी.. मेरी आत्मा में रोहिणी और रोहिणी की में मैं.. मेरे ह्रदय में रोहिणी के अलावा कोई नहीं आ सकता समंदर.. वो आज भी मेरी धड़कनों में बजती है.. उसकी महक मेरी सांसों में है.. उसका अंग-अंग मेरे शरीर से गुंथा हुआ है... मेरे चेहरे पर जो कांति तुम देखते हो, ये रोहिणी के प्रेम के प्रकाश से उपजी है.. उसके होठों की लाली आज भी मेरे होठों को सुृर्ख किए है... मैं सदैव रोहिणी का हूं... ओह्ह समंदर कि मैं शापित हूं.....
और चांद के गले की ग्रंथियां पीड़ा के द्रव से रूंध जाती हैं.. उसकी आंखों से सोता फूट पड़ता है.. उसके हाथ भिंचने लगते हैं... कि आत्मा इस कांतिमय आवरण को तत्काल छोड़ देने की गरज से पूरे बदन में घूम जाती है.. जीवन से मुक्त हो जाने का रास्ता तलाशती है...
चांद यकायक उठता है.. लडख़ड़ाता है.. मैं शापित हूं,, आसमान में चमकते रहना मेरी मजबूरी है.. तुम प्रेम न करो समंदर..मुझे भूल जाओ समंदर.. कहता हुआ कहीं गुम हो जाता है......
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समंदर मुस्कुराता है... धीमे से बोलता है...
ह्रदय समंदर था... सैलानी मौजी था...
ह्रदय समंदर था... सैलानी मौजी था...
और समंदर का पानी किनारे पर आकर ठहर जाता है...सांसें फैफड़ों में जाने से पहले ही वापस सांसनली में लौट आती हैं..कि गहराई से जीवों के दम घुटने से दबी हुई चीखें गूंजती हैं....
समंदर को दौरे पे दौरे आते हैं.. मौजें धमनियों में जमे लहू सी दर्द ले लेकर आगे बढ़ती कि शिराओं में झटकों के साथ लौटती और आकर ह्रदय को हिला जाती.. सब शारीरिक तंत्र विफल हो गए. नाड़ी मनमानी पर उतर आई.. धड़कनें आवारा हो भटकती हैं.. और करोड़ों चीखें कराहती हैं..
उधर न्याय की अदालत में चांद दलीलें दे रहा है.. अदालत समंदर का इंतजार करती है..समंदर होश को कंधे पे डाल पगडंडियों में भटकता है.. कि अदालत में लकड़ी का हथौड़ा तीन बार टंकारता है.. पूर्णिमा की तारीख तय होती है..
समंदर अपने पैरों के नीचे जमीन खोखली बना देना चाहता है.. सर पर मंडराता आसमान उसका दम घोंटता है.. वो आसमान को फाड़ देना चाहता है.. हाथों से हवाओं को दूर भगाता है..
समंदर अब आत्महत्या करना चाहता है.. वह डूब मरना चाहता है.. पर खुद से गहरा उसे कुछ नज़र ही नहीं आता.. वह आत्मदाह के लिए उठता है.. पर आग उसका पानी देख भाग जाती है.. उसे कूद जाने के लिए कोई छत नहीं मिलती.. वो जहर ढूढ़ता है.. पर वो तो पहले ही मंथन में निकलने के बाद शिव के कंठ में समा गया..
समंदर शंखिया खाए जानवर सा घूमता है..पागल हो किनारों से टकराता है.. भीतर जाता है... फिर वापस आकर किनारों से सर मारता है..
समंदर घुटनों के बल बैठ जाता है.. दोनों हाथ उठाता है.. और खुदा से दुआ में मौत मांगता है.. पर खुदा रो पड़ता है.. लेकिन वो भी उसके खारी जल में कुछ बूंदें आंसुओं की टपकाकर लौट जाता है..
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आज पूर्णिमा की रात है...
चांद आसमान पर है... रात के बारह बजे हैं... आसमान पीला है...
समंदर बेचैनियों के टापू में बदल चुका है. वह जोर-जोर से हंसता है...फिर रोता है...फिर हंसता है और फिर हंसता रहता है.. कि अपने दोनों हाथ समेटता है.. अपनी छाती अपने नाखूनों से फाड़ता है और अपने ह्रदय को निकालकर चांद की ओर उछाल देता है..तब तक उछालता है...जब तक कि पस्त नहीं हो जाता....
सुबह सुबह ... तीसरी कक्षा में आवाज गूंजती है...
मास्टर जी पूछते हैं.. कौन बताएगा कि पूर्णिमा के दिन समंदर में ज्वारभाटा क्यों आता है ?
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