Wednesday, September 5, 2018

ज़िन्दगी यूँ तो कई बार मिली
ज़ुर्मे ख़ूं में ही गिरफ़्तार मिली.

ख़ून भी मेरा ओ' मैं ही क़ातिल
उसपे मुझको ही सज़ा यार मिली.

चाह को पी लूँ, तलब थी मेरी,
वो भी मेरी ही तलबगार मिली.

वक़्त पे हमने किये सारे हिसाब
फिर भी हर चीज़ क्यों उधार मिली?

बच भी पाते तो भला कैसे प्रिया?
सबके चाकू में ग़ज़ब धार मिली.

शक्लो-शोहरत पे खरोंचें न मिलीं,
एक बस रूह ज़ार-ज़ार मिली.

22-08-2018
आने-जाने से होती थी तोड़-फोड़ बहुत !
सो हमने दिल में एक दरवाजा बना दिया.

23-08-2018
बच्‍चे सी ज़‍िद हैं उसकी सब,
मुझे मॉं सा सब्र रखना होगा.


24-08-2018
टीस वही, चीख़ ओ अज़ाब वही
फिर कुरेदा है किसी ने घाव वही

24-08-2018
अपने हिस्से की, रोटियां भी, छोड़ दीं मैंने,
जाने क्यूँ मुझसे प्रिया फिर भी ख़फ़ा है दुनिया.

27-08-2018
पहले इश्‍क़ो-हुस्‍न को लूटा जमकर,
और फिर शायर ने शे'रो शाइरी की.

28-08-2018
हमें दोज़ख़ में डाले दे रही है,
ये कैसी बेरहम,मक्कार दुनिया.

किसी का क्या बिगाड़ा हमने था? जो
हमारी की गयी बरबाद दुनिया.

किसी ने कर दिया है ख़ूं किसी का
उसी को दे रही है दाद दुनिया

कि अब है पाप धोने में सहूलत,
चली जाती है हरि के द्वार दुनिया

हमीं हैं एक बस बन्धन यहां पर
ओ है आबाद, थी आबाद दुनिया

हमारी लूट में शामिल है ये भी
जो दिखती है ये थानेदार दुनिया

हमीं हम इश्क़ में खोजा फिरे थे
सभी की है जी हुस्ने-यार दुनिया

चुनेंगे दोस्त इनमें से ही ओ फिर
कहेंगे है बड़ी ग़मख़्वार दुनिया

कभी तो झाँककर देखा भी होता
हमारे दिल में भी है प्यार दुनिया

प्रिया ने रख दिया है सामने दिल
जिसे अब बांटना हो बाँट दुनिया.

हमीं ने ग़र्क की है, अब हमें भी
दिखाएगी नरक का द्वार दुनिया

मिलेगी मौत दिल के नाम पर ही
गो यूँ तो है बड़ी दिलदार दुनिया

31-08-2018
ज़माने ने दिया है प्यार इतना कि
मुझको ख़ुद से नफ़रत हो गयी है.

31-08-2018
मुझे वहशत ओ नफ़रत है मुझी से
मुझे मुझसे ही हैं शिकवे सभी अब.

02-09-2018
चलौ री राधिके नैक नन्द जू घर देखि आवें,
सुनी है, सांवरे बन के कन्हैया आय रहे हैं.

03-09-2018
देख! मिट जायेगी तल्ख़ी यूँ भी
मुझ को त्यौहार की बधाई दे दे.

03-09-2018
किसी पे दिल जो आये उसपे ही ग़र जान भी जाए,
तो फिर तो रोज़ मर-मर के कटेगी ज़िन्दगी अपनी.

04-09-2018
तुम जो आये हो तो महसूस कराओ
यूँ तो सब आते हैं, जाने के लिए ही!

04-09-2018
'इश्क़' है अब मेट्रो की सीढियां,
लिफ़्ट न हो, हांफ़ने लगते हैं हम!

05-09-2018
ऐसे किया है प्‍यार हमने उसको ऐ हुज़ूर
उठ उठ के खटोले से उसे देखते थे हम
  5-09-18