Friday, October 24, 2014

निर्जीव...
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मन हो रहा है..
निर्जीव हो जाऐं...
सांस खींचने की बेताबी और बाहर फैंकने की अकुलाहट से शून्य,
आंख, कान, नाक जैसी तमाम ज्ञानेंद्रियों से मुक्त,
ओह्ह...
मन कह रहा है कि बन जाएं पंखा..
छत के कुंदे पर टंगा हुआ,
कि किसी हवापसंद की हसरत भरी नजरें
टकरायें बटन से,
फिर रेगुलेटर से और फिर बिजली के मीटर की जलती-बुझती रोशनी से
और पंखा.. वो तो लटका है अछूत सा,
पिछली दिवाली से नहीं झाड़ी गई है जिसकी धूल
लेकिन, खैर...
हम जो कि पंखा हैं..
-- घूमते रहें, घूमते रहें, घूमते रहें और बस घूमते ही रहें...

या बन जाएं,
४५ रुपये वाला दिवाली का बंपर रॉकेट
जिसमें दो मासूम हाथों ने भरी थी बारूद,
जिसे दो सख्त, चमकीले हाथों ने रख दिया हो गली के बीचों-बीच,
इक  ईंट के टुकड़े से सटाकर
फिर डरते-डरते छुवा दी हो आग, आधी जली, आधी बुझी सी..
लेकिन..खैर...
हम चूंकि रॉकेट हैं ना..
सांय से उड़ जाएं भड़कीली सरसराहट लिए,
और बिखर जाएं आसमान में जुगनुओं की तरह...

या बन जाएं
एक तकिया, बिना गिलाफ का,
जिस पर रखता हो सर कोई,
तेल-फुलेलों का शौकीन,
लंबे, कड़े, जटानुमा, जीवोंयुक्त बालों में
लगाता हो दिन में कई दफा बदल-बदल कर
चमेली, आंवला, कियो-कार्पिन, नारियल, पानी घुला सरसों का तेल
या तेल अरंडी या शीशम का भी..
जिस गंध में सजीव लोगों को आती हों उबकाइयां..

लेकिन..खैर...
हम जो कि तकियां हैं, बिना गिलाफ का
एकदम निर्जीव, गंध से शून्य,
तो रात भर रगड़ते रहें, रगड़ते रहें, और बस रगड़ते रहें
अपना वजूद , उसकी जटाओं से ...

अहा... कितना मजेदार है... निर्जीव हो जाना....और सुखदायी भी.. !!!!

( खैर विकल्पों की भरमार हैै
बस निर्जीव होने की दरकार है... )













Saturday, October 11, 2014


तुम एक पोटली हो,
बिना रोशनदान वाले घुप्प तहखाने में रखी हुई,
जिसमें ठूंस-ठूंस कर भरी है सकारात्मक ऊर्जा
और एक टुकड़ा प्रकाश का भी....

पोटली के मुंह पर लगी गांठें,
कस गई हों भीतर के दवाब से,
पोटली बदल गई हो एक गठीले नाजुक बदन में,
और प्रकाश में घुली ऊर्जा भीतर से झांक रही हो ठीक ऐसे जैसे
त्वचा में उगे नर्म, मुलायम रोंये...
वो सकारात्मक ऊर्जा बेंधती है अंधेेरे की परतों को,
जैसे सूरज के तन से फूटी धूप बेंध आती है ओजोन की इक परत,

पर ओ पोटली...तुम क्यों चाहती हो
तहखाने की कैद से फरार होकर सूरज की धूप में मिल जाना..
क्यों हो इतनी बेताब..बेकल, बेचैन ?
ज़रा गौर से सुनो..
तुम अंधेरे में तराशी गई हो,
तहखाने की नमी में ढाला गया है तुम्हारा बदन,
सन्नाटे की गूंज में नाचती रही हो तुम आजतक,
खुद के ही बनाए गीतों पर आंखें मूंदकर..

ज़रा जानो पोटली
तहखाने से मुक्त हो, जब सूरज की धूप में खोली जाएंगी तुम्हारी गांठें, या खुद ही मुलायम झटके से पूरी खुलकर,
तुम फैला दोगी अपने चारों कोने जमीन पर,
तो रंग-बिरंगी तितलियां बन उड़ जाएंगी,
तुममें सदियों से महफूज़ रही रश्मियां,
हवा मुठ्ठियों में दबाकर ले जाएगी तुम्हारी ऊर्जा,
और बिखेर देगी सदियों से खाली आसमान में,,,
तब तुम रह जाओगी रेशम का छोटा सा चौकोर कपड़ा भर,

जाओ , हम तुम्हें मशविरा देते हैं,
बैठी रहो तहखाने में चुपचाप,
कि दरारों से रिसते तेज को देखकर, आएंगे कुछ नकारात्मक जीव,
और उन दरारों पर मुंह सटाकर, अपनी सांसों में भर ले जाएंगे छटांक भर सकारात्मक ऊर्जा


....जीओ..... प्रिये