निर्जीव...
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मन हो रहा है..
निर्जीव हो जाऐं...
सांस खींचने की बेताबी और बाहर फैंकने की अकुलाहट से शून्य,
आंख, कान, नाक जैसी तमाम ज्ञानेंद्रियों से मुक्त,
ओह्ह...
मन कह रहा है कि बन जाएं पंखा..
छत के कुंदे पर टंगा हुआ,
कि किसी हवापसंद की हसरत भरी नजरें
टकरायें बटन से,
फिर रेगुलेटर से और फिर बिजली के मीटर की जलती-बुझती रोशनी से
और पंखा.. वो तो लटका है अछूत सा,
पिछली दिवाली से नहीं झाड़ी गई है जिसकी धूल
लेकिन, खैर...
हम जो कि पंखा हैं..
-- घूमते रहें, घूमते रहें, घूमते रहें और बस घूमते ही रहें...
या बन जाएं,
४५ रुपये वाला दिवाली का बंपर रॉकेट
जिसमें दो मासूम हाथों ने भरी थी बारूद,
जिसे दो सख्त, चमकीले हाथों ने रख दिया हो गली के बीचों-बीच,
इक ईंट के टुकड़े से सटाकर
फिर डरते-डरते छुवा दी हो आग, आधी जली, आधी बुझी सी..
लेकिन..खैर...
हम चूंकि रॉकेट हैं ना..
सांय से उड़ जाएं भड़कीली सरसराहट लिए,
और बिखर जाएं आसमान में जुगनुओं की तरह...
या बन जाएं
एक तकिया, बिना गिलाफ का,
जिस पर रखता हो सर कोई,
तेल-फुलेलों का शौकीन,
लंबे, कड़े, जटानुमा, जीवोंयुक्त बालों में
लगाता हो दिन में कई दफा बदल-बदल कर
चमेली, आंवला, कियो-कार्पिन, नारियल, पानी घुला सरसों का तेल
या तेल अरंडी या शीशम का भी..
जिस गंध में सजीव लोगों को आती हों उबकाइयां..
लेकिन..खैर...
हम जो कि तकियां हैं, बिना गिलाफ का
एकदम निर्जीव, गंध से शून्य,
तो रात भर रगड़ते रहें, रगड़ते रहें, और बस रगड़ते रहें
अपना वजूद , उसकी जटाओं से ...
अहा... कितना मजेदार है... निर्जीव हो जाना....और सुखदायी भी.. !!!!
( खैर विकल्पों की भरमार हैै
बस निर्जीव होने की दरकार है... )
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मन हो रहा है..
निर्जीव हो जाऐं...
सांस खींचने की बेताबी और बाहर फैंकने की अकुलाहट से शून्य,
आंख, कान, नाक जैसी तमाम ज्ञानेंद्रियों से मुक्त,
ओह्ह...
मन कह रहा है कि बन जाएं पंखा..
छत के कुंदे पर टंगा हुआ,
कि किसी हवापसंद की हसरत भरी नजरें
टकरायें बटन से,
फिर रेगुलेटर से और फिर बिजली के मीटर की जलती-बुझती रोशनी से
और पंखा.. वो तो लटका है अछूत सा,
पिछली दिवाली से नहीं झाड़ी गई है जिसकी धूल
लेकिन, खैर...
हम जो कि पंखा हैं..
-- घूमते रहें, घूमते रहें, घूमते रहें और बस घूमते ही रहें...
या बन जाएं,
४५ रुपये वाला दिवाली का बंपर रॉकेट
जिसमें दो मासूम हाथों ने भरी थी बारूद,
जिसे दो सख्त, चमकीले हाथों ने रख दिया हो गली के बीचों-बीच,
इक ईंट के टुकड़े से सटाकर
फिर डरते-डरते छुवा दी हो आग, आधी जली, आधी बुझी सी..
लेकिन..खैर...
हम चूंकि रॉकेट हैं ना..
सांय से उड़ जाएं भड़कीली सरसराहट लिए,
और बिखर जाएं आसमान में जुगनुओं की तरह...
या बन जाएं
एक तकिया, बिना गिलाफ का,
जिस पर रखता हो सर कोई,
तेल-फुलेलों का शौकीन,
लंबे, कड़े, जटानुमा, जीवोंयुक्त बालों में
लगाता हो दिन में कई दफा बदल-बदल कर
चमेली, आंवला, कियो-कार्पिन, नारियल, पानी घुला सरसों का तेल
या तेल अरंडी या शीशम का भी..
जिस गंध में सजीव लोगों को आती हों उबकाइयां..
लेकिन..खैर...
हम जो कि तकियां हैं, बिना गिलाफ का
एकदम निर्जीव, गंध से शून्य,
तो रात भर रगड़ते रहें, रगड़ते रहें, और बस रगड़ते रहें
अपना वजूद , उसकी जटाओं से ...
अहा... कितना मजेदार है... निर्जीव हो जाना....और सुखदायी भी.. !!!!
( खैर विकल्पों की भरमार हैै
बस निर्जीव होने की दरकार है... )