गज़ल
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मेरे इश्क की इतनी पैमाइश करता है क्यूं..
यादों में ढूंढता है
धड़कन से पूछता है
फिर भी इन लबों को खामोश रखता है क्यूं..????
मेरे दिल को जलाकर यूं अनजान न बना करो
मेरा प्यार तुम्हें मंजूर है कभी तो कहा करो..।।
तेरे इंतजार में मुरझा रहा है दिल मेरा
अपनी सांसों की महक इसमें कभी तो भरा करो..।।
मेरी खामोशी इजहारे मोहब्बत ही तो है
इसे पढ़ने की आजमाइश कभी तो किया करो..।।
सुना है जामों को भर देते हो आंखों ही से तुम
थोड़ा अहसान ओ प्रिय हम पे भी किया करो..।।
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मेरे इश्क की इतनी पैमाइश करता है क्यूं..
यादों में ढूंढता है
धड़कन से पूछता है
फिर भी इन लबों को खामोश रखता है क्यूं..????
मेरे दिल को जलाकर यूं अनजान न बना करो
मेरा प्यार तुम्हें मंजूर है कभी तो कहा करो..।।
तेरे इंतजार में मुरझा रहा है दिल मेरा
अपनी सांसों की महक इसमें कभी तो भरा करो..।।
मेरी खामोशी इजहारे मोहब्बत ही तो है
इसे पढ़ने की आजमाइश कभी तो किया करो..।।
सुना है जामों को भर देते हो आंखों ही से तुम
थोड़ा अहसान ओ प्रिय हम पे भी किया करो..।।
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