Monday, September 28, 2015
महफिल-ए-मदहोशियों में, रोशनी फिर लुट रही
एक जलती लौ कहीं फिर लडख़ड़ाकर बुझ रही
रो रहा आंगन
दीवारें चीखती हैं रात दिन,
घर का सीना फट रहा, छत बूंद-बूंद रिस रही...
मां के हाथों की बनी
रोटी पड़ी बिखरी कहीं
आग गायब हो गई
चूल्हे में लकड़ी गल रही
खो गए रंगीन सपने
गुम हुई नादानियां
और परियों की कहानी, कील-कील चुभ रही
वो हंसी, वो खिलखिलाहट
हूक-हूक रो रही
और सन्नाटों की आहट जिस्म-ओ जां में बस रही
ये झनकती पायलें
बिंदी, खनकती चूडिय़ां
दूर फैंक भी दो कि ये नाग बनकर डस रही
हूं कहां मैं और
ये दुनिया कहां है ओ खुदा
क्या ये मुझसे हो रहा है, जाने क्या मैं कर रही
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