२०१४
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तुम बिल्कुल भी नहीं जानते,
लेकिन मैं भलीभांति जानती हूं,
तुम इतने ही निष्ठुर हो,
जितने कि मेेरे लाखों आंसुओं को ठोकर मारकर, मुझे छोड़कर कहीं दूर चले गए मेरे बूढ़े दादाजी,
पर तुम इतने प्यारे भी हो,
जितने कि मेरी बहिन के दोनों मासूूम बच्चे, जिन्हें मैं ह्रदय का टुकड़ा कहा करती हूं..
तुम नहीं जानते,
इसलिए सुनो
मुझे तुमसे इतनी ही नफरत है जितनी किसी सह्रदय, पशुप्रेमी शाकाहारी को प्लेट में रखे गोश्त से हो सकती है..
ओह्ह कि मैं तुमसे प्रेम भी कर बैठी, जानना चाहते हो कितना..
बस उतना ही ..जितना कि मादा क्रौंच का पक्षी करता है नर क्रौंच से...
एक बात बताएं..
मेरे हाथों में सिर्फ मेरी लकीरें दर्ज हैं और हवा भरी है..
मैं बहुत सिमटी सी प्राणी हूं,
इसलिए इन्हीं लकीरों को पैमाना बनाकर अपनी भावनाओं को नापती रहती हूं...
और बेवजह हवा से तोलती रहती हूं माथे में वजन पैदा करती स्मृतियों को..
और एक तुम .. जो मदमस्त हाथी की चाल से मेरी जिंदगी के उन सर्द और गर्म दिनों में आकर बैठ गए..
जब कि मैं एकांत ढूंढ़ रही थी..
तुमने मेरी रातों को भी नहीं बख्शा,
कि मेरी आंखों में हसरतों के ख्वाब बोए..
अंकुरों को फूटने की आस जगाई..
हां जानती हूं वो तुम ही थे, जिसने जिंदगी की धरती को आकाश से मिलाए रखने के लिए हल चलाने का जज्बा पैदा किया..
और तभी लहलहाती फसलों को देखकर जब मेरा मन चहक उठा, तो रात पड़ी बर्फ ने
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