Sunday, November 1, 2015

सुनो, सुनो, इतना कि, दोनों कानों को बना दो शहर के बीचोंबीच रखे कूड़ेदान,
आंखों को बहने दो ऐसे... जैसे बारिश गुजरने के महीनों बाद भी बूंद-बूंद टपकती है किसी जर्जर पुश्तैनी मकान की छत..
जुबां को बंद करो चूहेदानी में... और फेंक आओ घर से मीलों दूर किसी निर्जन स्थान पर...
दोनों हाथों को उठाओ.. और कनपटियों पर रखकर हथेलियां, भींचो इतनी तेज कि चटख जाएं नसें..
ये जो होठ हैं न.. दो दीवारें हैं मेरी जान... जिनमें कैद होनी हैं सीने से उठती अनगिनत हूकें... 
और हां इस माथे का कोई मोल नहीं.... इसे चाहे पैरों पर पटको या चौखट पर.... ///
___________\ ओ प्रिये... करो सब, करती रहो .. जी करे तब तक.. जब.... बेबसी दस्तक दे दे... बेचैनी बदन तोड़कर फूटे, रास्ते पहाड़ हो जाएं, और आसमान पर टंगी हुई आंख.. तुम्हें देखकर आंखें फेर ले.. /////

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