Friday, January 16, 2015






गीत
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खंड-खंड नदियां हैं..
चूर-चूर पहाड़,
हवा के बदन पे ठोक दी गई हैं कीलें हजार..
आसमान गिर रहा है,
सिर पे चटख-चटख कर....
धंस रही है धरती,
पाताल में सिमटकर.....
ओह्ह पेड़ रो रहे हैं
खुद से लिपट-लिपटकर,
उल्का बनी हैं बूंदें,
गिरती पिघल-पिघल कर....
वो आग को तो देखो..
जाने कहां से आई..?
फिर-फिर के उड़ रही है
माथे पे बाज बनकर.....
ये रात है या मजमा,
चीखों का लग रहा है
चिंघाडऩे लगी हैं,
कब्रें उघड़-उघड़ कर.....
रो रहा है सूरज,
क्यों फिर उदय हुआ हूं,
क्यूं भस्म में न होता,
या क्यों न बुझ गया मैं.....

किसने सितम किया है,
किसने इसे है ढोया..
..... ओह्ह फिर कोई फकीरा,
लगता है दिल से रोया..








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