देहदान
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ओ प्रिय
आज आखिरकार कर दिया मैंने अपनी देह का दान,
ले जाओ और ले जाकर रख दो इसे पांच फुट दो इंच लंबे, किसी गहरे ताबूत में,
जहां इसे दोबारा खोल सको..
सुनो...
इस साल जून की किसी दोपहर में,
खींच ले जाना मेरे शरीर से हरी-हरी नसें,
और दो पाटियों पे नसों को लपेटकर, बुनवा लेना अपने लिए एक हरियल पलंग..
जिसकी मुलायम बुनावट पर तुम सो सको, जब दुनिया के कामों से थककर चूर हो सबसे ज्यादा..
ओ प्रिय
आंगन में पड़ी उस बोतल को उठा लाना, और मुंह तक भर ले जाना मेरा लहू..
कि कपड़े का फोहा बोतल के ढक्कन में लगाकर, धीमे से करना प्रज्जवलित..
मेरा लहू तुम्हें देगा रातभर रोशनी..
जानते हो ?
मेरी आंखें बोलती हैं.. ऐसा लोग कहा करते थे..
गौर से सुनो..
ये आंखें निकालना
और तुम दे देना उन मासूम बच्चों को, जो स्कूल की प्रतियोगिता में तस्वीर
बनाने के लिए मांगेंगे तुमसे रंग और सामान खरीदने के लिए पैसे..
उनकी बनाई हुई तस्वीर में जब चिपकी होंगी ये दो आँखें, तो जीवंत हो उठेगी मेरे ह्रदय के टुकड़ों की तस्वीर ..
ओ प्रिय
फिर मेरा दिल निकालना..
और बाकी बची मेरी हड्डियों और सूख चुकी खाल को इकठ्ठा कर लगा देना आग..
ये जलती रहेंगी और फिर खुद-ब-खुद बुझकर बन जाएंगी राख..
हां कि मेरा दिल तुम्हारे पास है..
जो किसी मर्ज की दवा नहीं.. इसलिए इसे कांच के मुंहबंद मर्तबान में बंद कर
रख देना अपने ड्राइंगरूम के शो केस में ..
इसकी बेचैनियां इसमें पैदा करती रहेंगी झनझनाहट और ये हिलता-डुलता खिलौना...
........... आजीवन करता रहेगा तुम्हारा मनोरंजन.......
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प्रिया गौतम
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