बाबुषा....
दिन आज सुहाना है प्यारे
आओ एक गीत सुनाते हैं,
जब हम नादान भटकते थे,
कहीं नाम सुन लिया बाबुषा..
वो तस्वीरों में दिखी हमें,
सुलझे बालों में उलझी सी
आंखें टिमटिमटिम चमक रही
बच्चे सी ठुकमती बाबुषा
अब शैतानों की नानी थे
सो हम इक रात जगे जीभर
फिर वॉल पे जाकर ढूंढ लिया
आधी पढ़ डाली बाबुषा
उस रात उछलकर नाच उठे
और गीत गा लिया बाबुषा
जब आंख खुली, सब भूल गए
बस याद रह गया बाबुषा
फिर दीवानों सा हाल हुआ
हर जगह दिखे बस बाबुषा
रच दिया नया एक जीवन तब
और नाम रख दिया बाबुषा
वो नीले अंबर की चिडिय़ा
या थी परियों में सोन परी
वो फसल चुकंदर की थी या
बह रही नर्मदा बाबुषा
हम रोज शरारत करते थे
जीभर के नाच नचाते थे
दुनिया उससे थी सकुचाती
हम खूब छेड़ते बाबुषा
हम उद्दंडी बालक थे अब
ये जान चुकी थी बाबुषा
फिर बाढ़ प्रेम की आई और
इक रोज मिल गई बाबुषा
अब धरती, नभ, सूरज, चंदा
रोटी और साग भी बाबुषा
सांसों में हवा, रोगों की दवा
मम्मू में बदल गई बाबुषा
वो छांव कभी छाता बनती
खुलती ओ सिकुड़ती बाबुषा
दुनिया को सुख भर-भर देती
खुद दूर हो गई बाबुशा
एक दिन ऐसा आया यारो
हमने भी दुखाया दिल उसका
उसे खूब कही खोटी-खोरी
सुनकर के रोई बाबुषा
वो दिन काला, मनहूस भी था
जो रूठ गई थी बाबुषा
पर देख दुखी, ममता उमड़ी
मुझे ह्रदय में ले गई बाबुषा
जब इश्क कभी होगा मुझको
जग प्रेम-पे्रम चिल्लाएगा
मैं दोनों हाथ उठाकर के
बस शब्द कहूंगी बाबुषा
सुन लो ओ मेरे प्रिय-जनों
प्रिया नाराज कभी हो तो
तुम गोद में सर रखकर उसका
बस प्यार से कहना बाबुषा
माथे पर मेरे ज्वार चढ़े
और दुआ-दवा भी चुक जाएं
मेरे कान में आकर कह देना
दो बार बाबुषा, बाबूषा..
जब मृत्यु सिरहाने आकर
मुझे लेकर उडऩे को आए
मेरे मन को धीर बंधाना तब
मुझे राग सुनाना बाबुषा
मृत्यु है ईश्वर की करुणा
जिंदगी है उसका प्रेम प्रिए
ये शब्द भी रस ले ले कर के
दोहराती है अक्सर बाबुषा
तो सुनो कि जब मैं दुनिया से
ईश्वर की करुणा पा जाऊ
तुम राम का नाम नहीं भजना
बस जोर से कहना बाबुषा
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