Sunday, November 1, 2015

चाय के कप से जब मन ऊब जाये,
तेज प्यास में, पानी का गिलास मुंह से लगाना बोझ लगने लगे...
फोन की मीटिंग प्रोफाइल पे लगी घण्टी, कानों तक पहुंचते पहुंचते 400 डेसिबल पार हो जाये...
बारिश की बूँदें जी जलाने लगें... घड़ी की बढ़ती सुई, धड़कती नब्ज सी लगे... फेंफड़ो में भरी बेचैनी झटके से माथे में जा टकराये...और टकराती रहे
तो उठ जाओ....
और फिर से ढूंढो उस काग़ज के टुकड़े को....
जिसमें तुमने लिखा था कभी ...
' बेचैन हूँ तो है यकीं ज़िंदा हूँ मैं '

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