Monday, September 28, 2015

गुरुमंतर ..

तब गुरुजी ने गुरुमंतर दिया था,
और मैं उम्र की कच्ची पगडंडी पर एक पैर से खड़े हो,
शरीर को साधने की कला जान रही थी
उस वक्त मेरे बाल खुले थे..
मां चिल्लाती,
मुझे जबरन पकड़कर लाती,
और बालों में आधी कटोरी तेल उड़ेलकर
बालों को कसकर बांध देती, फिर धीरे-धीेरे कहती..
गुरुमंत्र ले लिया भजन भी नहीं करती..
तब मैं जोर से हंसा करती...
और कहती, एक दिन बाल खुलेंगे, तो तुम्हारे ईश्वर को लटों से बांध लूंगी,
और फिर देखती रहना, कभी बाल न बांधूंगी..

अब बाल जो खुले रह जाते हैं अक्सर ...


No comments:

Post a Comment