Monday, September 28, 2015
प्रेम
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कुछ लोगों का प्रेम हवा सा होता है
अदृश्य और रंगहीन,
जो सांसों के सहारे, खून में घुलता है,
शरीर में घूमता है, और रोमछिद्रों से होता हुआ बाहर निकलकर फिर हवा में घुल जाता है...
कुछ का निरा पहाड़..
सामने खड़ा हुआ, आसमान की आपदाओं से बचाता, अपनी गोद में पनाह देता..
आंधियों से टकराता,
लेकिन सांस भरने के लिए आती मधुर हवा को रोकता,
अविचल खड़ा हुआ ..
कुछ का प्रेम बहती हुई नदी सा होता है...
आओ किनारे बैठो..प्यास लगे तो अंजुली भरो.. पीओ..और अपनी राह पकड़ो... उतरे तो डूब जाओगे...
एक प्रेम धरती सा भी होता है..
जिसे जीवन भर रोंदते हैं हमारे कदम
जिसमें उगती हैं हमारी उम्मीदें..
और फिर..
इसकी परतों में मिल जाना होता है हमारा शरीर
लेकिन हम जीने से लेकर मरने तक भूलते रहते हैं इसकी उपस्थिति और इसका प्रेम...
आसमान, सूरज चांद, और तारे... भी प्रेम करते हैं..
जिन्हें आता है.. बस फैल जाना, उगना, और प्रेम में चमकना..
इन्हें अक्सर देवता कह दिया जाता है..
कुछ लोगों का प्रेम बरसात की बूंदें हैं...
इसे मौसमी प्रेम भी कहते हैं..
एक नियत समय .. तब घनघोर बरसेगा.. पर शर्त है फिर साल भर तरसाएगा..
और हां दुनिया की कुदूरतें भी डालती हैं इसपे असर..
और एक आखिरी प्रेम होता है मां-पिता का..
अब बढ़ रही है मेरी बेचैनी..
बस बह रही हैं भावनाएं
क्योंकि..
इसके लिए
आज भी मैं ढूंढ रही हूं कुछ शब्द..
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