Monday, September 28, 2015

बब्बूगोशा......

मुझे पूरा एक चाहिए... मुझे पूरा एक बाबू चाहिए... मां मुझे पूरा दो ना.. अगली बार बाबू आए तो सबको बांट देना.. मुझे बिल्कुल मत देना..
अभी मुझे एक चाहिए..
और यह कहते-कहते वह रोने लगी। उसकी आंखों से आंसू एक के बाद एक उसके गालों पर लुढ़कते रहे.. पर रोने की आवाज गायब थी.. मुंह से बस एक ही बात बार-बार निकल रही थी. मुझे पूरा एक बाबू चाहिए...
.मां जोर से चिल्लाई .... पिंकी... चुप हो वरना एक थप्पड़ मारूंगी...मां जानती थी... वो बाबू किसको बोल रही थी... यह बब्बूगोशा थे.. जो पिताजी आज पहली बार लेकर आए थे.... उससे पहले पिंकी ने बब्बूगोशा नहीं देखे थे..
मां बोलती रही.. नहीं तू अकेली नहीं है.. घर में सब बच्चे हैं.. और मैं सबका हिस्सा तुझे कैसे दे दूं.. जितनी बड़ी हो रही है उतनी ही जिद्दी होती जा रही है.. मां बड़बड़ाती रही.....और सबको आधा-आधा बब्बूगोशा बांटकर, दो बब्बूगोशा उठाकर रसोई की तिखाल में रखकर चुपचाप गायवाले घर में बंधी गाय को खोलने के लिए निकल गई। मां गाय रखती थी.. ताकि बच्चों को दूध मिलता रहे.. इसलिए हर दोपहर गायों को खेल देती थी.. गायें दिनभर घूमती और शाम को फिर लौट आती....
मां उधर को निकली और पिंकी ने कमरे की ओर दौड़ लगा दी। वह बैड पर औंधे मुंह लेट गई। और खूब रोई.. आज उसके भी सिर पर जिद चढ़ चुकी थी। अब तो वह और जिद्दी हो गई.. उसने मन ही मन सोचा.. अब लेगी तो पूरा बब्बूगोशा.. इतनी सी देर में


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