तुम मुझे सुनते रहे, सुनते रहे, और बस सुनते ही रहे...
और मैं कहते रहने की आदी हो गयी..
एक वक्त कोई मेरे कान के पास आकर कह गया...
संसार में स्त्रियों को बोलने नहीं सुनने की अनुमति है..
और इस परिधि को तोड़ने का दंड तुम्हारी ख़ुद चुनी हुई कठोरतम सज़ा होगी
मैं हंसी...कानों को झटका, फुसफुसाई... जब बोलने की अनुमति होगी तो हम सुनेंगे...सज़ा लॉक कर दी जाये..
और अपनी ही आँखों की चमक में डूब गयी..
मैंने स्त्री होने की यह पहली और अंतिम परम्परा तोड़ डाली..
मेरी आवाज़ तुम्हारे कानों तक तो पहुंचती थी..
पर ह्रदय तक?
अक्सर कहती थी...ख़ुदा जाने...
आज भी ख़ुदा ही जानता है....
मेरे कान खुले हुए हैं...
मेरी आवाज़ दफ़्न है..
तुम्हारे कान बेशकीमती आवाजों से भरे हैं...
हां....अब मैं सुन पा रही हूँ !!!!
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