Friday, January 2, 2015
कविता.. ख्वाब
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ओ प्रिय
तुम मुझे जान से ज्यादा प्रिय हो,
फिर भी तुम मेरी जिंदगी तो नहीं हो सकते..
हां तुम मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत ख्वाब हो..
वही ख्वाब जिसमें डूबकर मैं हो जाती हूं
जिंदगी से मुक्त,
वहीं ख्वाब जिससे उबरकर जब जिंदगी में वापस लौटती हूं,
तो भी होश होता है बेखबर और
मेरी आंखों के सामने नाचती रहती है तुम्हारी तस्वीर,
तुम्हारी बातें, तुम्हारी मुस्कुराहट, तुम्हारा गुस्सा और एक बिना गुदा हुआ नाम
जो हवाओं में बहता है और आंखों के आगे फैल जाता है,
जैसे पुतलियों पर मढ़ दी गई हो कोई फिल्म,
ओह्ह कि तुम एक बेशर्म ख्वाब हो
जो बार-बार आता है मुझे
तुम स्वार्थी और दबंग भी हो
जो किसी और ख्वाब को मेरी आंखों में टिकने नहीं देता,
ओ ख्वाब क्या तुम जानते हो?
हम बड़ी अजीब कश्मकश में जी रहे हैं,
हर रात के ढ़लने से पहले सो जाने की कोशिश करते हैं,
ताकि रातभर देखते रहें ये हसीन ख्वाब,
ओह्ह कि हम पलकों के दरवाजों को चौपट खोलकर रखने को भी हैं मजबूर,
क्योंकि डरते हैं,
आज अगर न आया वो ख्वाब तो...??
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प्रिया गौतम
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