उस दुकान पर जाने से हरगिज बचना चाहिए, जिस पर चाय की तलब से ज्यादा कोई याद खींच कर ले जाए,
मिटी हुई तलब के बाद चाय घूंटों में नहीं पी जाती, और उग आई यादों के बाद चुस्कियों का हलक में उतरना भी संभव नहीं होता,
हल्के बादामी रंग के बुलबुलों से भरे कप में उबला हुआ यह वही तेजाब होता है.. जो माथे में जमी बेचैन परतों को धूंआ करता हुआ उड़ता जाता है और छोड़ता जाता है पसीने की कुछ बूंदें। उस वक्त सांस फेंफड़ों से होती हुई पीठ पर जाकर थम जाती है.. बादलों से ढ़की शाम भरी दोपहरी हो जाती है...और आंखों के सामने नाचती हैं कुछ धुंधली सी तस्वीरें और दोनों हाथों के चक्रव्यूह में बंधा हुआ कप
मिटी हुई तलब के बाद चाय घूंटों में नहीं पी जाती, और उग आई यादों के बाद चुस्कियों का हलक में उतरना भी संभव नहीं होता,
हल्के बादामी रंग के बुलबुलों से भरे कप में उबला हुआ यह वही तेजाब होता है.. जो माथे में जमी बेचैन परतों को धूंआ करता हुआ उड़ता जाता है और छोड़ता जाता है पसीने की कुछ बूंदें। उस वक्त सांस फेंफड़ों से होती हुई पीठ पर जाकर थम जाती है.. बादलों से ढ़की शाम भरी दोपहरी हो जाती है...और आंखों के सामने नाचती हैं कुछ धुंधली सी तस्वीरें और दोनों हाथों के चक्रव्यूह में बंधा हुआ कप
________________\ चाय सिर्फ चाय नहीं है
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