Thursday, February 18, 2016

गज़ल
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आंसू से तलब अब बुझती नहीं,
कुछ और तलाश किया जाए..

ऐ लख्ते-जिगर कोई जु़ल्म ही कर
कुछ अर्क-ए-लहू ही पीया जाए.. 

जो वस्ल था वो तो फरार हुआ,
क्यों न हिज्र ही कैद किया जाए।।

आवाजें बड़ी बेशर्म थी जब
सोचा था कि मौन जिया जाए,

खामोशी मुझे जो चुभने लगी, 
अब तू ही बता क्या किया जाए? 



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