Tuesday, August 28, 2012

क्यों एक शेर हो जाए....

सीधे-सपाट और लोचरहित आंकड़ों और विश्लेषणों में अपनी जिंदगी गुजार देने वाले अपने प्रख्यात अर्थशास्त्री माननीय प्रधानमंत्री जी के मुख से गफलत भरे दौर में अचानक से शेर सुनकर आंखें डबडबा कर स्क्रीन पर गढ़ गईं,मुंह में जीभ अंदर ही अंदर शेर को दोहराने लगी,कान ठहर गए दोबारा सुनने को,और दिल से बार बार
शुक्रिया निकला उन चिरंजीवी लेखक के लिए भी जिनकी कलम से ये दो पंक्तियों का शेर निकला कि. हजारों जवाबों से अच्छी है खामोशी मेरी न जाने कितने सवालों की आबरू रखे
वो पहले शेर थे जो महफिलें बनाते थे, माहौल का मिजाज बदलते थे और गर्मी के मौसम में फुहारों का मजा देते थे। आज शेर संकटमोचन हैं जान बचाते हैँ आबरू बचाते हैँ। शेर शेर होता है इसके असर के आगे सब फीका है। भाईसाहब मैं तो कहती हूं कि शेर का असर लिखने वाले से नहीं बल्कि बोलने वाले से पूछिए।
दिल में थोड़ी सी भी लोच हो तो शेर बोलिए। आप कहीं फंस गए हों तो एक शेर बोलकर निकल सकते हैं। शब्द कम पड़ गए हों, तथ्य गायब हों या आंकडे़ साथ न दे रहे हों तो दिल के जज्बातों को उकेरने का सबसे सशक्त माध्यम शेरो-शायरी है। कम से कम दो बार लगातार इतने बड़े पद पर रहे माननीय मनमोहन जी से इतना तो हम सीख ही सकते हैं।

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