उम्र से पहले हुनरमंद होते हाथ या डूबता बचपन.......
चेहरे पे शिकन, सीने में चुभन, आंखों में पीलापन छाया
झर गए लफ्ज होटों से और आंखों से सपनों का साया।
तपती दुपहरी की चमकती धूप में पीठ पर बस्ता लादे, एक हाथ में बोतल लिए वैन से उतरते चहचहाते बच्चों को देखकर ,मन में एक ख्याल उतर आता है, क्या खूब दिन थे वो.....फिर बरबस याद आता है ,ये दौलत भी ले लो ,ये शोहरत भी ले लो ...मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन ....आपने इस गीत के शब्दों पर गौर किया हो तो पाएंगे कि सब कुछ हसीन है समृद्द है, आज बेशुमार दौलत है,पर उससे भी हसीन और खुशनुमा था इनका बचपन जिसको फिर से पाने की तमन्ना है, किसी भी भाव-बोध, टेंशन और जिम्मेदारी से परे, आह..सिर्फ बचपन........
सुखद था और सुखद ही स्मृतियां हैं , विकल्प उपलब्ध थे तो हर बार सुनने को मिलता था कि छूना मत हाथ गंदे हो जाएंगे, हाथों को सहेजकर रखा गया इसलिए आज भी चमक है और नर्म हैं, आज भी डरते हैं चीजों को छूने से ,बोझ क्या उठाएंगे ? लेकिन कहीं- कभी अपने आसपास तो आपने भी देखी होगी कोई मुरझाई सूरत जिसकी पीली आंखों में लाल धारियां और डर के साथ-साथ बढ़ती सांस, पेड़ की छाल सी उखड़ती नसों वाले पत्थर से कड़े हाथ, चिथड़ों सी शर्ट के साथ उधड़ के लटकी हुई जेब वाला पेंट और बेतरतीब अदा में सिमटे हुए बाल और हमारी हर एक छोटी से छोटी कलात्मक चीज को घूरती उसकी नादान आंखें। यही है उसका बचपन जो उसे तरसाता है ,तड़पाता है हर एक उस चीज के लिए जिसपर सिर्फ कुछ नोटवालों का हक है। आंखें खोलते ही जिसे संसार और भूख का गठजोड़ समझा दिया गया और छोड़ दिया गया । इन दबी-कुचली आंखों में उजले सपने कैसे पनप सकते हैं जबकि उसने अपने मां-बाप को भी दिन की तपिश से ठिठुरती रातों तक बस बेहोशों की तरह जी तोड़ते हुए ही पाया है और इसलिए इन आंखों में तो कार में बैठने के बजाय कार के पंचर को ठीक करके मालिक की नजर से बचाकर दो रुपए ज्यादा पाने का ही सपना पल सकता है।
हुनर बढ़ रहा है, अनुभव भी बढ़ रहा है और काम में पैनापन आ रहा है ,कच्ची उम्र में भूख सहने की क्षमता भी बढ़ रही है, और चौथाई जनसंख्या के आराम और विलास की सुविधाएं पैदा की जा रही हैं और इसके बदले में क्या देना पड़ रहा है बस बचपन ही तो है...यह तो पिछले जन्मों का लेखा जोखा है... अक्सर अपने बचपन की स्मृतियों में खोए रहने वाले लोग भी जब यह कह जाते हैं तो विस्मय होता है....
अपने को सजा संवारकर बड़प्पन का लिबास पहने जब मैं या आप निकले हों तो ऐसा बचपन हमने भी देखा होगा और देखकर ,अफसोस जताकर छोड़ दिया होगा, या हो सकता है कि हम भी उसे दो रु. अतिरिक्त देने वालों में हों , और हमें इससे मानसिक शांति का विराट अनुभव भी हुआ हो।
ऐसा दुःखद बचपन जवानी में कौन याद करना चाहेगा....
खैर सवाल यही है कि आप और हम क्या बचाने में अपना योगदान दे सकते हैं..... ;ये हुनर या इन मासूमों का डूबता बचपन .....एक बार सोचिए जरूर.
चेहरे पे शिकन, सीने में चुभन, आंखों में पीलापन छाया
झर गए लफ्ज होटों से और आंखों से सपनों का साया।
तपती दुपहरी की चमकती धूप में पीठ पर बस्ता लादे, एक हाथ में बोतल लिए वैन से उतरते चहचहाते बच्चों को देखकर ,मन में एक ख्याल उतर आता है, क्या खूब दिन थे वो.....फिर बरबस याद आता है ,ये दौलत भी ले लो ,ये शोहरत भी ले लो ...मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन ....आपने इस गीत के शब्दों पर गौर किया हो तो पाएंगे कि सब कुछ हसीन है समृद्द है, आज बेशुमार दौलत है,पर उससे भी हसीन और खुशनुमा था इनका बचपन जिसको फिर से पाने की तमन्ना है, किसी भी भाव-बोध, टेंशन और जिम्मेदारी से परे, आह..सिर्फ बचपन........
सुखद था और सुखद ही स्मृतियां हैं , विकल्प उपलब्ध थे तो हर बार सुनने को मिलता था कि छूना मत हाथ गंदे हो जाएंगे, हाथों को सहेजकर रखा गया इसलिए आज भी चमक है और नर्म हैं, आज भी डरते हैं चीजों को छूने से ,बोझ क्या उठाएंगे ? लेकिन कहीं- कभी अपने आसपास तो आपने भी देखी होगी कोई मुरझाई सूरत जिसकी पीली आंखों में लाल धारियां और डर के साथ-साथ बढ़ती सांस, पेड़ की छाल सी उखड़ती नसों वाले पत्थर से कड़े हाथ, चिथड़ों सी शर्ट के साथ उधड़ के लटकी हुई जेब वाला पेंट और बेतरतीब अदा में सिमटे हुए बाल और हमारी हर एक छोटी से छोटी कलात्मक चीज को घूरती उसकी नादान आंखें। यही है उसका बचपन जो उसे तरसाता है ,तड़पाता है हर एक उस चीज के लिए जिसपर सिर्फ कुछ नोटवालों का हक है। आंखें खोलते ही जिसे संसार और भूख का गठजोड़ समझा दिया गया और छोड़ दिया गया । इन दबी-कुचली आंखों में उजले सपने कैसे पनप सकते हैं जबकि उसने अपने मां-बाप को भी दिन की तपिश से ठिठुरती रातों तक बस बेहोशों की तरह जी तोड़ते हुए ही पाया है और इसलिए इन आंखों में तो कार में बैठने के बजाय कार के पंचर को ठीक करके मालिक की नजर से बचाकर दो रुपए ज्यादा पाने का ही सपना पल सकता है।
हुनर बढ़ रहा है, अनुभव भी बढ़ रहा है और काम में पैनापन आ रहा है ,कच्ची उम्र में भूख सहने की क्षमता भी बढ़ रही है, और चौथाई जनसंख्या के आराम और विलास की सुविधाएं पैदा की जा रही हैं और इसके बदले में क्या देना पड़ रहा है बस बचपन ही तो है...यह तो पिछले जन्मों का लेखा जोखा है... अक्सर अपने बचपन की स्मृतियों में खोए रहने वाले लोग भी जब यह कह जाते हैं तो विस्मय होता है....
अपने को सजा संवारकर बड़प्पन का लिबास पहने जब मैं या आप निकले हों तो ऐसा बचपन हमने भी देखा होगा और देखकर ,अफसोस जताकर छोड़ दिया होगा, या हो सकता है कि हम भी उसे दो रु. अतिरिक्त देने वालों में हों , और हमें इससे मानसिक शांति का विराट अनुभव भी हुआ हो।
ऐसा दुःखद बचपन जवानी में कौन याद करना चाहेगा....
खैर सवाल यही है कि आप और हम क्या बचाने में अपना योगदान दे सकते हैं..... ;ये हुनर या इन मासूमों का डूबता बचपन .....एक बार सोचिए जरूर.
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