Wednesday, August 22, 2012

अब तो बस यही ख्याल आता है........

मरकर स्वर्ग जाने का ख्वाब  छोड़ दिया मैंने
जब से देखी हैं वादियां जम्मू की।।
चलिए आज बैक गियर डालते हैं और चलते हैं फ्लैश बैक में ................

कुछ दिन पहले ही  मैं आठ दिनों की लम्बी यात्रा से लौटी हूं। इसे अगर मैं असंभावित यात्रा कहूं तो कोई दो राय नहीं है क्योंकि मुझे पता ही नहीं था कि मैं जाउंगी। जाने से आठ दिन पहले कंफर्म हुआ कि मेरी टिकट बन गई है ,और अब सवाल था छुट्टी का ,मिलेगी भी या नहीं खैर सवालों के दरमियां दो दिन पहले बॉस से भी हरी झंडी मिल गई लेकिन यह क्या न कोई खरीददारी और न ही कोई प्लान..बस जाना था।
मन चहक रहा था, ख्वाबों ने अब डेरा डालना शुरू कर दिया था ,और न जाने  वैष्णो देवी की कितनी काल्पनिक तश्वीरे मैंने अपनी डैस्क पर बैठकर कीबोर्ड पर  उंगलियां चलाते हुए ही खींच डाली। जाने से दो दिन पहले मन ने काम करना बंद कर दिया और बड़ी ही खूबसूरत रंगीन  दुनिया की रचना कर डाली। सृजन के मामले में इतनी बड़ी उपलब्धि शायद पहले कभी न पायी थी मैंने..

रात को 9 बजे बस में मैं अकेली लड़की और बाकी मुश्किल से चार-पांच और लोगों के साथ दिल्ली से घर पहुंची लेकिन यह तो वो कातिल समय था जब बस घर पहुचने की खुमारी थी और ऐसे वक्त में उमंगों में डूबा हुआ डर भी मेरे साथ बैठकर आने वाले दिनों के लिए चुनचुनकर हसीन ख्याल बुन रहा था।  क्या वक्त था वो........

घर पहुंची तो सब खुश और व्यस्त थे ,ऐसा शोर सुनकर एकबारगी लगा जैसे दिन हो रहा हो, और फिर 20 लोगों को काफिला जो घर से निकला तो घर में सन्नाटा पसर गया पर दिल झूम रहा था ,पूरा परिवार एक साथ और इतने लंबे टूर पर और इतने दिनों के लिए ,...मेरे नोएडा जाने के बाद पहली बार....और इसीलिए मेरे शब्द गायब थे और मैं भौचक्की सी हर पल को कैद करने में लगी थी आगे उन्हें दोबारा देखने के लिए , फिर एकबार पीछे मुड़कर घर की खामोशी को गौर से देखा तो लगा जैसे वह सवाल कर रहा हो कि वापस कब आओगे।

स्टेशन पर पहुंच कर बरबस ही एक पंक्ति याद आ गई जो कुछ दिन पहले ही किसी ने मुझसे कही थीं..जो मजा सफर में है वो मंजिल में कहां .....इसीलिए अब स्टेशन पर इंतजार करना भी खूबसूरत था, और बेहाल करती गर्मी भी ठंड का एहसास करा रही थी। अब सफर था ,मैं थी और मेरा परिवार ...

ट्रेन मथुरा से जम्मू तवी  के लिए थी , वाकई ट्रेन का सफर सुहाना होता है, और वहो जाकर एक सच्चाई का और पता चलता है कि लोग परिस्थितियों से कैसे और कितनी जल्दी समझौता कर लेते हैं । 400 मीटर जगह के तिमंजिला मकान को भी छोटा मानने वाले कैसे एक बर्थ पर सिमट जाते हैं । एक कम्पार्टमेंट एक मोहल्ला बन जाता है और मीलों की दूरी पर बसे लोग एक ही झटके में पड़ौसी। चलती हॉर्न बजाती ट्रेन जैसे सचेत करती जाती है और लगता है कि सारा संसार बस यहीं बसता है.....और यही कारण है कि मुझे रेलगाड़ी का सफर हमेशा पसंद आता है।

खैर पंजाब के खेतों में उगते सोने को देखते-देखते हम जम्मू तवी स्टेशन पहुंचे तो लगा कि यह तो बड़ी बेकार जगह है, जल्दी परिणाम पाने की आदी हमारी कल्पनाएं कुसकुसाने लगीं। पर ईश्वर का नजराना तो अब आनेवाला था....जम्मू से कटरा का रास्ता बल्कि कहें कि मनोहर वादियों के मुकुट पर्वतों को काटकर बनाया गया स्वर्ग को जाने वाला प्रवेश द्वार था वह। टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलते हुए आंखें एकटक थी और मुंह से निकलने वाले शब्द थे बस वाह...वाह...वाह....
वास्तव में वहां बस एक ही चीज आपको हर जगह ,हर मोड़ पर मिलेगी और वह है खूबसूरती...

उसके बाद शुरू हुई हमारी वैष्णो देवी की चढ़ाई ...जय माता दी के जयकारों के साथ ,जोश से लबरेज ,बस धुन सवार और एक मिशन जो पॉसिबल होने वाला था। 14 किमी चढ़ना था और बस यहीं जरूरत होती है बहुत सारे अपने लोगों की , और हमारा कुनबा तो बीस लोगों का था, बस बातें, शोर, हंसना,खाना, और चलते जाना ....फुल मस्ती, फुल मनोरंजन ,रूठना-मटकना,मनाना ,किसी का खो जाना ,फिर मिल जाना  और तो और रास्ते में भी शैतानियां और ऊधम..अहा..सब स्वतंत्र थे जिसके जो मन में था वो वही कर रहा था।

रास्ते भर जिस एक चीज की मुझे कमी लगी जो वृंदावन में देखने और सुनने की आदी हूं मैं वो यह थी कि हर जगह दुकानें थीं लेकिन मां के भजन या गीत जैसा कुछ भी नहीं चल रहा था जो कि उमंग का स्त्रोत बनकर चढ़ाई में हमारा साथ देता खैर रात थी तो साफ दिखाई नहीं दे रहा था पर आसमान और पहाड़ और घाटियां दिख रहीं थीं। ऊपर पहुंचकर देखा बहुत भींड़ थी और बताया गया कि यह 12 महीने 24 दिन का हाल है और नवरात्रों में तो अति ही हो जाती है लेकिन यहां आ वही पाते हैं जिनपर मां की कृपा हो वरना लोगों की जिंदगी गुजर जाती है।

चाक-चौबंद व्यवस्था के साथ एक छोटी सी गुफा में विराजमान तीन पिंडियों के दर्शन किए, जिनमें महासरस्वती, महाकाली और महालक्ष्मी की पिंडियां हैं। बहुत जल्दबाजी में वहां दर्शन कराए जाते हैं इसलिए ध्यान देना बहुत जरूरी हो जाता है।
 ऊपर का मौसम ठंडा ही होता है इसलिए वहां शॉल-स्वैटर की जरूरत महसूस होती है। फिर उससे भी ऊपर भैरव नाथ के दर्शन किए क्योंकि उनके बिना दर्शन अधूरे माने जाते हैं और फिर शुरु हुआ लौटने का सिलसिला।
ऐसा लग रहा था जैसे कितने दिनों की कठिन मेहनत ने चूर कर दिया है पर लौटते वक्त पैर अपने आप ही फिसल रहे थे बिल्कुल ढलान पर बिना ब्रेक की गाड़ी की तरह, अब ना देवी मां याद आ रहीं थीं और ना ही मुह से जय माता दी निकल रहा था ,बस लग रहा था कैसे भी जल्दी से रूम पर पहुंचें और पहुंचने के बाद किसी को होश नहीं आया अगली सुबह तक.....
 










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