Saturday, February 11, 2012

मैने लोगों को अक्सर कहते सुना है की दुनिया मतलबी हो गई है , लोग  सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं, अपने लिए ही जीते हैं और मरते  हैं। उन्हें न दूसरों के जीने की फिक्र है न मरने की । परहित की बातें इस दुनिया से गायब हो गई हैं। लोग स्वार्थी हो गए हैं ,देश दुनिया से कट गए हैं ,स्वयमचिन्तक हो गए हैं ।लेकिन  यह निहायत ही कोरा आरोप है क्योंकि जब तक मुझ जैसे आपकी बल्कि आप सब की ही दुनिया  को टटोलने वाले लोग इस वसुंधरा पर मौजूद हैं ऐसा कदापि नही हो सकता । मेरा मानना है की अपनी जिन्दगी में मत झांको ,सिर्फ दूसरों की पर  द्रष्टि जमाओ, और दूसरों को अपनी में कूद- फांद करने दो , फिर देखो पर्यटन के साथ -साथ  सोहार्द्र भी बढ़ेगा। मेरा तो एक ही ध्येय वाक्य है , अरे अपने सुना ही होगा ,



वृक्ष कबहू नहीं फल भखे ,नदी न संचे नीर n
परमारथ के करने साधनु धरा शरीर ।। 

बस एक कोशिश है रंग तो लाएगी ही  क्योंकि आप  भी तो मेरी इस बात को सिद्ध करने में मेरे साथ है कि अभी गुंजायश है,हम नालायक हो सकते हैं पर स्वार्थी ,कभी नही । आप भी शुक्र मनाइए -


चाहे गुलाब में  कांटे ही सही
गनीमत है साथ तो हैं ।।

शुभ - शुभ सोचिए -मेरे साथ मुस्कुराइए ,हंसिए, खिलखिलाइए,दिमाग लगाइए और अपनी दुनिया में मुझे सेंधमारी करने से रोक सको तो  रोकिए जनाब  ।।






















     

No comments:

Post a Comment