असंख्य बेटों की बीमार माँ का हाल
जमाने ने करवट ली, नया दौर, नई तारीख, नया दिन,नयी सोच और उसके साथ रिश्तों के नए-नए रूप, लेकिन नहीं बदली तो एक चाह ,एक उम्मीद कि कम से कम एक बेटा तो हो। यहां मेरा आशय बेटे और बेटी के मुद्दे से अलग उस मां को लेकर है जिसके इस दुनिया में असंख्य बेटे हैं। वही बेटे जो बड़े गर्व से इस बात की पुष्टि करने के लिए एक ही पल सैकड़ों सबूत हमारे मुंह पर मार देते हैं। ये सपूत सैकड़ों वर्षों से सिर्फ अपनी मां पर निछावर हैं, उसकी सेवा करते हैं, उसे बचाने के लिए तन-मन और धन से तत्पर रहते हैं। ये अपना मन मां को दे चुके हैं, तन से मेहनत करके उसके लिए सुविधाएं इकट्ठी कर रहे हैं और धन तो मां के चरणों में ही है। ये जागरुक होने का दावा करते हैं, और अपने प्राणों की आहूति देने के लिए सदैव खड़े रहते हैं, लेकिन मां की दुर्दशा बुढापे में हुई बीमारी की तरह उसे जकड़ती ही जा रही है। ये बेटे नहीं जानते कि चूक आखिर कहां हुई ? अवस्था आखिर विकृत से विकट विकृत क्यों हुई? ये घोषणा करते हैं कि इन्होंने अपने-अपने स्तर से सारी सेवाएं और इलाज किए। तुलनात्मक रूप से इन्होंने देश के साथ साथ विदेशों से भी सुविधाओं का जुगाड़ किया, यहां तक कि अनशन से लेकर भूख हड़ताल और धरना तक किया। क्या-क्या नहीं किया और आज भी क्या-क्या नहीं कर रहे और स्वस्थ होने की उम्मीद से इतर आगे भी करेंगे।
इन्होंने आपस में ही बांट ली सेवाएं, कभी हाथ के घाव से बहते पस को गौरव सेना साफ कर जाती है तो फूटी आंख से निकलते आंसुओं को यमुना रक्षा समिति, कभी पोपले मुंह में बृज मजदूर कल्याण समिति निवाला डाल जाती है तो यमुना एक्शन प्लान वाले दो बूंद पानी, लेकिन खबरें छपती हैं, सुर्खियां बनती हैं और बेटे अपनी सराहना पर जश्न मनाते हैं, और सेवा भी करते हैं लेकिन इस मानसिकता के साथ कि मां के दूसरे बेटे से ज्यादा सेवा का श्रेय मुझे मिले।
भाइयो ; ये दुर्भाग्यशाली मां यमुना है जिसके बेटे एक छोटा सा सच नहीं जानते कि अगर वे सभी एक साथ मिलकर एक दिन मां के सारे घाव भर दें तो टुकड़ों में बंटी मां अपने स्वरूप को वापस पा लेगी।
जमाने ने करवट ली, नया दौर, नई तारीख, नया दिन,नयी सोच और उसके साथ रिश्तों के नए-नए रूप, लेकिन नहीं बदली तो एक चाह ,एक उम्मीद कि कम से कम एक बेटा तो हो। यहां मेरा आशय बेटे और बेटी के मुद्दे से अलग उस मां को लेकर है जिसके इस दुनिया में असंख्य बेटे हैं। वही बेटे जो बड़े गर्व से इस बात की पुष्टि करने के लिए एक ही पल सैकड़ों सबूत हमारे मुंह पर मार देते हैं। ये सपूत सैकड़ों वर्षों से सिर्फ अपनी मां पर निछावर हैं, उसकी सेवा करते हैं, उसे बचाने के लिए तन-मन और धन से तत्पर रहते हैं। ये अपना मन मां को दे चुके हैं, तन से मेहनत करके उसके लिए सुविधाएं इकट्ठी कर रहे हैं और धन तो मां के चरणों में ही है। ये जागरुक होने का दावा करते हैं, और अपने प्राणों की आहूति देने के लिए सदैव खड़े रहते हैं, लेकिन मां की दुर्दशा बुढापे में हुई बीमारी की तरह उसे जकड़ती ही जा रही है। ये बेटे नहीं जानते कि चूक आखिर कहां हुई ? अवस्था आखिर विकृत से विकट विकृत क्यों हुई? ये घोषणा करते हैं कि इन्होंने अपने-अपने स्तर से सारी सेवाएं और इलाज किए। तुलनात्मक रूप से इन्होंने देश के साथ साथ विदेशों से भी सुविधाओं का जुगाड़ किया, यहां तक कि अनशन से लेकर भूख हड़ताल और धरना तक किया। क्या-क्या नहीं किया और आज भी क्या-क्या नहीं कर रहे और स्वस्थ होने की उम्मीद से इतर आगे भी करेंगे।
इन्होंने आपस में ही बांट ली सेवाएं, कभी हाथ के घाव से बहते पस को गौरव सेना साफ कर जाती है तो फूटी आंख से निकलते आंसुओं को यमुना रक्षा समिति, कभी पोपले मुंह में बृज मजदूर कल्याण समिति निवाला डाल जाती है तो यमुना एक्शन प्लान वाले दो बूंद पानी, लेकिन खबरें छपती हैं, सुर्खियां बनती हैं और बेटे अपनी सराहना पर जश्न मनाते हैं, और सेवा भी करते हैं लेकिन इस मानसिकता के साथ कि मां के दूसरे बेटे से ज्यादा सेवा का श्रेय मुझे मिले।
भाइयो ; ये दुर्भाग्यशाली मां यमुना है जिसके बेटे एक छोटा सा सच नहीं जानते कि अगर वे सभी एक साथ मिलकर एक दिन मां के सारे घाव भर दें तो टुकड़ों में बंटी मां अपने स्वरूप को वापस पा लेगी।
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