न जाने कैसी नींद थी? रात भर एक ही सपना. उफ़्फ़ ट्रेन छूट गई.मेघ जी डाँट रहे- 'तुम तो ट्रेन में चढ़ गई थीं फिर छूटी कैसे?' अब परीक्षा! उसका क्या?
मैं ट्रेन के गेट पे थी, किसी ने कहा हमें उतरना है, पहले तुम उतरो! और मैं उतर गई! ट्रेन चल पड़ी.
ऐसे कौन करता है इस दुनिया में? तुम एकदम पागल हो प्रिया!
हम्म!
न जाने कौन सी परीक्षा थी? न जाने कौन से शहर जाना था? रात भर स्टेशन पर दौड़ती रही. ट्रेनों का पता और समय पूछती रही. ट्रेन आती-जाती रहीं, कसक स्थिर रही.
और फिर नींद खुल गयी, कुछ भी तो न हुआ ऐसा! सब तो हंस रहे! मेरा सर भारी है.
मेघ जी बताओ न! हक़ीक़त में कितनी तो ट्रेन छोड़ीं, इतना अफ़सोस क्यों न हुआ?
24-07-2018
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