रात के पौने 3 बजे ये कैसा अलार्म लगाया नींद ने? दबे पाँव आज फिर निकल गयी. दरवाजों की सांकलें भी न ठिठकी. कोई आहट नहीं.
आज फिर किसी सपने से डरी थी क्या?
हां! सपना आया था.
किसी शहर की यात्रा पर निकली हूँ मैं. इस बार ट्रेन नहीं ली. हर बार ही तो छूट जाने का डर रहता था.
आज बस मैं हूँ. सीट न मिली, नीचे बैठी हूँ धरती पर. फिर भी मन नाच रहा, गीत गा रही. हँस रही.
कुछ हौले-हौले बुदबुदा रही, हलक सूख रहा.
बस रोको रे भैया... मुझे प्यास लगी है!
बस रोकी गयी है!
सभी सवारियां घूम आएं, बस चलने से पहले लौट आएं, ड्राइवर बोल रहा.
कोई बीच राह का शहर है, बड़े-बड़े कुएँ हैं. बड़ी भीड़ है. मेरे पास गिलास है, घर से लेकर चली थी. मुझे पानी चाहिए, गला खिंच रहा अब.
इतने बड़े-बड़े कुएँ? पर इनका पानी हरा क्यों है? मैं सोच रही खड़ी-खड़ी, वक़्त गुज़र गया. सब पानी पीकर लौट आये.
तूने पानी पीया प्रिया? एक बहन पूछ रही.
न , नहीं तो.. कहाँ है पानी?
अरे इस कुए में से जल्दी भर गिलास, और भाग, बस छूट रही.
मैं आधा गिलास भर पाई, एक घूँट मुंह में डाला, ओह! खारा है! नमक है! कैसे पीयूँ?
आँख भर गयी. एक घूँट मीठा पानी न मिला!
लेकिन इस बार बस पकड़नी है, मैं दौड़ रही.....
और ..बस पकड़ ली पर मैं प्यासी हूँ!
16-08-2018
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