Wednesday, September 5, 2018

ज़िन्दगी यूँ तो कई बार मिली
ज़ुर्मे ख़ूं में ही गिरफ़्तार मिली.

ख़ून भी मेरा ओ' मैं ही क़ातिल
उसपे मुझको ही सज़ा यार मिली.

चाह को पी लूँ, तलब थी मेरी,
वो भी मेरी ही तलबगार मिली.

वक़्त पे हमने किये सारे हिसाब
फिर भी हर चीज़ क्यों उधार मिली?

बच भी पाते तो भला कैसे प्रिया?
सबके चाकू में ग़ज़ब धार मिली.

शक्लो-शोहरत पे खरोंचें न मिलीं,
एक बस रूह ज़ार-ज़ार मिली.

22-08-2018

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